इस बात में एक हद तक सचाई अवश्य है कि बिहार में जब से लालू प्रसाद की सरकार बनी है, उसके राजनीतिक विरोधियों ने उसे पल-भर भी चैन से बैठने का अवसर नहीं दिया है। पिछले ढाई साल में सरकार का बहुलांश समय और ऊर्जा खुद को बचाए रखने में ही नष्ट हुई है। यह कहा जा सकता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष का यह धर्म है कि वह सत्तापक्ष को हमेशा चौकन्ना रखे। सत्ता पक्ष का कर्तव्य है कि उस अनिश्चय की आग से पर्याप्त ऊर्जा ग्रहण करके कुछ ऐसा सकारात्मक कर्म करता रहे जिसके लिए मतदाताओं ने उनमें आस्था व्यक्त की है।
सिद्धांत के रूप में ये बातें ठीक हैं लेकिन इसके साथ एक शर्त भी जुड़ी हुई है। शर्त यह है कि यह सारा कार्य व्यापार लोकतांत्रिक ढांचे और सिद्धांत के अंदर ही सम्पन्न हो। यदि यह खेल इन नियमों के अंतर्गत खेला जाता है तो सरकार के पास अपने को बचाए रखने का पर्याप्त अवसर रहता है। इसके बाद भी इतना समय बचा रहता है जिसमें वह अपने उस कर्तव्य का पालन कर सकें जिसके लिए जनसमूह के बहुमत ने उसे मूल रूप से चुना है। जन प्रतिनिधि चुनने के साथ ही मतदाता का कर्तव्य एक तरह से स्थगित हो जाता है। इसके बाद वह उससे परिणामों की अपेक्षा करता है न कि बार-बार इस बात की शिकायत कि न्यस्त स्वार्थ उन्हें काम करने का मौका नहीं दे रहा है।
बिहार में थोड़ी भिन्न परिस्थितियों में लालू प्रसाद की सरकार का गठन हुआ। पारंपरिक रूप से बिहार का प्रशासनिक ढांचा बौद्धिक और सामाजिक नेतृत्व तथा सांस्कृतिक स्वरूप कुछ ऐसा रहा है कि लालू प्रसाद और उनके वर्ग की सरकार को स्वीकार करने में उनकी प्रारंभिक कठिनाई समझ में आती है। यही कारण है कि इन्हीं परिस्थितियों में किसी अन्य राज्य में इस तरह की सरकार को जो कठिनाइयां झेलनी पड़ती लालू प्रसाद की सरकार को उनसे कहीं ज्यादा मुश्किलात का सामना करना पड़ा।
शायद इसीलिए बिहार के मतदाता ने भी इस कठिनाई को समझा और एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों को जिस सीमा तक अकर्मण्यता के लिए छूट की अवधि परंपरा से निर्धारित है उससे कहीं बहुत ज्यादा ही समय लालू प्रसाद की सरकार को दिया। जब तक सचमुच उन्हें लगता रहा कि प्रशासन और व्यवस्था के संपूर्ण असहयोग के कारण विकास की गति अवरुद्ध है जनगण का विश्वास अपने प्रतिनिधियों के प्रति डिगता हुआ कतई नहीं दीखा। उन्होंने अपने जन प्रतिनिधियों की इस कठिनाई को भी निश्चय ही सहानुभूतिपूर्ण ढंग से समझा कि ये वास्तव में अस्तित्व रक्षा का संघर्ष कर रहे हैं इसलिए मूल कर्तव्य से डिगना इनके लिए न केवल स्वाभाविक है बल्कि क्षम्य भी है। स्पष्ट है कि यह सारी छूट वह उस सीमा तक ही देने को तैयार था जब तक उसे लग रहा था कि कठिनाई सचमुच वाजिब है न कि अकर्मण्यता को ढकने का साधन।
आज जब बिहार में मूड कुछ बदला हुआ दीख रहा है तो इसका कारण यह नहीं है कि वे लोग भी अब सामाजिक न्याय के नारे से अचानक विमुख हो गए हैं जो अब तक इनके साथ थे। अजित सिंह या रामलखन सिंह यादव जैसे राजनीतिज्ञों को जनता यदि ध्यान से सुनने लगी है तो इसका मुख्य कारण यह है कि उनका विश्वास लालू प्रसाद यादव और उनके ब्रांड के सामाजिक न्याय से थोड़ा डिग रहा है न कि वास्तविक सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के राजनीतिक दर्शन से। लालू प्रसाद जैसे प्रखर जमीनी राजनीतिज्ञ की यह पहली बड़ी असफलता है कि अपने तिलिस्म को बिखरने से बचाने में वे असमर्थ दीखने लगे हैं। अच्छे और सफल राजनीतिज्ञ की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि वह समय की नजाकत को बखूबी पकड़ कर अपने राजनीतिक कर्म को उसी के अनुरूप ढालता है। लालू प्रसाद इस कला में पारंगत रहे हैं। लेकिन लगता है कि इधर उनकी राजनीतिक पकड़ थोड़ी ढीली पड़ रही है। वर्ना उनकी बाजी एक के बाद एक उलटी नहीं पड़ती।
राष्ट्रीय स्तर पर जनता दल में हो रहे सतत् बिखराव के दौर में भी लालू प्रसाद यादव ने राज्य में पार्टी को एक तरह से अक्षुण्ण रखा तो इसका कारण सिर्फ सामाजिक न्याय के प्रति राज्य के बहुमत की प्रतिबद्धता ही नहीं थी। इसके पीछे लालू प्रसाद की अपनी योग्यता और क्षमता का भी बहुत बड़ा हाथ था। इसी तरह का समाज और इसी तरह की प्रतिबद्धता उत्तर प्रदेश में भी थी लेकिन जनता दल को वहां खंड-खंड होते देर नहीं लगी। मुलायम सिंह यादव निश्चय ही लालू प्रसाद के मुकाबले अधिक अनुभवी और जमीनी पकड़ वाले नेता थे लेकिन वे जहां असफल रहे लालू उन्हीं बिंदुओं पर सफल होते गए। यह लालू प्रसाद की राजनीतिक व्यवहार कुशलता का ही परिणाम था।
इसे भी राजनीतिक कुशलता ही कहेंगे कि दिन ब दिन बिहार की स्थिति बदतर होती गई। लेकिन लालू की जड़ें वहां की जमीन में और गहरी पैठती गईं। विकास का कार्य राज्य में पूरी तौर पर ठप है। यह आज की बात नहीं वर्षों से यही स्थिति है। राज्य करीब-करीब आर्थिक दिवालिएपन के कगार पर है। सरकार महीनों अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पाती। फिर इधर उधर की मदों से कतर-ब्योंत करके किसी तरह भुगतान कर दिया जाता है। आर्थिक मोर्चे पर प्रशासन की विफलता का यह आलम है कि इस माहौल में भी राज्य सरकार करीब 2000 करोड़ रुपये खर्च न कर पाने की स्थिति में केंद्र को लौटा रही है। राज्य में बिजली नहीं, पानी नहीं, कानून व्यवस्था की स्थिति नाजुक, सड़कें खस्ताहाल और कुल मिला कर राज्य सत्ता अपने आप में समाप्त होती दीख रही है। लंबे अरसे से यही स्थिति है, फिर भी लालू प्रसाद ने जिस वर्ग में लोकप्रियता प्राप्त की उस वर्ग के हीरो वे हाल तक बने हुए थे। सिर्फ इसलिए कि उनकी एक तरह की पारदर्शी गंवई निश्च्छलता सबके सामने थी।
शायद यही कारण है कि उनके अनेक सारे गलत काम भी इस फिजा में दबे ढके रह जाते थे। सामाजिक न्याय दिलाने के नाम पर जब लालू प्रसद कांग्रेस के एक परंपरागत बदनाम विधायक रामलखन सिंह यादव को जनता दल के टिकट पर संसद का चुनाव लड़ा रहे थे तब भी लोगों को रामलखन की वास्तविकता का पता था। लालू प्रसाद सहित सारे राज्य को यह पता था कि रामलखन बाबू सिर्फ शिक्षा माफिया और जमीन माफिया ही नहीं राजनीति में बाहुबल को प्रतिष्ठा दिलाने वाले राजनीतिज्ञों में प्रमुख हैं। यह भी सबको पता था कि उनके सुपुत्र प्रकाश चन्द ने कलकत्ता की उस बदनाम बस्ती में किस तरह कुल और राज्य का नाम रोशन किया था। यह मानने का भी कोई कारण नहीं है कि लोगों को पप्पू यादव के सामाजिक न्याय की असलियत का पता नहीं होगा। लेकिन जब लालू प्रसाद ऐसे लोगों को अपने सामाजिक न्याय की छत्रछाया में ले लेते थे तो लोग इसे भी स्वीकार कर लेते थे। सिर्फ इसलिए कि उन्हें लालू प्रसाद के पारदर्शी व्यक्तित्व पर विश्वास था। उन्हें लगता था कि पिछड़े परिवार के एक गरीब को विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लोग जमने नहीं दे रहे हैं। इसलिए फिलहाल इनसे किसी महत्वपूर्ण कर्म की अपेक्षा की बजाय इसी बात पर असंतुष्ट होना चाहिए कि ये अपने अस्तित्व की लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ पा रहे हैं।
यह स्थिति आगे भी बनी रहती यदि लालू प्रसाद पर आक्रमण सिर्फ उसी वर्ग की ओर से होता, जिस वर्ग को इन्होंने अपना शत्रु घोषित कर रखा था और जो वास्तव में थे भी। आज स्थिति बदल गई है। चाहे पैसे का प्रलोभन हो या शुद्ध अवसरवाद, लेकिन सचाई यह है कि इस बार लालू प्रसाद से जो अलग हुए हैं वे घोषित शत्रुवर्ग के लोग नहीं हैं। यहां बात सिर्फ रामलखन सिंह यादव या रामशरण यादव की नहीं हो रही। बात यहां रामसुंदर दास और उपेन्द्रनाथ वर्मा की भी हो रही है। यह आक्रमण इस बार उस सामाजिक वर्ग की ओर से हो रहा है जिसके न्याय की लड़ाई लड़ने का लालू प्रसाद दंभ भरते हैं और शरद यादव जिसके लिए रथयात्रा का ढोंग कर रहे हैं। रथ पर सवार होकर अपनी बात कहने की परंपरा अभिजात और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की विशेषता रही है। हाल में इसका अत्यंत अशिष्टकरण भी हुआ है। दबे-कुचले और शोषित पीड़ित के दर्द की अभिव्यक्ति किसी रथ पर सवार होकर नहीं की जा सकती। इसलिए इस तरह के अश्लील कृत्य के माहौल में जब लालू प्रसाद आरोप लगाते हैं कि थैलीशाह सामाजिक न्याय की धारा को भ्रष्ट कर रहे हैं तो आज वही लोग हंसते हैं जिनकी अभी कल तक इनके साथ पूरी सहानुभूति थी क्योंकि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि यह किसी उद्देश्य की विफलता का विलाप नहीं है। यह वस्तुतः एक अवसरवादी प्रलाप और अपनी विफलता को ढकने के लिए पवित्र उद्देश्य का अपहरण है।
राम आंदोलन के बाद उपजी भाजपा राजनीतिक और आज के शरद-लालू की रथयात्रा मार्का राजनीति में कहीं कोई अंतर नहीं है। राम मंदिर बनाने का आंदोलन भाजपा के अस्तित्व में आने से वर्षों पहले से चल रहा था। उत्तर भारत के जन-जन में व्याप्त राम प्रेम और उससे उपजी धर्मभीरुता किसी भाजपा आंदोलन का परिणाम नहीं थी। लेकिन जब से भाजपा ने इस आंदोलन को अपने हाथ में लेकर इसे अपनी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का साधन बनाया तब से स्थानीय स्तर का एक शुद्ध धार्मिक आंदोलन एक राष्ट्रीय स्तर के सांप्रदायिक आंदोलन के रूप में भी परिवर्तित हो गया। देश में आज अनेक लोग ऐसे हैं जिनकी रामभक्ति में कहीं कोई संदेह व्यक्त नहीं किया जा सकता लेकिन वे आवश्यक रूप से भाजपा-विहिप आंदोलन के पक्ष में भी हों यह आवश्यक नहीं है। जनता दल के बंटवारे की ताजा प्रक्रिया ने सामाजिक न्याय के आंदोलन को भी अब कुछ वैसा ही स्वरूप प्रदान कर दिया है।
मुरहो से प्रारंभ शरद यादव के मंडल रथ ने इस विभाजन को पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया। सामाजिक न्याय का संघर्ष करने वाले आवश्यक नहीं कि वे ही हों, जो मुरहो को एक पवित्र धर्मस्थल और मंडल को अवतार बनाने का प्रयास कर रहे हैं। शरद-लालू-वि.प्र. आदि की यह भोंडी चेष्टा सिर्फ उनकी राजनीति के प्रति ही करुणा का उद्रेक कर पाने में समर्थ है। सामाजिक न्याय के वास्तविक संघर्ष के प्रति नहीं। वैसे इस आंदोलन के भ्रष्ट होने के संकेत उसी दिन मिल गए थे जिस दिन लालू प्रसाद ने अपने जन्म दिन को एनटीआर, एमजीआर और जयललिता की घोर व्यक्तिवादी तानाशाह शैली में मनाने का फैसला किया। वैसे ही राक्षसी कट-आउट, धन और ऐश्वर्य का अश्लील प्रदर्शन तथा नेता की अतिमानवी छवि बनाने के भोंडे प्रयास में जिस दिन लालू प्रसाद शामिल हुए उसी दिन लग गया था कि सामाजिक न्याय का प्रश्न अब इनके लिए निष्ठा का प्रश्न कम और अपनी राजनीति चमकाने का ज्यादा है। रही-सही कसर पेंशन वाले उस कानून ने पूरी कर दी जिसे गुपचुप पास कराने के लिए लालू और जगन्नाथ मिश्र ने आपस में समझौता कर लिया।
यही कारण है कि लालू की जिन बातों को लोग सचमुच विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का षडयंत्र मान कर सहानुभूति जताते थे आज विद्रूप का कारण बनी हुई है। रामलखन के भ्रष्टाचार और अन्य सांसदों के तथाकथित पतन की बात आज लालू के लिए जन मानस पर कोई सहानुभूति की लकीर नहीं खींच पा रही है तो उसके पीछे यही कारण मुख्य है। अब राज्य को यह भी पता लगेगा कि विकास की दौड़ में पीछे रहने के असली कारण क्या हैं। लोग शायद इस विकल्प को भी तराजू पर तोलें कि क्या सामाजिक न्याय के नाम पर किया गया उनका बलिदान सिर्फ इसी व्यर्थता के लिए था। मुलायम सिंह यादव की गतिविधियों से सन 90 में सामाजिक न्याय के संघर्ष को एक भारी झटका लगा था। लालू प्रसाद का विश्वासघात कहीं इसे पूरी तरह तोड़ कर न रख दे।
10 सितंबर, 1992, अमर उजाला
ये थी खबरें आजतक,इंतजार कीजिए कल तक. एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह। दूरदर्शन कार्यक्रम आज तक के संपादक एसपी सिंह जितना यथार्थ बताते रहे, उतना फिर कभी किसी संपादक ने टीवी पर नहीं बताया।रविवार पत्रिका की खोजी पत्रकारिता के पीछे उन्हीं की दृष्टि थी।राजनीतिक-सामाजिक हलचलों के असर का सटीक अंदाज़ा लगाना और सरल भाषा में उसका खुलासा कर देना उनका स्टाइल था।पाखंड से आगे की पत्रकारिता के माहिर थे एसपी।पत्रकारिता के पहले और आखिरी महानायक एसपी के लेखन का संचयन राजकमल ने छापा है। वही लेख आपको यहां मिलेंगे
कुल पेज दृश्य
आरक्षण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आरक्षण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011
वि.प्र. को कसौटी पर खरा उतरना होगा
मोहलत शब्द इन दिनों चर्चा में आम है। खासकर वे लोग, जो मानते हैं कि मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का सरकारी फैसला शुद्ध राजनीतिक उद्देश्य से किया गया था, इस बात पर बार-बार बल दे रहे हैं कि उच्चतम न्यायालय के आदेश से आरक्षण विरोधी आंदोलन की उग्रता और तीव्रता में जो कमी आई है सरकार इस वास्तविकता को देखे, समझे और इस अवसर का लाभ उठाते हुए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के फैसले को वापस लेने का व्यावहारिक कदम उठाए। यह समाज के उस प्रभावशाली तबके का तर्क है जो यह भी मानता रहा है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह का यह फैसला मूलतः देवीलाल की किसान रैली की हवा निकालने के एक तुच्छ प्रयास के रूप में उठाया गया एक ऐसा बगैर सोचा समझा हड़बड़ी में उठाया गया कदम था, जिसने देश को जातियुद्ध के भयानक दावानल में ठेल दिया। यह वह वर्ग है जो यह भी मानता है कि इसका दूरगामी उद्देश्य पिछड़े और दलित तबके को सामाजिक न्याय दिलाने का कतई नहीं है, उसका वास्तविक उद्देश्य तो सिर्फ पिछड़ों के बीच अपने वोट बैंक का आधार मजबूत करना है, इसके लिए चाहे कितनी भी मासूम जानें बलि क्यों न चढ़ जाएं, हृदयहीन प्रधानमंत्री को इसकी कोई चिंता नहीं है। मूलतः आरक्षण की परिकल्पना का विरोधी यह वर्ग जब उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई इस मोहलत का जिक्र करता है, तो एक तरफ जहां इसमें प्रच्छन्न धमकी होती है कि देखिए, यदि अब भी आप अपनी इस गंदी राजनीति से बाज नहीं आए तो देश में हिंसा का एक ज्यादा भयानक दौर प्रारंभ हो सकता है, जिसके जिम्मेवार आप होंगे और यह कहते हुए कहीं न कहीं कनखी मार कर यह भी साफ कर रहा होता है कि इस तरह की आग लगाने और बुझाने में इस वर्ग की भूमिका को भी कृपया आप समझने का प्रयास करें।
यह सच है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनकी सरकार को उच्चतम न्यायालय की कृपा से एक बड़ी मोहलत मिली है वरना समाज में भावनाओं का अतिरेक उस सीमा पर पहुंचा हुआ था, जहां सच तो क्या कुछ भी सुनने के लिए लोग तैयार नहीं दीख रहे थे अब मौका है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह अपनी स्थिति स्पष्ट करें कि क्या सचमुच उनका उद्देश्य सिर्फ यही था कि वेदेवीलाल की किसान रैली की हवा निकाल दें। यदि हां, तो अब भी देर नहीं हुई है। कृपया मंडल आयोग तत्काल वापस कर लें। या यदि उनका उद्देश्य सिर्फ यही था कि इसे लागू करने से उनको वोट बैंक का नया आधार मिलेगा तो उनकी राजनीतिक सूझबूझ पर तरस खाना आना चाहिए क्योंकि पिछड़ी जातियों का वोट बैंक तो इस सरकार के साथ था ही और न ही दूर दूर तक इस बात की कहीं आशंका थी कि यह आधार खिसक कर कहीं और जाने वाला है। यह कहा जा सकता है कि यह वोट बैंक विश्वनाथ प्रताप का अपना नहीं था। इस आधार को बनाने में कहीं लालू-मुलायम, तो कहीं शरद-रामविलास जैसे क्षत्रपों का उन्हें सहारा लेना पड़ता था, इसलिए अपना निजी ठोस आधार बनाने के चक्कर में विश्वनाथ प्रताप ने अपने जनमोर्चा आधार की सारी जमा पूंजी दांव पर लगा कर इस पिछड़े वोट बैंक के व्यापक जनाधार को जीतने का जुआ खेला। यदि सचमुच विश्वनाथ प्रताप की इतनी सीमित महत्वाकांक्षा थी, जिसके लिए उन्होंने छात्र, शिक्षक, वकील, बुद्धिजीवी जैसे मुखर समर्थक वर्ग को तथाकथित जाति युद्ध में झांक दिया, तो उनके राजनीतिक ज्ञान और निर्वाचनी समीकरण का भगवान ही मालिक है। यदि सचमुच ऐसा ही है तो कृपया मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के अपने फैसले को तत्काल निरस्त करने के आदेश जारी कर दें। अभी बहुत देर नहीं हुई है। यदि महत्वाकांक्षाओं के अपने इस नितांत निजी समुद्र में ही वे डूब उतरा रहे हैं, तो सचमुच उनके लिए मोहलत शब्द तिनके का सहारा साबित हो सकता है उसे छोड़े नहीं, सामाजिक न्याय भले ही पीछे पड़ जाए।
लेकिन यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा इन टुच्चे स्वार्थों के लिए नहीं बल्कि जैसा कि वे कह रहे हैं पिछड़े वर्गों में तेजी से बढ़ रहे आक्रोश और शहर तथा अभिजात्य वर्ग विरोधी भावना को रोकने के लिए यह समाज में व्याप्त उग्रविभाजन की भावना को कम करने के लिए या पिछड़े वर्ग को राज्य संचालन में उनकी उचित निर्णायक भूमिका दिलाने के लिए या सिर्फ सामाजिक-आर्थिक न्याय दिलाने की दिशा में उठाए गए पहले कदम के रूप में यह कार्रवाई की गई है, तो प्रधानमंत्री को इस दिशा में निस्संकोच आगे बढ़ना चाहिए।(मोहलत दिलाने वाले उस वर्ग को धन्यवाद देते हुए) क्योंकि वातावरण निश्चय ही इतना विषाक्त हो गया था और माहौल में चलते मानव मांस की चिराइन गंध कुछ इस कदर हावी थी कि उसमें सामाजिक न्याय दिलाने की बात तो दूर, किसी भी प्रकार का सार्थक-असार्थक संवाद संभव ही नहीं था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि विश्वनाथ प्रताप फिलहाल समाज के सबसे प्रभावशाली और मुखर वर्ग में घोर अलोकप्रिय हो रहे हैं। वे निश्चय ही इस तथ्य से भी अवगत होंगे कि इस महत्वपूर्ण वर्ग को अपनी ओर रख कर इस देश में निर्वाचनी राजनीति सफलतापूर्वक करना असंभव तो नहीं, लेकिन कठिन अवश्य है। अब तक तक किसी भी राजनेता ने इस कठिन रास्ते को अपनाने की कोशिश भी नहीं की। ऐसी स्थिति में यदि विश्वनाथ प्रताप अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता पर डटे रहते हैं तो यह तय है कि इस देश की राजनीति की दिशा और इस समाज के पारंपरिक ढांचे में ऐसे मूलभूत परिवर्तन आएंगे, जिसकी इस देश-समाज ने कल्पना भी नहीं की होगी। हो सकता है कि इस महती प्रक्रिया से विश्वनाथ प्रताप और उनकी पार्टी अगला चुनाव हार जाए, लेकिन यदि वे सचमुच समता मूलक समाज के निर्धारण के लिए प्रतिबद्ध हैं तो देश इस बलिदान के लिए उनका कृतज्ञ रहेगा और उनके खुद के दामन पर जो टुच्ची राजनीति के छींटे डाल दिए गए हैं, उनसे भी वे मुक्त हो पाएंगे। विश्वनाथ प्रताप यदि पिछड़े एवं दलित वर्गों के शोषण के कुचक्र को तोड़ कर वास्तविक सामाजिक-आर्थिक बराबरी की दिशा में बढ़ने के प्रयास के रूप में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की बात कर रहे हैं तो मंडल आयोग के प्रश्न पर पीछे नहीं हटें, और इस मोहलत का उपयोग सरकार की इस प्रतिबद्धता को और दृढ़ करने के एक अवसर के रूप में करें।
कानूनी लड़ाई मूलतः तीन मुद्दों पर लड़ी जाएगी। एक, संविधान सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने की गारंटी देता है, पिछड़ी जातियों को नहीं। दो, जातियों की गणना और उनकी पहचान का आधार चूंकि 60 साल पुराना है, इसलिए अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक है। तीसरी, सरकारी नौकरियों में आरक्षण की उच्चतम सीमा क्या हो- क्या 50 प्रतिशत नौकरियों को आरक्षित कर देना उचित होगा? ये तीनों प्रश्न कई मुकदमों में कई उच्च न्यायालयों द्वारा विवेचित हो चुके हैं और इनके आधार पर दिए गए निर्णयों के बावजूद देश के अनेक राज्यों में आरक्षण-व्यवस्था सफलतापूर्वक बिना सड़कों पर खून बहाए, सुचारू रूप से चल रही है। यदि विश्वनाथ प्रताप की सरकार सिर्फ राजनीतिक उद्देश्य से मंडल आयोग का दुरुपयोग नहीं कर रही है तो उसके लिए सचमुच यह एक ऐसा अवसर है, कि सामाजिक न्याय के आवश्यक अस्त्र के रूप में आरक्षण व्यवस्था को वह वैधानिक, नैतिक और अंततः व्यावहारिक स्वरूप दिलवा सकती है। वह मंडल आयोग के रूप में भी हो सकता है और मुंगेरी लाल आयोग के रूप में भी या दक्षिण में लागू अन्य किसी भी आरक्षण व्यवस्था के रूप में इसे लागू कर सकते हैं। शर्त सिर्फ यही है कि सरकार सदाशयी हो और ईमानदारी से न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करे। साथ ही, आंदोलनकारी युवा छात्रों को यह विश्वास दिलाने में भी सफल हो सके कि वह सिर्फ सामाजिक न्याय दिलाने के लिए ही प्रतिबद्ध नहीं है, बल्कि वह इस दिशा मं भी सार्थक कदम उठाने जा रही है, जिससे देश के युवाओं में व्याप्त हताशा और कुंठा की ऊर्जा का राष्ट्र निर्माण में सदुपयोग किया जा सके, न कि आत्मदाह या आत्महत्या जैसे पलायनवादी कर्म में। सरकार की विश्वसनीयता फिलहाल शून्य के बराबर है, इसलिए शब्द चाहे वे कितने ही पवित्र क्यों न हों अभी खोखले ही लगेंगे, इसलिए सरकार इस मोहलत को चाहे तो कर्म के रूप में सार्थक उपयोग कर सकती है। सार्थक संवाद तभी बन सकेगा।
9 अक्टूबर 1990, नव भारत टाइम्स
यह सच है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनकी सरकार को उच्चतम न्यायालय की कृपा से एक बड़ी मोहलत मिली है वरना समाज में भावनाओं का अतिरेक उस सीमा पर पहुंचा हुआ था, जहां सच तो क्या कुछ भी सुनने के लिए लोग तैयार नहीं दीख रहे थे अब मौका है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह अपनी स्थिति स्पष्ट करें कि क्या सचमुच उनका उद्देश्य सिर्फ यही था कि वेदेवीलाल की किसान रैली की हवा निकाल दें। यदि हां, तो अब भी देर नहीं हुई है। कृपया मंडल आयोग तत्काल वापस कर लें। या यदि उनका उद्देश्य सिर्फ यही था कि इसे लागू करने से उनको वोट बैंक का नया आधार मिलेगा तो उनकी राजनीतिक सूझबूझ पर तरस खाना आना चाहिए क्योंकि पिछड़ी जातियों का वोट बैंक तो इस सरकार के साथ था ही और न ही दूर दूर तक इस बात की कहीं आशंका थी कि यह आधार खिसक कर कहीं और जाने वाला है। यह कहा जा सकता है कि यह वोट बैंक विश्वनाथ प्रताप का अपना नहीं था। इस आधार को बनाने में कहीं लालू-मुलायम, तो कहीं शरद-रामविलास जैसे क्षत्रपों का उन्हें सहारा लेना पड़ता था, इसलिए अपना निजी ठोस आधार बनाने के चक्कर में विश्वनाथ प्रताप ने अपने जनमोर्चा आधार की सारी जमा पूंजी दांव पर लगा कर इस पिछड़े वोट बैंक के व्यापक जनाधार को जीतने का जुआ खेला। यदि सचमुच विश्वनाथ प्रताप की इतनी सीमित महत्वाकांक्षा थी, जिसके लिए उन्होंने छात्र, शिक्षक, वकील, बुद्धिजीवी जैसे मुखर समर्थक वर्ग को तथाकथित जाति युद्ध में झांक दिया, तो उनके राजनीतिक ज्ञान और निर्वाचनी समीकरण का भगवान ही मालिक है। यदि सचमुच ऐसा ही है तो कृपया मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के अपने फैसले को तत्काल निरस्त करने के आदेश जारी कर दें। अभी बहुत देर नहीं हुई है। यदि महत्वाकांक्षाओं के अपने इस नितांत निजी समुद्र में ही वे डूब उतरा रहे हैं, तो सचमुच उनके लिए मोहलत शब्द तिनके का सहारा साबित हो सकता है उसे छोड़े नहीं, सामाजिक न्याय भले ही पीछे पड़ जाए।
लेकिन यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा इन टुच्चे स्वार्थों के लिए नहीं बल्कि जैसा कि वे कह रहे हैं पिछड़े वर्गों में तेजी से बढ़ रहे आक्रोश और शहर तथा अभिजात्य वर्ग विरोधी भावना को रोकने के लिए यह समाज में व्याप्त उग्रविभाजन की भावना को कम करने के लिए या पिछड़े वर्ग को राज्य संचालन में उनकी उचित निर्णायक भूमिका दिलाने के लिए या सिर्फ सामाजिक-आर्थिक न्याय दिलाने की दिशा में उठाए गए पहले कदम के रूप में यह कार्रवाई की गई है, तो प्रधानमंत्री को इस दिशा में निस्संकोच आगे बढ़ना चाहिए।(मोहलत दिलाने वाले उस वर्ग को धन्यवाद देते हुए) क्योंकि वातावरण निश्चय ही इतना विषाक्त हो गया था और माहौल में चलते मानव मांस की चिराइन गंध कुछ इस कदर हावी थी कि उसमें सामाजिक न्याय दिलाने की बात तो दूर, किसी भी प्रकार का सार्थक-असार्थक संवाद संभव ही नहीं था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि विश्वनाथ प्रताप फिलहाल समाज के सबसे प्रभावशाली और मुखर वर्ग में घोर अलोकप्रिय हो रहे हैं। वे निश्चय ही इस तथ्य से भी अवगत होंगे कि इस महत्वपूर्ण वर्ग को अपनी ओर रख कर इस देश में निर्वाचनी राजनीति सफलतापूर्वक करना असंभव तो नहीं, लेकिन कठिन अवश्य है। अब तक तक किसी भी राजनेता ने इस कठिन रास्ते को अपनाने की कोशिश भी नहीं की। ऐसी स्थिति में यदि विश्वनाथ प्रताप अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता पर डटे रहते हैं तो यह तय है कि इस देश की राजनीति की दिशा और इस समाज के पारंपरिक ढांचे में ऐसे मूलभूत परिवर्तन आएंगे, जिसकी इस देश-समाज ने कल्पना भी नहीं की होगी। हो सकता है कि इस महती प्रक्रिया से विश्वनाथ प्रताप और उनकी पार्टी अगला चुनाव हार जाए, लेकिन यदि वे सचमुच समता मूलक समाज के निर्धारण के लिए प्रतिबद्ध हैं तो देश इस बलिदान के लिए उनका कृतज्ञ रहेगा और उनके खुद के दामन पर जो टुच्ची राजनीति के छींटे डाल दिए गए हैं, उनसे भी वे मुक्त हो पाएंगे। विश्वनाथ प्रताप यदि पिछड़े एवं दलित वर्गों के शोषण के कुचक्र को तोड़ कर वास्तविक सामाजिक-आर्थिक बराबरी की दिशा में बढ़ने के प्रयास के रूप में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की बात कर रहे हैं तो मंडल आयोग के प्रश्न पर पीछे नहीं हटें, और इस मोहलत का उपयोग सरकार की इस प्रतिबद्धता को और दृढ़ करने के एक अवसर के रूप में करें।
कानूनी लड़ाई मूलतः तीन मुद्दों पर लड़ी जाएगी। एक, संविधान सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने की गारंटी देता है, पिछड़ी जातियों को नहीं। दो, जातियों की गणना और उनकी पहचान का आधार चूंकि 60 साल पुराना है, इसलिए अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक है। तीसरी, सरकारी नौकरियों में आरक्षण की उच्चतम सीमा क्या हो- क्या 50 प्रतिशत नौकरियों को आरक्षित कर देना उचित होगा? ये तीनों प्रश्न कई मुकदमों में कई उच्च न्यायालयों द्वारा विवेचित हो चुके हैं और इनके आधार पर दिए गए निर्णयों के बावजूद देश के अनेक राज्यों में आरक्षण-व्यवस्था सफलतापूर्वक बिना सड़कों पर खून बहाए, सुचारू रूप से चल रही है। यदि विश्वनाथ प्रताप की सरकार सिर्फ राजनीतिक उद्देश्य से मंडल आयोग का दुरुपयोग नहीं कर रही है तो उसके लिए सचमुच यह एक ऐसा अवसर है, कि सामाजिक न्याय के आवश्यक अस्त्र के रूप में आरक्षण व्यवस्था को वह वैधानिक, नैतिक और अंततः व्यावहारिक स्वरूप दिलवा सकती है। वह मंडल आयोग के रूप में भी हो सकता है और मुंगेरी लाल आयोग के रूप में भी या दक्षिण में लागू अन्य किसी भी आरक्षण व्यवस्था के रूप में इसे लागू कर सकते हैं। शर्त सिर्फ यही है कि सरकार सदाशयी हो और ईमानदारी से न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करे। साथ ही, आंदोलनकारी युवा छात्रों को यह विश्वास दिलाने में भी सफल हो सके कि वह सिर्फ सामाजिक न्याय दिलाने के लिए ही प्रतिबद्ध नहीं है, बल्कि वह इस दिशा मं भी सार्थक कदम उठाने जा रही है, जिससे देश के युवाओं में व्याप्त हताशा और कुंठा की ऊर्जा का राष्ट्र निर्माण में सदुपयोग किया जा सके, न कि आत्मदाह या आत्महत्या जैसे पलायनवादी कर्म में। सरकार की विश्वसनीयता फिलहाल शून्य के बराबर है, इसलिए शब्द चाहे वे कितने ही पवित्र क्यों न हों अभी खोखले ही लगेंगे, इसलिए सरकार इस मोहलत को चाहे तो कर्म के रूप में सार्थक उपयोग कर सकती है। सार्थक संवाद तभी बन सकेगा।
9 अक्टूबर 1990, नव भारत टाइम्स
बुधवार, 5 अक्टूबर 2011
बदलाव से नावाकिफ कांग्रेस-भाजपा
मंडल आयोग की रिपोर्ट करीब करीब सभी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के गले की फांस बन गई है। पार्टिया न तो इसे अंतर से स्वीकार कर पा रही हैं, न ही दिल खोल कर इसका विरोध कर पा रही हैं। सब से विकट स्थिति भाजपा और कांग्रेस की है क्योंकि इन पार्टियों का नेतृत्व तो अब भी पारंपरिक श्रेष्ठी वर्ग के हाथों में है, जबकि इनके जनाधार का वर्ग चरित्र धीरे-धीरे खिसक कर नीचे चला गया है। यही कारण है कि इन पार्टियों का नेतृत्व निजी बातचीत में इस मुद्दे पर जो रुख अखितयार करता है, सार्वजनिक जीवन और व्यवहार में उसी आधार पर टिक नहीं पा रहा है क्योंकि जनाधार का दबाव नेतृत्व को कहीं न कहीं मजबूर कर रहा है कि वह कोई आरक्षण विरोधी रवैया अख्तियार न कर सके। जिसका परिणाम यह हो रहा है कि राजीव गांधी पहले तो कोशिश करते हैं कि वे कुछ बोलें ही नहीं, फिर जब बोलते हैं तो जो राजीव फार्मूला बड़े धूमधाम से जनता के सामने पेश किया जाता है दूसरे दिन खुद उससे दूर खड़े दिखते हैं। फिर (मणि शंकर अय्यर आदि सहयोगियों के अथक प्रयास से) वे लोकसभा में तीन घंटे का एक भाषण देते हैं जिसका लब्बोलुआब यह निकलता है कि आरक्षण का आधार केवल आर्थिक ही हो सकता है लेकिन जब उन्हें याद दिलाया जाता है कि आंध्र और कर्नाटक जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में जाति पर आधारित आरक्षण सफलतापूर्वक चल रहा है तो घबरा कर दूसरे दिन फिर वे अपनी बात बदल देते हैं। कुल मिला कर राजीव गांधी और उनके दल के वरिष्ठ नेताओं के वक्तव्यों और भाषणों के आधार पर कोई भी यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि आरक्षण के मामले में कांग्रेस आखिर कहां खड़ी है।
कारण यह है कि भारतीय राजनीति का सामाजिक चेहरा किस जाति से बदला है, मुख्य राजनीतिक दलों के नेताओं को संभवतः इसका अंदाजा ही नहीं है। सन 1984 की लोकसभा के कुल 543 में 210 यानी 40 प्रतिशत सदस्य ब्राहमण थे, जबकि 1989 की लोकसभा के कुल 525 में सिर्फ 76 यानी 15 प्रतिशत सदस्य ब्राह्मण हैं। लोकसभा में ब्राहमणों का प्रतिशत इतना कम इससे पहले कभी नहीं रहा है। 1977 में जब कांग्रेस हारी थी तब भी 25 प्रतिशत ब्राह्मण चुन कर आए थे और 1957 में तो लोकसभा के कुल सांसदों का 47 प्रतिशत स्थान ब्राह्मणें के कब्जे में था। इसमें पहले की आठों लोकसभाओं में ब्राह्मण सदस्यों का प्रतिशत हमेशा ही 40 के आसपास रहा है जो नौंवी लोकसभा में घट कर 15 पर आ गया है जबकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ब्राह्मणें को टिकट देने में कोई कोताही नहीं की। भाजपा के कुल 226 में से 113 प्रत्याशी ब्राह्मण जाति के थे, जिनमे से 24 जीत कर भी आए और इतने ही कांग्रेस से भी जीत कर आए जबकि इन दलों के नेताओं को शायद इसका अहसास भी नहीं हुआ और कांग्रेस तथा भाजपा के क्रमशः 82 तथा 37 सदस्य इस बार पिछड़ी जातियों से चुन कर आ गए और पहली बार इन पार्टियों के संसदीय दल का एक नया चेहरा सामने आया। इन पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व शायद इस तथ्य को अभी ठीक से आत्मसात नहीं कर पाया है इसीलिए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के सवाल पर वे पार्टियां कोई ठोस मन नहीं बना पा रही हैं क्योंकि मन जो कहता है पार्टी की आंतरिक शक्ति तत्काल उस पर हावी हो कर उसे बदलवाने के लिए बाध्य कर देती है। मंडल आयोग के तत्काल बाद इन पार्टियों के कुछ नेताओं ने चेतावनी दी कि इस निर्णय से भीषण जातीय तनाव बढ़ेगा, जो अंततः गृह युद्ध में परिणत हो सकता हैं मजे की बात है कि जातीय तनाव तो बढ़ा परंतु गृह युद्ध गुप्त रूप से इन पार्टियों के अंदर लड़े जा रहे हैं, समाज में नहीं।
कांग्रेस की तो और भी दुर्दशा है, क्योंकि इस पार्टी के नेतृत्व में सामाजिक परिवर्तन के कई बड़े महत्वपूर्ण संघर्ष दक्षिण और पश्चिम भारत में शांतिपूर्वक छेड़े गए, जिन्होंने न केवल उन राज्यों में एक सामाजिक क्रांति की, बल्कि उन राज्यों का राजनीतिक स्वरूप भी पूरी तरह से बदल दिया और आज यही पार्टी उत्तर भारत के कुछ नेताओं के बहकावे में आकर आरक्षण और राजनीति में पिछड़ी जातियों के उभार के प्रश्न पर ऐसा प्रतिगामी सोच सामने ला रही है जिससे उत्तर भारत में इस पार्टी का आधार तो संकुचित होगा ही, दक्षिण भारत में भी इसकी जीम जमाई जड़ भी हिल सकती है। जाति आधारित आरक्षण और उससे उपजी राजनीति के बल पर ही कर्नाटक में कांग्रेस ने पिछड़ी दलित और अल्पसंख्यक जातियों तथा वर्गों का एक ऐसा मोर्चा बनाया था कि देवराज अर्स को लिंगायतों तथा वोक्कालिगाओं जैसी शक्तिशाली जातियों को राज्य की राजनीति में दरकिनार कर देने में सफलता मिली। पिछले 25 सालों से कांग्रेस तमिलनाडु में किसी द्रविड़ पार्टी से जुड़ी रही है जो पिछड़ी दलित जातियों की उग्र राजनीतिक आकांक्षाओं की देश में सबसे बड़ी अभिव्यक्ति कही जा सकती है। आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस को इस जाति आधारित रणनीति के कारण ही सत्ता वापस मिली है, इस तथ्य को कांग्रेस नेतृत्व झुठला नहीं सकता। आंध्र की राजनीति में एन टी रामाराव के उदय से पहले राज्य राजनीति की बागडोर रेड्डी जाति के हाथों में थी और यह जाति पूरे तौर पर कांग्रेस के साथ थी। इस वर्चस्व को एन टी आर ने कम्मा और कापू जाति के नेतृत्व में बने नए राजनीतिक समीकरण से तोड़ा और तब तक शक्तिशाली बने रहे जब तक कांग्रेस को कापुओं के रूप में एक नई शक्तिशाली पिछड़ी जाति समूह का समर्थन नहीं प्राप्त हो गया। रेड्डी-कापू सहयोग के कारण ही आज चन्ना रेड्डी की कांगेस सरकार हैदराबाद में स्थापित दीख रही है। दक्षिण भारत तथा महाराष्ट्र और गुजरात में पिछड़ी जातियों के वोट बैंक के आधार पर बने राजनीतिक समीकरणों से अपनी गोटी लाल करने वाली कांग्रेस पार्टी को ब्राह्ण वर्चस्व वाला स्वरूप हमेशा से उत्तर भारत देता रहा है। इस बार उत्तर भारत में कांग्रेस धराशायी है लेकिन नेतृत्व बरकरार है जबकि लोकसभा में इस पार्टी के कुल सांसदों का 40 प्रतिशत पिछड़ी जातियों से चुन कर आ गया है। आरक्षण के प्रश्न पर पार्टी के इस विरोधाभासी कदम का मुख्य कारण यही है कि पार्टी नेतृत्व जब जगन्नाथ मिश्र की ओर देखता है तो आरक्षण के सवाल पर उत्तर भारत में लाभ उठाने का लोभ संवरण नहीं कर पाता और तभी जब शिवशंकर का चेहरा सामने आता है तो अपनी पार्टी की जमीनी वास्तविकात का स्वरूप सामने उभर आता है और राजीव गांधी यह कहने के लिए विवश हो जाते हैं कि उनकी पार्टी सामाजिक-शैक्षिक रूप से पिछड़ों को आरक्षण देने के विरुद्ध नहीं है। लेकिन आर्थिक आधार पर भी विचार किया जाए और अगले दिन फिर अपने विचार बदल देते हैं। राजीव गांधी और लालकृष्ण आडवाणी जब तक अपनी राजनीतिक विवशताओं को अनदेखी करने का स्वांग करते रहेंगे उनके विरोधाभास इसी तरह सामने आते रहेंगे।
11 सितंबर 1990, नव भारत टाइम्स
कारण यह है कि भारतीय राजनीति का सामाजिक चेहरा किस जाति से बदला है, मुख्य राजनीतिक दलों के नेताओं को संभवतः इसका अंदाजा ही नहीं है। सन 1984 की लोकसभा के कुल 543 में 210 यानी 40 प्रतिशत सदस्य ब्राहमण थे, जबकि 1989 की लोकसभा के कुल 525 में सिर्फ 76 यानी 15 प्रतिशत सदस्य ब्राह्मण हैं। लोकसभा में ब्राहमणों का प्रतिशत इतना कम इससे पहले कभी नहीं रहा है। 1977 में जब कांग्रेस हारी थी तब भी 25 प्रतिशत ब्राह्मण चुन कर आए थे और 1957 में तो लोकसभा के कुल सांसदों का 47 प्रतिशत स्थान ब्राह्मणें के कब्जे में था। इसमें पहले की आठों लोकसभाओं में ब्राह्मण सदस्यों का प्रतिशत हमेशा ही 40 के आसपास रहा है जो नौंवी लोकसभा में घट कर 15 पर आ गया है जबकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ब्राह्मणें को टिकट देने में कोई कोताही नहीं की। भाजपा के कुल 226 में से 113 प्रत्याशी ब्राह्मण जाति के थे, जिनमे से 24 जीत कर भी आए और इतने ही कांग्रेस से भी जीत कर आए जबकि इन दलों के नेताओं को शायद इसका अहसास भी नहीं हुआ और कांग्रेस तथा भाजपा के क्रमशः 82 तथा 37 सदस्य इस बार पिछड़ी जातियों से चुन कर आ गए और पहली बार इन पार्टियों के संसदीय दल का एक नया चेहरा सामने आया। इन पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व शायद इस तथ्य को अभी ठीक से आत्मसात नहीं कर पाया है इसीलिए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के सवाल पर वे पार्टियां कोई ठोस मन नहीं बना पा रही हैं क्योंकि मन जो कहता है पार्टी की आंतरिक शक्ति तत्काल उस पर हावी हो कर उसे बदलवाने के लिए बाध्य कर देती है। मंडल आयोग के तत्काल बाद इन पार्टियों के कुछ नेताओं ने चेतावनी दी कि इस निर्णय से भीषण जातीय तनाव बढ़ेगा, जो अंततः गृह युद्ध में परिणत हो सकता हैं मजे की बात है कि जातीय तनाव तो बढ़ा परंतु गृह युद्ध गुप्त रूप से इन पार्टियों के अंदर लड़े जा रहे हैं, समाज में नहीं।
कांग्रेस की तो और भी दुर्दशा है, क्योंकि इस पार्टी के नेतृत्व में सामाजिक परिवर्तन के कई बड़े महत्वपूर्ण संघर्ष दक्षिण और पश्चिम भारत में शांतिपूर्वक छेड़े गए, जिन्होंने न केवल उन राज्यों में एक सामाजिक क्रांति की, बल्कि उन राज्यों का राजनीतिक स्वरूप भी पूरी तरह से बदल दिया और आज यही पार्टी उत्तर भारत के कुछ नेताओं के बहकावे में आकर आरक्षण और राजनीति में पिछड़ी जातियों के उभार के प्रश्न पर ऐसा प्रतिगामी सोच सामने ला रही है जिससे उत्तर भारत में इस पार्टी का आधार तो संकुचित होगा ही, दक्षिण भारत में भी इसकी जीम जमाई जड़ भी हिल सकती है। जाति आधारित आरक्षण और उससे उपजी राजनीति के बल पर ही कर्नाटक में कांग्रेस ने पिछड़ी दलित और अल्पसंख्यक जातियों तथा वर्गों का एक ऐसा मोर्चा बनाया था कि देवराज अर्स को लिंगायतों तथा वोक्कालिगाओं जैसी शक्तिशाली जातियों को राज्य की राजनीति में दरकिनार कर देने में सफलता मिली। पिछले 25 सालों से कांग्रेस तमिलनाडु में किसी द्रविड़ पार्टी से जुड़ी रही है जो पिछड़ी दलित जातियों की उग्र राजनीतिक आकांक्षाओं की देश में सबसे बड़ी अभिव्यक्ति कही जा सकती है। आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस को इस जाति आधारित रणनीति के कारण ही सत्ता वापस मिली है, इस तथ्य को कांग्रेस नेतृत्व झुठला नहीं सकता। आंध्र की राजनीति में एन टी रामाराव के उदय से पहले राज्य राजनीति की बागडोर रेड्डी जाति के हाथों में थी और यह जाति पूरे तौर पर कांग्रेस के साथ थी। इस वर्चस्व को एन टी आर ने कम्मा और कापू जाति के नेतृत्व में बने नए राजनीतिक समीकरण से तोड़ा और तब तक शक्तिशाली बने रहे जब तक कांग्रेस को कापुओं के रूप में एक नई शक्तिशाली पिछड़ी जाति समूह का समर्थन नहीं प्राप्त हो गया। रेड्डी-कापू सहयोग के कारण ही आज चन्ना रेड्डी की कांगेस सरकार हैदराबाद में स्थापित दीख रही है। दक्षिण भारत तथा महाराष्ट्र और गुजरात में पिछड़ी जातियों के वोट बैंक के आधार पर बने राजनीतिक समीकरणों से अपनी गोटी लाल करने वाली कांग्रेस पार्टी को ब्राह्ण वर्चस्व वाला स्वरूप हमेशा से उत्तर भारत देता रहा है। इस बार उत्तर भारत में कांग्रेस धराशायी है लेकिन नेतृत्व बरकरार है जबकि लोकसभा में इस पार्टी के कुल सांसदों का 40 प्रतिशत पिछड़ी जातियों से चुन कर आ गया है। आरक्षण के प्रश्न पर पार्टी के इस विरोधाभासी कदम का मुख्य कारण यही है कि पार्टी नेतृत्व जब जगन्नाथ मिश्र की ओर देखता है तो आरक्षण के सवाल पर उत्तर भारत में लाभ उठाने का लोभ संवरण नहीं कर पाता और तभी जब शिवशंकर का चेहरा सामने आता है तो अपनी पार्टी की जमीनी वास्तविकात का स्वरूप सामने उभर आता है और राजीव गांधी यह कहने के लिए विवश हो जाते हैं कि उनकी पार्टी सामाजिक-शैक्षिक रूप से पिछड़ों को आरक्षण देने के विरुद्ध नहीं है। लेकिन आर्थिक आधार पर भी विचार किया जाए और अगले दिन फिर अपने विचार बदल देते हैं। राजीव गांधी और लालकृष्ण आडवाणी जब तक अपनी राजनीतिक विवशताओं को अनदेखी करने का स्वांग करते रहेंगे उनके विरोधाभास इसी तरह सामने आते रहेंगे।
11 सितंबर 1990, नव भारत टाइम्स
सामाजिक विषमता की खाई पाटनी है
मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर पिछड़े वर्ग के लोगों को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण देने के सरकारी निर्णय के विरोध में तीन तर्क काफी महत्त्वपूर्ण ढंग से उभरकर सामने आए हैं। पहला, यह निर्णय संविधान प्रदत समानता के मौलिक अधिकार के विरुद्ध है; दूसरा, संविधान शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों को एक सीमित समय के लिए आरक्षण की बात करता है, पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने की बात नहीं कही गई है; तीसरा, यदि नैसर्गिक प्रतिभा और योग्यता को दरकिनार कर, पिछड़ेपन के आधार पर सरकारी नौकरियों में नियुक्ति होती रही, तो हमारी कार्यपालिका के उच्च स्तर का क्या होगा?
सबसे पहले संविधान प्रदत्त समानता के मौलिक अधिकार के प्रश्न को लें। यह सही है कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 29 इस बात की गारंटी देते है कि किसी भी प्रकार की सरकारी नौकरी या शिक्षण संस्थान में प्रवेश के मामले में धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, भाषा या जन्म-स्थान के आधार पर नागरिकों में भेदभाव नहीं किया जाएगा। साथ ही, अनुच्छेद 16 (4) यह गारंटी भी देता है कि राज्य पिछड़े हुए नागरिकों के पक्ष में, यदि राज्य की मान्यता है कि उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है, तो पदों व नियुक्तियों के आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है। आज जो लोग विधि के समक्ष समता या लोक नियोजन में अवसर की समता की संविधानिक गारंटी की बात उठाकर आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, वे एक तरफ तो अनुच्छेद 16 (4) को जान-बूझकर अनदेखा करने की कोशिश कर रहे हैं, दूसरे, समता के अधिकार की भ्रामक व्यवस्था कर ऐसा मकड़जाल फैला रहे हैं, जिसमें वास्तविकता ओझल हो जाए। यह सवाल बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल के समक्ष भी उठाया गया था, जिसका समुचित जवाब उन्होंने यों दिया था कि समता के समान अवसर के मौलिक अधिकार की बात उठाते हुए हम यह भूल जाते हैं कि समाज का यह पिछड़ा वर्ग सैकड़ों सालों से सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक तथा आर्थिक वंचना का शिकार है, इसलिए इस वर्ग की समस्याएं भी विशिष्ट हैं। ऊपरी तौर पर समता का सिद्धांत बहुत ही उचित और न्यायसंगत लगता है, लेकिन इसमें एक बड़ी फांस है। सामाजिक न्याय की यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उक्ति है कि समानता सिर्फ समान लोगों के बीच ही हो सकती है।
असमान लोगों के बीच समानता की बात करना वस्तुतः असमानता को बढ़ावा देने का ही एक तरीका है। जब हम कमजोर और मजबूत के बीच समानता के सिद्धांत के आधार पर प्रतियोगिता की छूट देते हैं, तब हमें पता होता है कि कमजोर इसमें निश्चित हारेगा। वस्तुतः यह प्रतियोगिता नहीं, सिर्फ उसका नाटक रह जाता है। इस तरह की बात सामाजिक न्याय कर समाज में हम परोक्ष रूप से जंगल के उस न्याय की ताईद कर रहे होते हैं, जहां बलिष्ठतम को ही सारे अधिकार मिले होते हैं। जो विद्वान आज अचानक समता के अधिकार की मूल भावना की बात कर रहे हैं, वे इस तथ्य से परिचित नहीं, ऐसा नहीं है, यह सिर्फ इसलिए किया जा रहा है ताकि इस सामाजिक असमानता की धारा को सदियों तक निर्बाध चलाने के लिए उन्हें कुछ नैतिक तथा तथाकथित विधिसम्मत तर्क मिल सकें। जबकि वास्तविकता यह है कि न तो यह आरक्षण संविधान विरुद्ध है, न ही संविधान की मूल भावना के विपरीत जाता है।
आरक्षण विरोधियों का दूसरा तर्क है कि चलिए, यह मान लिया जाए कि संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए इस प्रकार के आरक्षण की बात कही गई है, पर पिछड़ी जातियों के आरक्षण की बात तो कहीं नहीं है, इसलिए जाति के आधार पर किया गया आरक्षण संविधान सम्मत नहीं हो सकता। चूंकि संविधान ‘पिछड़े वर्ग’ के आरक्षण की बात करता है, इसलिए यह तर्क आर्थिक पिछड़ेपन को ही आरक्षण का एक मात्रा आधार बनाने के बिंदु पर पहुंचकर समाप्त होता है। इस प्रक्रिया में ढेर सारे ऐसे मुद्दे अनावश्यक रूप से घसीट लिए जाते हैं ताकि तर्क धुंधलाएं और बहस का रुख गलत दिशा की ओर मुड़ जाए। इस दौरान अपनी सहूलियत को ध्यान में रखते हुए हम यह भी भूल जाते हैं कि इसी संविधान के तहत अनुसूचित जातियां और जन जातियां आरक्षण पा रही हैं। जाहिर है कि इन्हें आरक्षण प्रदान करते समय भी, उसका आधार ढूँढा गया था और जाति के अतिरिक्त कोई दूसरा ऐसा मजबूत आधार नहीं मिला, जिससे हिन्दू समाज के सर्वाधिक पिछड़े वर्ग की पहचान की जा सके।
यह ध्यान देने की बात है कि मंडल आयोग या अन्य दस राज्यों में लागू विभिन्न आयोगों ने शैक्षिक और सामाजिक पिछड़े वर्ग को रेखांकित करने के लिए ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ की सूची बनाई है। चूंकि पिछड़ी जातियां पहले ही अनुसूचित जातियों के रूप में चिद्दित की जा चुकी हैं, इसलिए इन ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ की सूची, ताकि इन्हें आरक्षण देकर इनका सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन दूर किया जा सके। इसलिए यह कहना कि संविधान वर्ग की बात करता है, जाति की नहीं, यह सिर्फ अर्धसत्य है क्योंकि यही संविधान इससे पहले भी जाति को ही वर्ग का आधार मान चुका है। रही बात आर्थिक आधार पर आरक्षण की, तो यह तो आरक्षण और संविधान, दोनों की मूल भावना के विरुद्ध जाने वाली बात है। आरक्षण की आवश्यकता इसलिए नहीं महसूस की गई कि इससे समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता दूर होगी, न ही आरक्षण का प्रावधान करने वालों ने कभी यह सोचा था कि यह कोई रोजगार दिलाऊ योजना होगी, आरक्षण की आवश्यकता समाज में व्याप्त शैक्षिक और सामाजिक गैर बराबरी दूर करने के लिए महसूस की गई थी, इसलिए इस आधार से हटकर किसी नए आधार पर आरक्षण की बात करना संविधान की मूल भावना के विपरीत होगा और फिलहाल यह विचारणीय भी नहीं है।
आरक्षण के विरोध का तीसरा और सबसे मजबूत तर्क योग्यता दिया जाता है। जो आरक्षण विरोधी यह स्वीकार करते हैं कि हमारे समाज में असमानता है और यह तत्काल संभव नहीं कि पिछड़े इतनी बड़ी खाई को लाँघकर अगड़ों की बराबरी कर पाएं, इसलिए निश्चय ही इन्हें कुछ विशेष प्रोत्साहन मिलना चाहिए मसलन, मुफ्त और व्यापक शिक्षा तथा और सारी छूट, जिनसे ये समाज में आगे आ सकें, लेकिन इसका अर्थ तो यह नहीं हुआ कि सवर्ण छात्रा 75 प्रतिशत अंक पाकर भी मेडिकल, इंजीनियरिंग या अन्य तकनीकी शिक्षा में दाखिला न पा सकें और पिछड़े या दलित 40 या 45 प्रतिशत अंकों के सहारे ही इन विशिष्ट पाठ्यक्रमों में दाखिल हो जाएं। ऐसे में योग्यता का क्या अर्थ रह जाएगा और क्या इसे उचित कहा जाएगा कि अयोग्य लोग ऊंची-ऊंची डिग्रियां लेकर बड़े पदों पर पहुंचें और योग्य लोग सिर्फ इसलिए भटकते रहें, क्योंकि उनका जन्म सवर्ण कोख से हुआ है।
निश्चय ही बहुत जोरदार तर्क है और आज हमारे शहरी मध्य और उच्च मध्य वर्ग के सवर्ण अभिभावकों को सबसे ज्यादा विचलित करने वाला भी है। लेकिन, जैसा कि बी.पी. मंडल ने सोदाहरण अपनी रिपोर्ट में साबित किया है कि ऊपर से यह बात चाहे जितनी शक्तिशाली लगे, लेकिन यदि थोड़ी गहराई में उतरें तो पता चलेगा कि यह विचार कितने बड़े तर्क दोष से ग्रस्त है।
श्री मंडल ने मोहन और लल्लू नामक दो बालकों के उदाहरण से इस बात को सिद्ध किया है कि श्रेष्ठ समाज में योग्यता जन्मना दान तथा परिवेशगत विशेषाधिकार से प्राप्त होती है। मोहन के मां-बाप मध्यवर्गीय शिक्षित लोग हैं। वह शहर के एक बड़े स्कूल में पढ़ता है, जहां पढ़ने के अलावा वह स्कूल की ढेर सारी अन्य गतिविधियों में भाग लेता है। घर में उसके लिए एक अलग कमरा है और उसके अध्ययन में उसके मां-बाप, दोनों सहायता करते है। घर में रेडियो और टेलीविजन है। पिता ढेर सारे अखबार और पत्र-पत्रिाकाएं लाते है। मोहन क्या पढ़ेगा, कौन-सा कोर्स करेगा, इस बाबत उसके अभिभावक हमेशा उससे चर्चा करते हैं और निर्देश देते है। मोहन के मित्रा भी उस वर्ग के हैं और उसे यह भी पता है कि भविष्य में उसे कहां पहुंचना है। जबकि लल्लू गाँव में रहता है। पिछड़ी जाति के उसके मां-बाप की गाँव में सामाजिक स्थिति निम्न है। गाँव में उसके चार एकड़ खेत हैं, जिसके उपार्जन से उसका आठ सदस्यीय परिवार दो कमरों के कच्चे मकान में जीवन-यापन करता है। किसी तरह वह गाँव से प्राइमरी शिक्षा पूरी करके पास के कस्बे से हाईस्कूल करता है और उच्च शिक्षा के लिए तहसील मुख्यालय में अपने दूर के चाचा के घर रहकर पढ़ाई करता है। परिवार, अभिभावक या अपने मित्रों से उसके कैरियर के बारे में कभी कोई बात नहीं होती, न ही कोई सहायता मिलती है। किन्हीं सांस्कृतिक गतिविधियों में वह भाग नहीं ले पाता और किसी तरह अपनी पढ़ाई पूरी कर लेता है। ग्रामीण वातावरण में पलने-बढ़ने के कारण उसके स्वभाव में एक अनगढ़ता है, उसका उच्चारण भ्रष्ट, व्यवहार अकुशल और आत्मविश्वास की उसमें थोड़ी कमी है।
मान लें कि जन्म के समय दोनों की बुद्धिमत्ता का स्तर यदि समान था, तो भी, वातावरण, परिवार, रहन-सहन तथा परिवेश के कारण किसी भी प्रतियोगिता में मोहन लल्लू से मीलों आगे रहेगा। यदि लल्लू का जानकारी कोश मोहन से बहुत ज्यादा भी रहा होता, तो भी मोहन अब किसी भी प्रतियोगिता में अपनी ‘योग्यता’ के आधार पर लल्लू से बहुत काबिल सिद्ध होगा। इसलिए सिर्फ योग्यता की बात करना या योग्य बनाने के लिए सही शिक्षा और अवसर की बात करना एक तरह से इस सामाजिक विषमता का बढ़ाने में ही मदद करेगा, क्योंकि आज यदि लल्लू जैसे लोगों को योग्य बनाने के लिए ईमानदारी से और ठोस प्रयास प्रारंभ भी किए जाएं, तो जब तक लल्लू मोहन के ‘स्तर’ पर पहुंचेगा, मोहन योग्य से योग्यतर और योग्यतम तक पहुंच चुका होगा। इसलिए फिलहाल आवश्यकता यह है कि इस तथाकथित योग्यता के तर्क को थोड़ी देर के लिए परे रखकर इस समस्या पर नए सिर से विचार किया जाए। मंडल आयोग को लागू करना इस सामाजिक विषमता की खाई को पाटने का एक तरीका हो सकता है, यदि इसकी भावना को समझकर इसे ईमानदारी से लागू होने दिया जाए।
28 अगस्त 1990, नवभारत टाइम्स
सबसे पहले संविधान प्रदत्त समानता के मौलिक अधिकार के प्रश्न को लें। यह सही है कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 29 इस बात की गारंटी देते है कि किसी भी प्रकार की सरकारी नौकरी या शिक्षण संस्थान में प्रवेश के मामले में धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, भाषा या जन्म-स्थान के आधार पर नागरिकों में भेदभाव नहीं किया जाएगा। साथ ही, अनुच्छेद 16 (4) यह गारंटी भी देता है कि राज्य पिछड़े हुए नागरिकों के पक्ष में, यदि राज्य की मान्यता है कि उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है, तो पदों व नियुक्तियों के आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है। आज जो लोग विधि के समक्ष समता या लोक नियोजन में अवसर की समता की संविधानिक गारंटी की बात उठाकर आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, वे एक तरफ तो अनुच्छेद 16 (4) को जान-बूझकर अनदेखा करने की कोशिश कर रहे हैं, दूसरे, समता के अधिकार की भ्रामक व्यवस्था कर ऐसा मकड़जाल फैला रहे हैं, जिसमें वास्तविकता ओझल हो जाए। यह सवाल बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल के समक्ष भी उठाया गया था, जिसका समुचित जवाब उन्होंने यों दिया था कि समता के समान अवसर के मौलिक अधिकार की बात उठाते हुए हम यह भूल जाते हैं कि समाज का यह पिछड़ा वर्ग सैकड़ों सालों से सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक तथा आर्थिक वंचना का शिकार है, इसलिए इस वर्ग की समस्याएं भी विशिष्ट हैं। ऊपरी तौर पर समता का सिद्धांत बहुत ही उचित और न्यायसंगत लगता है, लेकिन इसमें एक बड़ी फांस है। सामाजिक न्याय की यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उक्ति है कि समानता सिर्फ समान लोगों के बीच ही हो सकती है।
असमान लोगों के बीच समानता की बात करना वस्तुतः असमानता को बढ़ावा देने का ही एक तरीका है। जब हम कमजोर और मजबूत के बीच समानता के सिद्धांत के आधार पर प्रतियोगिता की छूट देते हैं, तब हमें पता होता है कि कमजोर इसमें निश्चित हारेगा। वस्तुतः यह प्रतियोगिता नहीं, सिर्फ उसका नाटक रह जाता है। इस तरह की बात सामाजिक न्याय कर समाज में हम परोक्ष रूप से जंगल के उस न्याय की ताईद कर रहे होते हैं, जहां बलिष्ठतम को ही सारे अधिकार मिले होते हैं। जो विद्वान आज अचानक समता के अधिकार की मूल भावना की बात कर रहे हैं, वे इस तथ्य से परिचित नहीं, ऐसा नहीं है, यह सिर्फ इसलिए किया जा रहा है ताकि इस सामाजिक असमानता की धारा को सदियों तक निर्बाध चलाने के लिए उन्हें कुछ नैतिक तथा तथाकथित विधिसम्मत तर्क मिल सकें। जबकि वास्तविकता यह है कि न तो यह आरक्षण संविधान विरुद्ध है, न ही संविधान की मूल भावना के विपरीत जाता है।
आरक्षण विरोधियों का दूसरा तर्क है कि चलिए, यह मान लिया जाए कि संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए इस प्रकार के आरक्षण की बात कही गई है, पर पिछड़ी जातियों के आरक्षण की बात तो कहीं नहीं है, इसलिए जाति के आधार पर किया गया आरक्षण संविधान सम्मत नहीं हो सकता। चूंकि संविधान ‘पिछड़े वर्ग’ के आरक्षण की बात करता है, इसलिए यह तर्क आर्थिक पिछड़ेपन को ही आरक्षण का एक मात्रा आधार बनाने के बिंदु पर पहुंचकर समाप्त होता है। इस प्रक्रिया में ढेर सारे ऐसे मुद्दे अनावश्यक रूप से घसीट लिए जाते हैं ताकि तर्क धुंधलाएं और बहस का रुख गलत दिशा की ओर मुड़ जाए। इस दौरान अपनी सहूलियत को ध्यान में रखते हुए हम यह भी भूल जाते हैं कि इसी संविधान के तहत अनुसूचित जातियां और जन जातियां आरक्षण पा रही हैं। जाहिर है कि इन्हें आरक्षण प्रदान करते समय भी, उसका आधार ढूँढा गया था और जाति के अतिरिक्त कोई दूसरा ऐसा मजबूत आधार नहीं मिला, जिससे हिन्दू समाज के सर्वाधिक पिछड़े वर्ग की पहचान की जा सके।
यह ध्यान देने की बात है कि मंडल आयोग या अन्य दस राज्यों में लागू विभिन्न आयोगों ने शैक्षिक और सामाजिक पिछड़े वर्ग को रेखांकित करने के लिए ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ की सूची बनाई है। चूंकि पिछड़ी जातियां पहले ही अनुसूचित जातियों के रूप में चिद्दित की जा चुकी हैं, इसलिए इन ‘अन्य पिछड़ी जातियों’ की सूची, ताकि इन्हें आरक्षण देकर इनका सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन दूर किया जा सके। इसलिए यह कहना कि संविधान वर्ग की बात करता है, जाति की नहीं, यह सिर्फ अर्धसत्य है क्योंकि यही संविधान इससे पहले भी जाति को ही वर्ग का आधार मान चुका है। रही बात आर्थिक आधार पर आरक्षण की, तो यह तो आरक्षण और संविधान, दोनों की मूल भावना के विरुद्ध जाने वाली बात है। आरक्षण की आवश्यकता इसलिए नहीं महसूस की गई कि इससे समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता दूर होगी, न ही आरक्षण का प्रावधान करने वालों ने कभी यह सोचा था कि यह कोई रोजगार दिलाऊ योजना होगी, आरक्षण की आवश्यकता समाज में व्याप्त शैक्षिक और सामाजिक गैर बराबरी दूर करने के लिए महसूस की गई थी, इसलिए इस आधार से हटकर किसी नए आधार पर आरक्षण की बात करना संविधान की मूल भावना के विपरीत होगा और फिलहाल यह विचारणीय भी नहीं है।
आरक्षण के विरोध का तीसरा और सबसे मजबूत तर्क योग्यता दिया जाता है। जो आरक्षण विरोधी यह स्वीकार करते हैं कि हमारे समाज में असमानता है और यह तत्काल संभव नहीं कि पिछड़े इतनी बड़ी खाई को लाँघकर अगड़ों की बराबरी कर पाएं, इसलिए निश्चय ही इन्हें कुछ विशेष प्रोत्साहन मिलना चाहिए मसलन, मुफ्त और व्यापक शिक्षा तथा और सारी छूट, जिनसे ये समाज में आगे आ सकें, लेकिन इसका अर्थ तो यह नहीं हुआ कि सवर्ण छात्रा 75 प्रतिशत अंक पाकर भी मेडिकल, इंजीनियरिंग या अन्य तकनीकी शिक्षा में दाखिला न पा सकें और पिछड़े या दलित 40 या 45 प्रतिशत अंकों के सहारे ही इन विशिष्ट पाठ्यक्रमों में दाखिल हो जाएं। ऐसे में योग्यता का क्या अर्थ रह जाएगा और क्या इसे उचित कहा जाएगा कि अयोग्य लोग ऊंची-ऊंची डिग्रियां लेकर बड़े पदों पर पहुंचें और योग्य लोग सिर्फ इसलिए भटकते रहें, क्योंकि उनका जन्म सवर्ण कोख से हुआ है।
निश्चय ही बहुत जोरदार तर्क है और आज हमारे शहरी मध्य और उच्च मध्य वर्ग के सवर्ण अभिभावकों को सबसे ज्यादा विचलित करने वाला भी है। लेकिन, जैसा कि बी.पी. मंडल ने सोदाहरण अपनी रिपोर्ट में साबित किया है कि ऊपर से यह बात चाहे जितनी शक्तिशाली लगे, लेकिन यदि थोड़ी गहराई में उतरें तो पता चलेगा कि यह विचार कितने बड़े तर्क दोष से ग्रस्त है।
श्री मंडल ने मोहन और लल्लू नामक दो बालकों के उदाहरण से इस बात को सिद्ध किया है कि श्रेष्ठ समाज में योग्यता जन्मना दान तथा परिवेशगत विशेषाधिकार से प्राप्त होती है। मोहन के मां-बाप मध्यवर्गीय शिक्षित लोग हैं। वह शहर के एक बड़े स्कूल में पढ़ता है, जहां पढ़ने के अलावा वह स्कूल की ढेर सारी अन्य गतिविधियों में भाग लेता है। घर में उसके लिए एक अलग कमरा है और उसके अध्ययन में उसके मां-बाप, दोनों सहायता करते है। घर में रेडियो और टेलीविजन है। पिता ढेर सारे अखबार और पत्र-पत्रिाकाएं लाते है। मोहन क्या पढ़ेगा, कौन-सा कोर्स करेगा, इस बाबत उसके अभिभावक हमेशा उससे चर्चा करते हैं और निर्देश देते है। मोहन के मित्रा भी उस वर्ग के हैं और उसे यह भी पता है कि भविष्य में उसे कहां पहुंचना है। जबकि लल्लू गाँव में रहता है। पिछड़ी जाति के उसके मां-बाप की गाँव में सामाजिक स्थिति निम्न है। गाँव में उसके चार एकड़ खेत हैं, जिसके उपार्जन से उसका आठ सदस्यीय परिवार दो कमरों के कच्चे मकान में जीवन-यापन करता है। किसी तरह वह गाँव से प्राइमरी शिक्षा पूरी करके पास के कस्बे से हाईस्कूल करता है और उच्च शिक्षा के लिए तहसील मुख्यालय में अपने दूर के चाचा के घर रहकर पढ़ाई करता है। परिवार, अभिभावक या अपने मित्रों से उसके कैरियर के बारे में कभी कोई बात नहीं होती, न ही कोई सहायता मिलती है। किन्हीं सांस्कृतिक गतिविधियों में वह भाग नहीं ले पाता और किसी तरह अपनी पढ़ाई पूरी कर लेता है। ग्रामीण वातावरण में पलने-बढ़ने के कारण उसके स्वभाव में एक अनगढ़ता है, उसका उच्चारण भ्रष्ट, व्यवहार अकुशल और आत्मविश्वास की उसमें थोड़ी कमी है।
मान लें कि जन्म के समय दोनों की बुद्धिमत्ता का स्तर यदि समान था, तो भी, वातावरण, परिवार, रहन-सहन तथा परिवेश के कारण किसी भी प्रतियोगिता में मोहन लल्लू से मीलों आगे रहेगा। यदि लल्लू का जानकारी कोश मोहन से बहुत ज्यादा भी रहा होता, तो भी मोहन अब किसी भी प्रतियोगिता में अपनी ‘योग्यता’ के आधार पर लल्लू से बहुत काबिल सिद्ध होगा। इसलिए सिर्फ योग्यता की बात करना या योग्य बनाने के लिए सही शिक्षा और अवसर की बात करना एक तरह से इस सामाजिक विषमता का बढ़ाने में ही मदद करेगा, क्योंकि आज यदि लल्लू जैसे लोगों को योग्य बनाने के लिए ईमानदारी से और ठोस प्रयास प्रारंभ भी किए जाएं, तो जब तक लल्लू मोहन के ‘स्तर’ पर पहुंचेगा, मोहन योग्य से योग्यतर और योग्यतम तक पहुंच चुका होगा। इसलिए फिलहाल आवश्यकता यह है कि इस तथाकथित योग्यता के तर्क को थोड़ी देर के लिए परे रखकर इस समस्या पर नए सिर से विचार किया जाए। मंडल आयोग को लागू करना इस सामाजिक विषमता की खाई को पाटने का एक तरीका हो सकता है, यदि इसकी भावना को समझकर इसे ईमानदारी से लागू होने दिया जाए।
28 अगस्त 1990, नवभारत टाइम्स
मुद्दा नौकरी नहीं, सम्मान है
मंडल आयोग की सिफारिशों को मानकर सरकार ने केंद्रीय सरकार तथा सार्वजनिक उपक्रमों की नौकरियों में पिछड़ी जातियों को जो 27 प्रतिशत का आरक्षण दिया है, इससे उत्तर भारत का जनमानस आज बेहद उद्वेलित है। खासतौर से हिंदी क्षेत्र के उच्चवर्गीय-मध्यवर्गीय शहरी युवा का मन, जो अपने पूर्ववर्तियों की अपेक्षा आज कहीं ज्यादा अनम्य और असहिष्णु लग रहा है। वातावरण इतना विषाक्त गया है कि आरक्षण जैसे हिंदू समाज के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे पर भी बिना घोर विषयपरक कुतर्क के कोई सार्थक वस्तुपरक बहस अब शायद संभव ही नहीं रह गई।
ऐसे अप्रिय माहौल में, आरक्षण के समर्थन में लिखने के लिए मन बना कर बैठना, एक तरह का दुस्साहस ही कहा जाएगा। इसलिए नहीं कि कहने के लिए नया कुछ नहीं है और आरक्षण-विरोधियों के तरकश में अब ऐसे अचूक और अमोघ नए बाण आ गए हैं, जिनका कोई जवाब ही नहीं है। सच तो यह है कि आरक्षण के विरोध में आज भी करीब-करीब वही सारे तर्क दोहराए जा रहे हैं, जिस तर्क के चादर की पिछले 40 सालों में बार-बार इस्तेमाल होने के कारण अब उसकी चिंदियां उड़ती दीख रही है और यही कारण है कि माहौल में हिंसा की बारूदी गंध छाई हुई है। बुद्धि, विवेक और तर्क की सीमा जहां समाप्त होती है वहीं से प्रारंभ होता है हिंसक प्रतिरोध। झिझक इस माहौल के कारण हैं, क्योंकि डर है कि ऐसे माहौल में कोई सार्थक बहस हो भी सकती है या नहीं।
संविधान निर्माताओं के मन में भी यह सवाल उठा था कि क्या यह विरोधाभास नहीं होगा कि एक तरफ संविधान समानता और सभी धर्म, वर्ग, वर्ण की बराबरी की बात करे, दूसरी ओर यह भी कहा जाए कि दलितों-आदिवासियों को आरक्षण तो दिया ही जाए, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ों को भी उसी तरह की सरकारी सहायता मिले। एक तरफ संविधान समानता का मौलिक अधिकार देता है, और दूसरी ओर उन योग्य और प्रतिभाशाली लोगों को अवसर से सिर्फ इसलिए वंचित करता है कि सौभाग्य या दुर्भाग्य से उनका जन्म ऊंची जाति की कोख से हुआ। ऊंची जाति के लोगों की शिक्षा-दीक्षा, प्रतिभा, योग्यता और क्षमता सिर्फ इसलिए नकार दी जाए कि सरकार उन सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ों को आगे लाने का प्रयत्न कर रही है जो ऐतिहासिक कारणों से पिछड़े रह गए और अब भी इसलिए पिछड़े हैं कि यह उनका आनुवांशिक पिछड़ापन है और इस तरह से बैसाखियों के सहारे किसी को खड़ा तो किया जा सकता है लेकिन उसे किसी फर्राटेदार दौड़ की प्रतियोगिता में जबर्दस्ती शामिल नहीं किया जा सकता। तर्क यह था कि वह दौड़ेगा तो नहीं ही, दौड़ की गति भी धीमी करता रहेगा यानि देश पिछड़ेपन के लिए अभिशप्त रहेगा।
जहिर है, यह तर्क तब भी काम नहीं आएगा। आरक्षण की बात संविधान में रखी गई। संविधान का अनुच्छेद 370 और निदेशक सिद्धांत इसके गवाह हैं। और गवाह है काका साहेब कालेलकर की अध्यक्षता में गठित 1953 का पिछड़ा वर्ग आयोग जो तब गठित हुआ था जब देश में तथाकथित लोकदलीय समाजवादी पिछड़ी मानसिकता की सरकार नहीं थी। सरकार समाजवादी स्वप्नदृष्टा जवाहरलाल नेहरू की थी और आयोग के अध्यक्ष थे महान गांधीवादी काका साहेब कालेलकर।
कालेलकर आयोग ने दो साल लगातार मार्च 1955 में अपनी रिपोर्ट तो दे दी पर कहीं न कहीं वे उन सवर्ण पूर्वाग्रहों के तर्कों से उबर नहीं पाए जो संविधान निर्माण के समय ही इस मुद्दे पर अड़ंगा डाल रहे थे। अपनी रिपोर्ट को राष्ट्रपति के सामने पेश करते हुए काका साहेब ने जो तीस पेजी चिट्ठी लिखी उसमें उन्होंने अपनी ही रिपोर्ट को पूरी तरह से धराशायी कर दिया। सर्वोदयी काका साहेब का हृदय पिछड़ों की दुर्वस्था से द्रवित था पर वे यह लिखना नहीं भूले कि हिंदू समाज की ऊंची जातियों ने पिछड़ों की उपेक्षा के पाप का जो अपराध किया है उसका प्रायश्चित उन्हें करना पड़ेगा। इसके लिए मैं इस हद तक अनुशंसा करने को तैयार था कि पिछड़े वर्ग को ऊपर लाने के लिए सरकार हर तरह की विशेष सहायता दे और यह विशेष सहायता ऊंची जातियों के मेधावी और गरीब लोगों के हितों की कीमत पर भी पिछड़े वर्ग को दी जाए लेकिन जब आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि इसका आधार जातीय होगा तो जैसे मेरी आंखें खुल गईं।
यह मेरे लिए एक चैंकाने वाला सदमा था जिसने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए मजबूर किया कि जो उपचार हम सुझा रहे हैं वह तो उस व्याधि से भी ज्यादा भयानक होगा जिसे हम दूर करना चाहते हैं।
यदि इन (पिछड़ी) जातियों ने शिक्षा का तिरस्कार किया है तो इसलिए कि इनके लिए इसकी कोई उपयोगिता नहीं थी। अब जब वे अपनी गलती महसूस कर रहे हैं तो यह उन्हीं की जिम्मेदारी है कि वे इस कमी को दूर करने के खुद प्रयास करें।
मैं निश्चित रूप से सरकारी नौकरियों में जाति के आधार पर आरक्षण के विरुद्ध हूं क्योंकि ये नौकरियां सिर्फ नौकरी के लिए नहीं हैं, ये नौकरियां मूलतः समाज के सेवा के लिए हैं।
मेरा विश्वास है कि पहली और दूसरी श्रेणी की सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लोग नैतिक और भौतिक दोनों रूप से लाभान्वित होंगे। यदि वे इन नौकरियों में आरक्षण के कोटे की मांग छोड़ दें और प्रशासन को अपने विवेक से काम करने का अवसर दें ताकि वे पिछड़े वर्गों की बेहतरी के लिए सही उपाय कर सकें।
1955 में काका साहेब कालेलकर जब प्रशासन और ऊंची जातियों के विवेक पर इस सवाल को छोड़ने की बात कर रहे थे तब इन नौकरियों में पिछड़ों का वास्तविक प्रतिशत क्या था। इसका सही सरकारी आंकड़ा नहीं मिल पाया। लेकिन एक मोटा अंदाजा लगाया गया था कि केंद्रीय सरकार की प्रथम श्रेणी की नौकरियों में पिछड़ों की भागीदारी 4 प्रतिशत से ज्यादा नहीं थी। 1980 आते-आते मंडल आयोग ने इस तरह के हिसाब किताब में कोई कमी नहीं रखी। इस रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार की प्रथम वर्ग की 1 लाख 74 हजार 43 नौकरियों में पिछड़ों का कुल हिस्सा केवल 4.69 प्रतिशत था। आज इसकी क्या स्थिति है? केंद्रीय कल्याण मंत्रालय के एक सूत्र का यदि विश्वास किया जाए तो इस हिस्से में अब .04 प्रतिशत की कमी आ गई है। अब पिछड़ों का हिस्सा 4.65 प्रतिशत है। यह नतीजा है प्रशासन के उस विवेक का जिसकी बात काका साहेब ने 1955 में की थी। पंडित नेहरू की तत्कालीन सरकार ने जाहिर है, कालेलकर आयोग की रिपोर्ट के साथ वैसा ही सुलूक किया जैसा काका साहेब शायद चाहते थे। उस रिपोर्ट को दाखिल दफतर करते हुए केंद्र सरकार ने फरमाया कि राज्य सरकारें यदि चाहंी तो अपने-अपने क्षेत्रों में पिछड़ेपन का आधार ढूंढने तथा उसे दूर करने के लिए जो भी कदम उठाना चाहें उठाएं। लेकिन जहां तक केंद्र सरकार का सवाल है यहां उचित यही होगा कि इस तरह के किसी भी कदम का आधार आर्थिक होगा न कि जाति आधारित।
आरक्षण विरोधी आज भी अपने वही तर्क दोहरा रहे हैं जिनके आधार पर काका सहेब का गांधीवादी मन जाति को आरक्षण का आधार मानने के सवाल पर डोल गया था या पंडित जवाहर लाल नेहरू का समाजवादी मन अपने मुख्यमंत्रियों को इस तरह का पत्र लिखने के लिए उन्हें मजबूर कर रहा था कि जाति आधारित आरक्षण से देश रसातल में चला जाएगा। नेहरू जी को अपने समाजवादी समाज की स्थापना के स्वप्न पर पूरा भरोसा था। उन्हें सचमुच शायद लगा था कि उनकी पंचवर्षीय योजनाएं जिन विराट बांधों, दूर-दूर तक फैली नहरों तथा विशाल कारखानों को जन्म देंगी उनमें जाति-पांति की पिछड़ी अवधारणाएं अपने आप डूब जाएंगी। भारतीय समाज की जटिल कुटिलताओं से दूर पंडित नेहरू का मन शायद सचमुच ऐसी अवधारणाओं को अशलील मानता होगा। उस जमाने के उस भोले गांधीवादी समाजवादियों को शायद ही इसका आभास रहा होगा कि हमारा दृढ़ समाज न केवल जड़ता की निरंतरता को बनाए रखेगा बल्कि इस धारावाहिकता को अक्षुण बनाए रखने के लिए उनके भोले तर्कों का तोड़ मरोड़ कर निरंतर दुरुपयोग भी करता रहेगा।
पिछले 40 वर्षों में हमारे समाज की स्थिति में बदलाव नहीं आया है। इसका अहसास आज 1990 में विश्वनाथ प्रताप को अचानक नहीं हुआ है। बीच के वर्षों में भी कुछ लोगों को यह अहसास कहीं न कहीं निश्चय ही सालता रहा होगा, वरना अलग-अलग 10 राज्य सरकारें अब तक इस तरह के 15 आयोग नहीं बिठाती। मंडल आयोग के बारे में आरक्षण-विरोधियों का यह कहना है कि यदि भारतीय प्रशासन ने 1977-80 का व्यवधान नहीं आता, तो मंडल आयोग जैसी अश्लील अवधारणा के बारे में कोई सोचता भी नहीं। चलिए मान लेते हैं कि यह जातिवादी लोकदली सोच का स्खलन था, पर बाकी के 15 राज्यों में ऐसे आयोग क्यों बने और इन सारे आयोगों ने जाति को ही पिछड़ेपन का आधार क्यों माना?
सिर्फ इसीलिए कि कालेलकर और नेहरू की पवित्र इच्छाओं के बावजूद, आज भी केंद्र सरकार की प्रथम श्रेणी की नौकरियों में पिछड़ों, अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों और अल्पसंख्यकों की कुल संख्या 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। जबकि कुल आबादी की सिर्फ 15 प्रतिशत सवर्ण जातियां और इन जातियों में भूमिहार, त्यागी, मोहियाल सहित ब्राह्मण, राजपूत, जाट, मराठा, कायस्थ और वैश्य सभी शामिल हैं, अब भी सरकार और प्रशासन के 85 प्रतिशत पदों पर काबिज हैं। जब भी आरक्षण की बात चलती है तो इस व्यवस्था को बरकरार रखने वाले ही योग्यता, प्रतिभा और अनुभव की बात करते हैं। तभी इन्हें याद आता है कि जाति व्यवस्था हिंदू समाज का कोढ़ है और कोई भी कल्याणकारी सरकार ऐसी व्यवस्था कैसे बना सकती है, जिससे समाज की यह बुराई न सिर्फ जारी रहे, बल्कि और भी मजबूत हो। पिछड़ा वर्ग जब भी इस विषमता की ओर उंगली उठाता है इन्हें संपूर्ण समाज और उसकी दुर्बलताओं की चिंता सालने लगती है। और यह उन कुछ लोगों की बात है, जिनके मन में कहीं न कहीं अब भी एक समतामूलक समाज के प्रति कुछ सम्मान शेष है। शायद आंख की एक शर्म है, जो उन घोर नात्सीवादी और नस्लवादी जुमलों के प्रयोग से उन्हें रोक रही है जिनका प्रयोग समाज का एक तबका अब खुल कर करने लगा है। आरक्षण के समर्थन में बात करने से झिझक इसीलिए हो रही है। फासिज्म को सबसे ज्यादा चिढ़ तर्क और न्याय से होती है। आरक्षण के विरुद्ध छेड़ा गया हिंसक आंदोलन कहीं हमें उसी ओर तो नहीं ले जा रहा है? आखिर दक्षिण अफ्रीका में भी बेशर्म गोरों का एक बड़ा तबका तो है ही, जो आज भी उस देश में अपनी सड़ी व्यवस्था लागू रखना चाहती है और वह भी तर्कों के सहारे।
उधर, समाज का एक प्रतिशील तबका है, जो खुल कर इस अन्याय का समर्थन भी नहीं कर सकता और न ही आरक्षण को मानने के लिए अपने को तैयार कर पाता है। ऐसे लोग ही आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात करते हैं। ये वे लोग हैं जो हिंदू समाज के हजारों साल के दमन और शोषण के इतिहास से आंखें मूंदे रहना तो चाहते ही हैं, इस तथ्य को भी नजरअंदाज करना चाहते हैं कि सारी धर्मनिरपेक्षता तथा समाजवादी नारों के बावजूद सामाजिक ढांचा ज्यों का त्यों क्यों है। सच तो यह है कि सदियों के व्यवस्थित शोषण से आज समाज का एक वर्ग पिछड़ेपन की जिस अवस्था में पहुंचा है उससे उबरने के लिए शायद कुछेक सौ सालों का आरक्षण भी कम पड़ेगा। इस बात को समझने के लिए थोड़े खुले मन की जरूरत पड़ेगी कि जब पिछड़े, दलित या समाज के शोषित वर्ग के लोग जोर देकर यह कहते हैं कि आरक्षण उनकी समस्याओं का एकमात्र समाधान है, तो निश्चय ही वे सिर्फ अपने या अपने समाज की आर्थिक उन्नति की बात नहीं कर रहे होते हैं। पिछड़े समाज की कुछ जातियां अपने बाहुबल से इतना कुछ तो अर्जित कर चुकी हैं कि आर्थिक समस्या अब उनके लिए बहुत बड़ी समस्या नहीं है। सरकारी पद उन्हें सामाजिक सम्मान के लिए चाहिए। यह समाज में बराबरी का अधिकार पाने की ललक है सिर्फ आर्थिक उन्नति की बात नहीं। हिंदू समाज में शोषण और दमन का यह चक्र जाति व्यवस्था को आधार बना कर ही चलाया गया था। जब तक यह चक्र एक बार उल्टा नहीं चल पड़ता, तब तक इस समाज में जाति व्यवस्था को समाप्त करने की बात करना एक छलावा ही होगा। या यों कहें कि शोषित पिछड़े वर्ग के लोगों के जायज अधिकारी को हड़पने की एक सवर्ण साजिश।
आरक्षण के मुद्दे पर सवर्ण जातियां, जो कुल जनसंख्या की सिर्फ 15 प्रतिशत हैं, यदि इस तरह सोचने लगें कि अब तक जिन 15 प्रतिशत लोगों के लिए नौकरियों में 100 प्रतिशत स्थान आरक्षित थे, उन्हें अब 50.5 प्रतिशत नौकरियों पर संतोष करना पड़ेगा, तो शायद यह उनके सोचने का स्वस्थ तरीका साबित हो, क्योंकि अब भी आबादी के 85 प्रतिशत लोगों के लिए सिर्फ 49.5 प्रतिशत स्थान ही तो आरक्षित हैं।
26 अगस्त 1990, रविवार्ता, नवभारत टाइम्स
ऐसे अप्रिय माहौल में, आरक्षण के समर्थन में लिखने के लिए मन बना कर बैठना, एक तरह का दुस्साहस ही कहा जाएगा। इसलिए नहीं कि कहने के लिए नया कुछ नहीं है और आरक्षण-विरोधियों के तरकश में अब ऐसे अचूक और अमोघ नए बाण आ गए हैं, जिनका कोई जवाब ही नहीं है। सच तो यह है कि आरक्षण के विरोध में आज भी करीब-करीब वही सारे तर्क दोहराए जा रहे हैं, जिस तर्क के चादर की पिछले 40 सालों में बार-बार इस्तेमाल होने के कारण अब उसकी चिंदियां उड़ती दीख रही है और यही कारण है कि माहौल में हिंसा की बारूदी गंध छाई हुई है। बुद्धि, विवेक और तर्क की सीमा जहां समाप्त होती है वहीं से प्रारंभ होता है हिंसक प्रतिरोध। झिझक इस माहौल के कारण हैं, क्योंकि डर है कि ऐसे माहौल में कोई सार्थक बहस हो भी सकती है या नहीं।
संविधान निर्माताओं के मन में भी यह सवाल उठा था कि क्या यह विरोधाभास नहीं होगा कि एक तरफ संविधान समानता और सभी धर्म, वर्ग, वर्ण की बराबरी की बात करे, दूसरी ओर यह भी कहा जाए कि दलितों-आदिवासियों को आरक्षण तो दिया ही जाए, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ों को भी उसी तरह की सरकारी सहायता मिले। एक तरफ संविधान समानता का मौलिक अधिकार देता है, और दूसरी ओर उन योग्य और प्रतिभाशाली लोगों को अवसर से सिर्फ इसलिए वंचित करता है कि सौभाग्य या दुर्भाग्य से उनका जन्म ऊंची जाति की कोख से हुआ। ऊंची जाति के लोगों की शिक्षा-दीक्षा, प्रतिभा, योग्यता और क्षमता सिर्फ इसलिए नकार दी जाए कि सरकार उन सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ों को आगे लाने का प्रयत्न कर रही है जो ऐतिहासिक कारणों से पिछड़े रह गए और अब भी इसलिए पिछड़े हैं कि यह उनका आनुवांशिक पिछड़ापन है और इस तरह से बैसाखियों के सहारे किसी को खड़ा तो किया जा सकता है लेकिन उसे किसी फर्राटेदार दौड़ की प्रतियोगिता में जबर्दस्ती शामिल नहीं किया जा सकता। तर्क यह था कि वह दौड़ेगा तो नहीं ही, दौड़ की गति भी धीमी करता रहेगा यानि देश पिछड़ेपन के लिए अभिशप्त रहेगा।
जहिर है, यह तर्क तब भी काम नहीं आएगा। आरक्षण की बात संविधान में रखी गई। संविधान का अनुच्छेद 370 और निदेशक सिद्धांत इसके गवाह हैं। और गवाह है काका साहेब कालेलकर की अध्यक्षता में गठित 1953 का पिछड़ा वर्ग आयोग जो तब गठित हुआ था जब देश में तथाकथित लोकदलीय समाजवादी पिछड़ी मानसिकता की सरकार नहीं थी। सरकार समाजवादी स्वप्नदृष्टा जवाहरलाल नेहरू की थी और आयोग के अध्यक्ष थे महान गांधीवादी काका साहेब कालेलकर।
कालेलकर आयोग ने दो साल लगातार मार्च 1955 में अपनी रिपोर्ट तो दे दी पर कहीं न कहीं वे उन सवर्ण पूर्वाग्रहों के तर्कों से उबर नहीं पाए जो संविधान निर्माण के समय ही इस मुद्दे पर अड़ंगा डाल रहे थे। अपनी रिपोर्ट को राष्ट्रपति के सामने पेश करते हुए काका साहेब ने जो तीस पेजी चिट्ठी लिखी उसमें उन्होंने अपनी ही रिपोर्ट को पूरी तरह से धराशायी कर दिया। सर्वोदयी काका साहेब का हृदय पिछड़ों की दुर्वस्था से द्रवित था पर वे यह लिखना नहीं भूले कि हिंदू समाज की ऊंची जातियों ने पिछड़ों की उपेक्षा के पाप का जो अपराध किया है उसका प्रायश्चित उन्हें करना पड़ेगा। इसके लिए मैं इस हद तक अनुशंसा करने को तैयार था कि पिछड़े वर्ग को ऊपर लाने के लिए सरकार हर तरह की विशेष सहायता दे और यह विशेष सहायता ऊंची जातियों के मेधावी और गरीब लोगों के हितों की कीमत पर भी पिछड़े वर्ग को दी जाए लेकिन जब आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि इसका आधार जातीय होगा तो जैसे मेरी आंखें खुल गईं।
यह मेरे लिए एक चैंकाने वाला सदमा था जिसने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए मजबूर किया कि जो उपचार हम सुझा रहे हैं वह तो उस व्याधि से भी ज्यादा भयानक होगा जिसे हम दूर करना चाहते हैं।
यदि इन (पिछड़ी) जातियों ने शिक्षा का तिरस्कार किया है तो इसलिए कि इनके लिए इसकी कोई उपयोगिता नहीं थी। अब जब वे अपनी गलती महसूस कर रहे हैं तो यह उन्हीं की जिम्मेदारी है कि वे इस कमी को दूर करने के खुद प्रयास करें।
मैं निश्चित रूप से सरकारी नौकरियों में जाति के आधार पर आरक्षण के विरुद्ध हूं क्योंकि ये नौकरियां सिर्फ नौकरी के लिए नहीं हैं, ये नौकरियां मूलतः समाज के सेवा के लिए हैं।
मेरा विश्वास है कि पहली और दूसरी श्रेणी की सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लोग नैतिक और भौतिक दोनों रूप से लाभान्वित होंगे। यदि वे इन नौकरियों में आरक्षण के कोटे की मांग छोड़ दें और प्रशासन को अपने विवेक से काम करने का अवसर दें ताकि वे पिछड़े वर्गों की बेहतरी के लिए सही उपाय कर सकें।
1955 में काका साहेब कालेलकर जब प्रशासन और ऊंची जातियों के विवेक पर इस सवाल को छोड़ने की बात कर रहे थे तब इन नौकरियों में पिछड़ों का वास्तविक प्रतिशत क्या था। इसका सही सरकारी आंकड़ा नहीं मिल पाया। लेकिन एक मोटा अंदाजा लगाया गया था कि केंद्रीय सरकार की प्रथम श्रेणी की नौकरियों में पिछड़ों की भागीदारी 4 प्रतिशत से ज्यादा नहीं थी। 1980 आते-आते मंडल आयोग ने इस तरह के हिसाब किताब में कोई कमी नहीं रखी। इस रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार की प्रथम वर्ग की 1 लाख 74 हजार 43 नौकरियों में पिछड़ों का कुल हिस्सा केवल 4.69 प्रतिशत था। आज इसकी क्या स्थिति है? केंद्रीय कल्याण मंत्रालय के एक सूत्र का यदि विश्वास किया जाए तो इस हिस्से में अब .04 प्रतिशत की कमी आ गई है। अब पिछड़ों का हिस्सा 4.65 प्रतिशत है। यह नतीजा है प्रशासन के उस विवेक का जिसकी बात काका साहेब ने 1955 में की थी। पंडित नेहरू की तत्कालीन सरकार ने जाहिर है, कालेलकर आयोग की रिपोर्ट के साथ वैसा ही सुलूक किया जैसा काका साहेब शायद चाहते थे। उस रिपोर्ट को दाखिल दफतर करते हुए केंद्र सरकार ने फरमाया कि राज्य सरकारें यदि चाहंी तो अपने-अपने क्षेत्रों में पिछड़ेपन का आधार ढूंढने तथा उसे दूर करने के लिए जो भी कदम उठाना चाहें उठाएं। लेकिन जहां तक केंद्र सरकार का सवाल है यहां उचित यही होगा कि इस तरह के किसी भी कदम का आधार आर्थिक होगा न कि जाति आधारित।
आरक्षण विरोधी आज भी अपने वही तर्क दोहरा रहे हैं जिनके आधार पर काका सहेब का गांधीवादी मन जाति को आरक्षण का आधार मानने के सवाल पर डोल गया था या पंडित जवाहर लाल नेहरू का समाजवादी मन अपने मुख्यमंत्रियों को इस तरह का पत्र लिखने के लिए उन्हें मजबूर कर रहा था कि जाति आधारित आरक्षण से देश रसातल में चला जाएगा। नेहरू जी को अपने समाजवादी समाज की स्थापना के स्वप्न पर पूरा भरोसा था। उन्हें सचमुच शायद लगा था कि उनकी पंचवर्षीय योजनाएं जिन विराट बांधों, दूर-दूर तक फैली नहरों तथा विशाल कारखानों को जन्म देंगी उनमें जाति-पांति की पिछड़ी अवधारणाएं अपने आप डूब जाएंगी। भारतीय समाज की जटिल कुटिलताओं से दूर पंडित नेहरू का मन शायद सचमुच ऐसी अवधारणाओं को अशलील मानता होगा। उस जमाने के उस भोले गांधीवादी समाजवादियों को शायद ही इसका आभास रहा होगा कि हमारा दृढ़ समाज न केवल जड़ता की निरंतरता को बनाए रखेगा बल्कि इस धारावाहिकता को अक्षुण बनाए रखने के लिए उनके भोले तर्कों का तोड़ मरोड़ कर निरंतर दुरुपयोग भी करता रहेगा।
पिछले 40 वर्षों में हमारे समाज की स्थिति में बदलाव नहीं आया है। इसका अहसास आज 1990 में विश्वनाथ प्रताप को अचानक नहीं हुआ है। बीच के वर्षों में भी कुछ लोगों को यह अहसास कहीं न कहीं निश्चय ही सालता रहा होगा, वरना अलग-अलग 10 राज्य सरकारें अब तक इस तरह के 15 आयोग नहीं बिठाती। मंडल आयोग के बारे में आरक्षण-विरोधियों का यह कहना है कि यदि भारतीय प्रशासन ने 1977-80 का व्यवधान नहीं आता, तो मंडल आयोग जैसी अश्लील अवधारणा के बारे में कोई सोचता भी नहीं। चलिए मान लेते हैं कि यह जातिवादी लोकदली सोच का स्खलन था, पर बाकी के 15 राज्यों में ऐसे आयोग क्यों बने और इन सारे आयोगों ने जाति को ही पिछड़ेपन का आधार क्यों माना?
सिर्फ इसीलिए कि कालेलकर और नेहरू की पवित्र इच्छाओं के बावजूद, आज भी केंद्र सरकार की प्रथम श्रेणी की नौकरियों में पिछड़ों, अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों और अल्पसंख्यकों की कुल संख्या 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। जबकि कुल आबादी की सिर्फ 15 प्रतिशत सवर्ण जातियां और इन जातियों में भूमिहार, त्यागी, मोहियाल सहित ब्राह्मण, राजपूत, जाट, मराठा, कायस्थ और वैश्य सभी शामिल हैं, अब भी सरकार और प्रशासन के 85 प्रतिशत पदों पर काबिज हैं। जब भी आरक्षण की बात चलती है तो इस व्यवस्था को बरकरार रखने वाले ही योग्यता, प्रतिभा और अनुभव की बात करते हैं। तभी इन्हें याद आता है कि जाति व्यवस्था हिंदू समाज का कोढ़ है और कोई भी कल्याणकारी सरकार ऐसी व्यवस्था कैसे बना सकती है, जिससे समाज की यह बुराई न सिर्फ जारी रहे, बल्कि और भी मजबूत हो। पिछड़ा वर्ग जब भी इस विषमता की ओर उंगली उठाता है इन्हें संपूर्ण समाज और उसकी दुर्बलताओं की चिंता सालने लगती है। और यह उन कुछ लोगों की बात है, जिनके मन में कहीं न कहीं अब भी एक समतामूलक समाज के प्रति कुछ सम्मान शेष है। शायद आंख की एक शर्म है, जो उन घोर नात्सीवादी और नस्लवादी जुमलों के प्रयोग से उन्हें रोक रही है जिनका प्रयोग समाज का एक तबका अब खुल कर करने लगा है। आरक्षण के समर्थन में बात करने से झिझक इसीलिए हो रही है। फासिज्म को सबसे ज्यादा चिढ़ तर्क और न्याय से होती है। आरक्षण के विरुद्ध छेड़ा गया हिंसक आंदोलन कहीं हमें उसी ओर तो नहीं ले जा रहा है? आखिर दक्षिण अफ्रीका में भी बेशर्म गोरों का एक बड़ा तबका तो है ही, जो आज भी उस देश में अपनी सड़ी व्यवस्था लागू रखना चाहती है और वह भी तर्कों के सहारे।
उधर, समाज का एक प्रतिशील तबका है, जो खुल कर इस अन्याय का समर्थन भी नहीं कर सकता और न ही आरक्षण को मानने के लिए अपने को तैयार कर पाता है। ऐसे लोग ही आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात करते हैं। ये वे लोग हैं जो हिंदू समाज के हजारों साल के दमन और शोषण के इतिहास से आंखें मूंदे रहना तो चाहते ही हैं, इस तथ्य को भी नजरअंदाज करना चाहते हैं कि सारी धर्मनिरपेक्षता तथा समाजवादी नारों के बावजूद सामाजिक ढांचा ज्यों का त्यों क्यों है। सच तो यह है कि सदियों के व्यवस्थित शोषण से आज समाज का एक वर्ग पिछड़ेपन की जिस अवस्था में पहुंचा है उससे उबरने के लिए शायद कुछेक सौ सालों का आरक्षण भी कम पड़ेगा। इस बात को समझने के लिए थोड़े खुले मन की जरूरत पड़ेगी कि जब पिछड़े, दलित या समाज के शोषित वर्ग के लोग जोर देकर यह कहते हैं कि आरक्षण उनकी समस्याओं का एकमात्र समाधान है, तो निश्चय ही वे सिर्फ अपने या अपने समाज की आर्थिक उन्नति की बात नहीं कर रहे होते हैं। पिछड़े समाज की कुछ जातियां अपने बाहुबल से इतना कुछ तो अर्जित कर चुकी हैं कि आर्थिक समस्या अब उनके लिए बहुत बड़ी समस्या नहीं है। सरकारी पद उन्हें सामाजिक सम्मान के लिए चाहिए। यह समाज में बराबरी का अधिकार पाने की ललक है सिर्फ आर्थिक उन्नति की बात नहीं। हिंदू समाज में शोषण और दमन का यह चक्र जाति व्यवस्था को आधार बना कर ही चलाया गया था। जब तक यह चक्र एक बार उल्टा नहीं चल पड़ता, तब तक इस समाज में जाति व्यवस्था को समाप्त करने की बात करना एक छलावा ही होगा। या यों कहें कि शोषित पिछड़े वर्ग के लोगों के जायज अधिकारी को हड़पने की एक सवर्ण साजिश।
आरक्षण के मुद्दे पर सवर्ण जातियां, जो कुल जनसंख्या की सिर्फ 15 प्रतिशत हैं, यदि इस तरह सोचने लगें कि अब तक जिन 15 प्रतिशत लोगों के लिए नौकरियों में 100 प्रतिशत स्थान आरक्षित थे, उन्हें अब 50.5 प्रतिशत नौकरियों पर संतोष करना पड़ेगा, तो शायद यह उनके सोचने का स्वस्थ तरीका साबित हो, क्योंकि अब भी आबादी के 85 प्रतिशत लोगों के लिए सिर्फ 49.5 प्रतिशत स्थान ही तो आरक्षित हैं।
26 अगस्त 1990, रविवार्ता, नवभारत टाइम्स
सदस्यता लें
संदेश (Atom)