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बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

उत्तराखंड अपवाद है

उत्तर प्रदेश के पर्वतीय जिलों में आरक्षण के विरोध में एक व्यापक जनांदोलन छिड़ गया है। आंदोलन इतना व्यापक और सर्वग्राह्य है कि करीब-करीब सभी दल, जो राष्ट्रीय स्तर पर आरक्षण का समर्थन करते हैं, इस क्षेत्रा में मजबूरन इसका विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा मूलतः सवर्ण मानसिकता की पार्टियां हैं। मंडल आयोग के विरुद्ध जो हिंसक आंदोलन हुआ था उसमें निजी तौर पर इन्हीं दलों के नेताओं की सक्रिय भागीदारी थी। पर बाद में, जब मंडल आयोग लागू करने के अलावा कोई चारा नहीं था, तब सार्वजनिक और सैद्धांतिक रूप से आरक्षण के समर्थन में भी आगे आ गईं।

उत्तराखंड में जो पिछड़ों को आरक्षण दिए जाने के विरुद्ध आंदोलन छिड़ा हुआ है, उसमें इस तरह की भी कोई मजबूरी नहीं है। सभी राष्ट्रीय दल, क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां तथा छात्र-अध्यापक-बुद्धिजीवी इस आंदोलन में सक्रिय हैं। वे भी जो हर क्षेत्रा में आरक्षण का बढ़-चढ़कर समर्थन करते हैं, इस बार यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार के इस निर्णय का समर्थन आखिर कैसे करें। उत्तराखंड की सामाजिक संरचना मैदानी क्षेत्रों से बिल्कुल अलग है। यह बात सिर्फ उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों पर ही लागू नहीं होती, सारे पर्वतीय क्षेत्रों की सामाजिक संरचना मैदानों से भिन्न है। चाहे वह हिमाचल प्रदेश हो या पश्चिम बंगाल का पर्वतीय क्षेत्रा। इन क्षेत्रों में पिछड़ी जातियों के लोगों की संख्या नगण्य है। या तो ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य के रूप में सवर्ण हैं या दलित, अनुसूचित जातियों के लोग। बीच की जातियां यहां सिरे से नदारद हैं।

इसलिए यदि इन क्षेत्रों में भी मैदानी क्षेत्रों की तरह ही आरक्षण का प्रावधान किया गया तो इससे अनेक परेशानियां पैदा होंगी। एक अंदाज के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के कुमाऊं तथा गढ़वाल क्षेत्रा में अन्य पिछड़ी जाति के लोगों का प्रतिशत डेढ़ से दो के करीब है और ये लोग भी हाल के दिनों में ही मैदानों से चलकर पहाड़ों पर पहुंचे हैं। अब यदि उतर प्रदेश में पिछड़ों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा जाता है और उसे पहाड़ी जिलों पर भी लागू कर दिया जाता है तो इसका अर्थ यह होगा कि मैदानी क्षेत्रा के लोग आरक्षण का लाभ लेकर पहाड़ी क्षेत्रा की नौकरियों पर कब्जा कर लेंगे।

इसमें कई मसले हैं। एक, एक ही राज्य में दो तरह के विधान कैसे चल सकते हैं कि जो नियम पूरे राज्य पर लागू होगा वह कुछ जिलों में नहीं लागू किया जाएगा। इस तर्क में दम है लेकिन इसकी अपनी सीमाएं भी हैं। यह तर्क तब दमदार होता, जब पूरे राज्य को एक इकाई के रूप में माना जाता। यहां तो यह स्थिति है कि इन जिलों के लोग अरसे से अलग राज्य की मांग कर रहे हैं। आप उत्तराखंड कह लें या उत्तरांचल, इसकी मांग लंबे समय से चल रही है और इसे इस क्षेत्रा की आम जनता का व्यापक समर्थन भी मिल रहा है। अलग राज्य बनाने के लिए सक्रिय उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) को व्यापक समर्थन इसलिए नहीं मिलता कि उस क्षेत्र के राष्ट्रीय दल भी अलग राज्य का ही समर्थन करते हैं। पिछली सरकार ने विधासनसभा में प्रस्ताव पास करके केंद्र सरकार के पास भेज दिया था कि उत्तरांचल राज्य शीघ्र गठित कर दिया जाए।

पिछले चुनाव में भले ही मुलायम सिंह के गठबंधन को इस क्षेत्रा से सिर्फ एक सीट मिली हो पर वे भी सार्वजनिक रूप में उत्तराखंड निर्माण के पक्ष में रहे हैं और प्रशासनिक कार्यवाही का भी आश्वासन देते रहे हैं। यानी कुल मिलाकर राज्य में एक तरह की सर्वानुमति रही है कि पहाड़ी जिलों की आवश्यकताएं अलग हैं इसलिए इनकी व्यवस्था भी अलग होनी चाहिए। अलग उत्तराखंड राज्य भले ही अब तक न बना हो पर राज्य इस तथ्य को स्वीकार कर चुका है कि वह एक न एक दिन अवश्य बनेगा तथा उसकी आवश्यकता भी है। ऐसी स्थिति में आरक्षण के प्रावधान को उसी तरह उस क्षेत्रा में भी लागू करने का क्या तुक है जहां अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों की संख्या दो प्रतिशत भी नहीं है। यदि ऐसा होता कि मुलायम सिंह यादव उत्तराखंड को अलग करने के विरोध में होते तो उनका यह तर्क समझ में आता कि एक राज्य में वे अनेक तरह के कानून नहीं लागू कर सकते, पर ऐसा भी नहीं है।

इसका मसला और भी गंभीर है। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रा की अर्थनीति भी बिल्कुल भिन्न है। वहां न तो ढंग के उद्योग धंधे हैं और न ही खेती। कोई भी व्यक्ति किसानी के सहारे अपनी जिंदगी नहीं चला सकता। हिमाचल प्रदेश में भी अलग राज्य बनने से पहले यही स्थिति थी, लेकिन अब बागवानी और उससे सम्बद्ध उद्योगों के कारण परिस्थितियां भिन्न हैं। चूंकि उत्तर प्रदेश की सारी राजनीति का केंद्र मैदानी क्षेत्रा रहे हैं इसलिए पहाड़ी क्षेत्रों पर कभी कोई ध्यान ही नहीं दिया गया। इसलिए उस क्षेत्रा में आमदनी का साधन सिर्फ सरकारी नौकरियां हैं। काफी लोग सेना या पुलिस में हैं। बड़ी संख्या में लोग क्षेत्रा के बाहर नौकरियां करते हैं। इसलिए कभी-कभी मजाक में इस क्षेत्रा की अर्थनीति को मनीऑर्डर अर्थनीति भी कहते हैं। इस स्थिति में यदि यहां की नौकरियों में आरक्षण के कारण बाहर के लोग भरे गए तो निश्चय ही सामाजिक संतुलन बिगड़ जाएगा और यदि यह आरक्षण शिक्षा संस्थानों में भी लागू होता है तो पहाड़ी युवाओं का भविष्य और अंधकारमय हो जाएगा।

मुलायम सिंह को इस विशेष परिस्थिति को समझना चाहिए और धमकी तथा चेतावनी की भाषा से बचना चाहिए। यह सामाजिक न्याय का रास्ता नहीं है। यह सच है कि हमारे देश में आरक्षण की अत्यंत आवश्यकता है। इसमें भी कोई बुराई नहीं कि आरक्षण को आबादी के औसत तक भी पहुंचा दिया जाए, पर यह करते हुए यह ध्यान भी रखना पड़ेगा कि इसे लागू करने की मूल इकाई क्या हो, राज्य या जिला? स्वाभाविक है कि यह इकाई राज्य ही हो सकती है, पर कुछ क्षेत्रों में अपवाद बनाने होंगे। पश्चिम बंगाल के पहाड़ी क्षेत्रा या बिहार, मध्य प्रदेश तथा उड़ीसा के आदिवासी क्षेत्रों के लिए इस विधान में संशोधन करना ही पड़ेगा, वरना अनेक सामाजिक तनाव होंगे।

तमिलनाडु यदि आरक्षण बढ़ाकर 69 प्रतिशत करना चाहता है तो उसमें दम है। उस राज्य में सिर्फ ब्राह्मण ही ऊंची जाति है बाकी सारी आबादी या तो पिछड़ी है या अनुसूचित। इसी तरह बिहार में यदि लालू प्रसाद यादव आरक्षण को 80 प्रतिशत तक ले जाने की धमकी दे रहे हैं तो उसके पीछे भी एक तर्क है। कर्नाटक में भी कमोबेश यही स्थिति है। यदि संविधान में संशोधन करके इसे लागू किया जाता है तो कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। पर लालू प्रसाद को यह ध्यान तो रखना ही पड़ेगा कि इस आरक्षण नीति के कारण कहीं छोटा नागपुर के आदिवासी बहुल इलाकों में उनके भाईबंद तो थोक में नहीं पहुंच रहे हैं। सामाजिक न्याय की तार्किक परिणति यही है कि हर व्यक्ति को उसके समाज में उसका उचित और तर्कसंगत स्थान मिले। इसलिए यह देखना पड़ेगा कि यदि पूरे राज्य में 80 प्रतिशत आरक्षण लागू होता है तो उन क्षेत्रों में जहां आदिवासी ज्यादा हैं, वहां कम-से-कम उनकी आबादी के अनुपात में तो स्थान मिले।

जब तक उत्तराखंड अलग राज्य नहीं बन जाता तब तक उत्तर प्रदेश में रहते हुए भी इसका समाधान हो सकता है। उत्तर पूर्व के कई राज्यों की तरह पहाड़ के मूल लोगों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जा सकता है। फिर उनका आरक्षण का प्रतिशत उनकी आबादी के अनुपात तक बढ़ाकर इस समस्या का समाधान हो सकता है। इसके लिए थोड़ी-सी समझदारी और दूर-दृष्टि से काम लेना होगा, न कि धमकी की भाषा से। इस तरह की भाषा बोलकर मुलायम सिंह न सिर्फ अपनी राजनीति का कबाड़ा कर रहे हैं बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर भी प्रहार कर रहे हैं। वैसे ही कोई कम विरोध नहीं है।

24 अगस्त 1994, अमर उजाला

गोया सवर्ण जातिवादी नहीं होते

जाति फिर चर्चा में है। यह बात आजकल कहीं भी सुनने को मिल जाएगी कि कैसे जाति-पांति की बुराई फिर से सिर उठाने लगी है। ईमानदारी की बात तो यह है कि जाति-पांति का जोर सचमुच कोई खास नहीं बढ़ा है। फर्क सिर्फ यह आया है कि जिन्हें हम सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा, दलित या अल्पसंख्यक कहते हैं, उनमें से कुछ लोग थोड़ी ज्यादा प्रमुखता पाने लगे हैं। कुछ पिछड़ी जातियों के लोग चुनकर आए हैं। उनमें से कुछ मंत्री और मुख्यमंत्री बन गए हैं।

ऐसे नौकरशाह जो हर बाधा-विपत्ति से टकराते हुए अब भी किसी तरह बचे रह गए, उनमें से कुछ की अच्छे पदों पर नियुक्तियां होने लगी हैं। ये थोड़े-बहुत परिवर्तन हो रहे हैं पर इनका असर न के बराबर है। हलचल सिर्फ सतह पर है। मूलभूत परिवर्तन की दूर-दूर तक संभावना नहीं दिखाई देती। जिन्हें जाति-पांति फैलाने का अपराधी माना जा रहा है वे चाहकर भी हर पद पर अपने लोगों को नहीं रख सकते। लोग वहां हैं ही नहीं। हां, आरोप खूब लग रहे हैं।

वंचित तबके के लोग उस ऐतिहासिक गलती को सुधारने का प्रयत्न भी प्रारंभ करें तो उन पर जातिवाद फैलाने का आरोप लग जाता है। अभी राज्यसभा के टिकट बंट रहे थे। आप कोई भी अखबार उठा लीजिए अगर चर्चा उत्तर प्रदेश और बिहार की हो रही है तो अक्सर टिप्पणीकार यह अवश्य लिखते थे कि लालू यादव और मुलायम सिंह यादव अपनी जाति के लोगों को तो अवश्य टिकट देंगे ही। कहीं किसी ने यह पढ़ा कि राव अपनी जाति के लोगों को अवश्य टिकट देंगे।

कांग्रेस ने राज्यसभा के अपने उम्मीदवारों की जो सूची जारी की है उसमें 50 प्रतिशत स्थान ऊंची जातियों को दिया गया जिसमें 26 प्रतिशत ब्राह्मण हैं। कल्पना कीजिए कि ऐसा ही कोई काम लालू या मुलायम कर दें तो अखबारों में आज कुहराम मचा होता, पर सवर्णों द्वारा फैलाई गई जाति-पांति को हमारे समाचार माध्यम जाति-पांति की बुराई नहीं मानते। अभी दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में एक क्रंतिकारी काम हो गया।

अनुसूचित जाति-जनजाति के कोटा से आए छात्रों ने मांग की कि पोस्ट ग्रेजुएट कक्षाओं में दाखिले के लिए आरक्षण समाप्त कर दिया जाए। मेरिट के आधार पर दाखिला हो। सवर्ण छात्रों का कहना था कि उनका अपना अलग से आरक्षण बना रहना चाहिए। कल्पना कीजिए, दलित मेरिट की बात कर रहे हैं। सवर्ण आरक्षण मांग रहे हैं। वे समाचारपत्रा जो मंडल आयोग आंदोलन के समय आरक्षण का विरोध करते हुए मेरिट और योग्यता की बात कर रहे थे क्या उनमें से किसी भी अखबार में इसके बारे में कुछ भी पढ़ने को मिला?

आज अचानक बड़े-बड़े लेख, विश्लेषण और संपादकीय इसीलिए लिखे जा रहे हैं क्योंकि दलितों, वंचितों और पिछड़ों के अदंर एक नई चेतना आ रही है। भद्र समाज में लोग कहते मिल जाएंगे कि देखिए, अपराध बढ़ते जा रहे हैं आदि। फिर अचानक बड़ी-बड़ी खबरें छपने लगती हैं कि पश्चिम उत्तर प्रदेश अपराधियों का स्वर्ग बनता जा रहा है। कोई कैमरा टीम बिहार पहुंचकर किसी नरसंहार का चित्र ले आएगी। हमेशा इसी तरह माहौल बनाया जाता है। यह अक्सर सफल भी होता है। इस बार भी यही कोशिश हो रही है। जाति-पांति की बुराई बढ़ने की खबरें आजकल इसलिए आम हैं।

15 फरवरी 1994, मतांतर, इंडिया टुडे

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

राजनीति का मुहावरा बदल रहा है

विश्वनाथ प्रताप सिंह की राजनीति जहां समाप्त होती है, मुलायम सिंह यादव की राजनीति का वह प्रारंभिक बिंदु है। इस दृष्टि से मुलायम सिंह, वीपी सिंह से एक कदम आगे हैं। वीपी सिंह ने मंडल आयोग यानी सामाजिक न्याय का नारा सिर्फ देवीलाल को पीछे छोड़ने के लिए दिया था, मैं इस बात से कभी सहमत नहीं रहा, लेकिन था वह कुल मिलाकर चुनावी नारा ही, इससे ज्यादा कुछ नहीं। मुलायम सिंह के लिए यह उससे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, वे उसी राजनीति की पैदावार हैं, लोहिया की ट्रेनिंग, अपनी निजी जातिगत पृष्ठभूमि और उसकी राजनीति करने के कारण मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव की प्रतिबद्धता जनता दल के अन्य नेताओं से थोड़ी ज्यादा रही।

पांच राज्यों से इस बार जिस तरह के चुनाव परिणाम आए हैं, उससे यह साफ हो गया है कि सिर्फ तदर्थवाद की राजनीति नहीं चलेगी, जो जिस मुद्दे पर पूरी तरह खड़ा है और लोगों को लगा कि यह ज्यादा ईमानदारी से खड़ा है, उसके साथ लोग जाने वाले थे। जनता दल का सारा का सारा समर्थन-आधार मुलायम सिंह की तरफ जाने का सबसे बड़ा कारण यही था। मुस्लिम और कांशीराम फैक्टर उसी का विस्तार है।

उग्र पिछड़ापन या कि दलित उभार बहुत दिनों से रुका हुआ था। कुछ कांग्रेस ने रोक रखा और और कुछ प्रमुख वामपंथी दलों ने। ये मुद्दों को भटकाते रहे। जो नीचे का आदमी था उसे लग रहा था कि ये हमारे लिए काम कर रहे हैं। कांशीराम से मैं पूरी तरह सहमत नहीं हूं पर जब वे कहते हैं कि कांग्रेस, भाजपा, जनता दल, सीपीआई और सीपीएम, ब्राह्मणवाद की ए, बी, सी, डी, ई, पांच टीमें हैं तो बहुत गलत नहीं कहते। ए टीम ने 40 साल बरबाद किए, बी टीम पांच साल और बरबाद करेगी। इतना समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। सीधी लड़ाई लड़ के एक साथ परास्त कर दो सभी टीमों को। तो यह बात उनके सामाजिक आधार को प्रभावित करती है। मुलायम को मैं कैंडे का (इंटिग्रेटेड) राजनीतिक नहीं मानता। तरह-तरह के समझौते करते हैं फिर भी औरों से थोड़ा ठीक हैं। ये भले ही ज्यादा दिन न चलें, लेकिन यह राजनीति चलेगी।

देश की राजनीति में अब गुणात्मक परिवर्तन हो रहा है। यह दो तरफ से हो रहा है। एक, भारतीय जनता पार्टी के आने के कारण भाजपा उस काम को खुलेआम कर रही है जिसे कांग्रेस थोड़ा दबा-छिपा के, ढक-तोप के कर रही थी। ये दोनों उनकी पार्टियां हैं जिन्हें इस व्यवस्था से सबसे ज्यादा मिलने वाला है। ऐसे लोगों का ध्रुवीकरण एक तरफ हो रहा है। इसलिए जो चुनाव नतीजे आए हैं उसे इस बात का कोई बड़ा संकेतक नहीं माना जा सकता कि कांग्रेस वापस आ रही है या भाजपा हार रही है। ऐसा नहीं होगा, होगा तो यही कि या तो कांग्रेस रहेगी या भारतीय जनता पार्टी, और इसके बाद जिस तरफ राजनीति बढ़ रही है उससे आश्चर्य नहीं कि अब कांग्रेस नहीं रहेगी, रहेगी तो भाजपा।

कांग्रेस कभी भी सिर्फ एक राजनीतिक संगठन नहीं थी। इसके साथ-साथ कांग्रेस एक सामाजिक संगठन भी थी। इस देश में समाज को अलग करके कोई राजनीति नहीं हो सकती। वे समाज की सचाई को समझकर भी समझना नहीं चाहते। सिर्फ राजनीति और अर्थनीति को मुख्य मुद्दा बनाकर वे राजनीति करना चाहते हैं।

कांग्रेस ने इस सचाई को आजादी की लड़ाई के दौरान मजबूरी में ही सही, लेकिन समझ लिया था। वह इस यथास्थितिवाद को बनाए रखकर चल रही थी। उसमें ब्राह्मण भी था, दलित भी था, मुसलमान भी, पिछड़े भी लेकिन चातुर्वर्ण वाला जो हिंदू ढांचा था उसको बनाए हुए एक पार्टी चल रही थी, उसमें अब गड़बड़ी आ गई है। कांग्रेस अपने दलित आधार को पूरी तरह त्याग चुकी है। दलितों ने उसे नहीं छोड़ा है पूरी तरह, लेकिन कांग्रेस ने उसे छोड़ दिया है। कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों को पूरी तरह त्याग दिया है। सुविधा की जिस राजनीति को अब कांग्रेस कर रही है उसमें किसी को इस सबको देखने का मौका नहीं रहता। पिछड़े कांग्रेस के साथ पूरी तरह से कभी भी नहीं थे। धीरे-धीरे उनको जब एक राजनीतिक वाणी मिलने लगी है तो वे अब अपनी दिशा में जा रहे हैं।

कांग्रेसी जमीन से इस तरह कट गए हैं कि कर्नाटक में उन्हें बंगरप्पा जैसे नेता को पार्टी से निकालना पड़ा और कुछ हो या न हो, बंगरप्पा अगले चुनाव में इन्हें हरा जरूर देंगे। कर्नाटक में कांग्रेस की हार अबकी पक्की है। वहां उच्च वर्ण जो कांग्रेस का आधार था, बीजेपी के साथ जा रहा है। दलितों को इन लोगों ने धक्का मार के बाहर कर दिया। पिछड़ों में देवगौड़ा हमेशा से ही बाहर रहे हैं। उनकी हालत मुलायम सिंह जैसी है। जहां उनको कोई दलित आधार मिला, पूरे राज्य को समेट ले जाएंगे। दक्षिण में जो ध्रुवीकरण हो चुका है वही ध्रुवीकरण अब उत्तर भारत में हो रहा है। यूपी में कांग्रेस अब लौटकर आने वाली नहीं है।

अगर भाजपा सचमुच पूरी तरह से दलितों की पार्टी बनना चाहे तो कांग्रेस की वापसी हो सकती है। ऊंची जाति के लोग कांग्रेस की तरफ वापस जा सकते हैं। लेकिन ऐसा होगा- लगता नहीं। आरएसएस के कुछ बड़े नेताओं की बातचीत से लग रहा है कि ये भाजपा को दलितों-पिछड़ों की पार्टी बनाने की बात तो जरूर कर रहे हैं लेकिन वे सचमुच में ऐसा करने नहीं जा रहे हैं। इससे उनका सारा का सारा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। इस बात को वे समझ रहे हैं। वे ऐसा नहीं करेंगे। इसलिए कांग्रेस की पुनर्वापसी की कोई संभावना उप्र में नहीं है। अगला राज्य दिखाई दे रहा है बिहार, जहां से कांग्रेस अगले चुनाव में साफ हो जाएगी।

जो भी नीतियां बनाई जा रही हैं या जो भी राजनीतिक समीकरण ऊपर से बनाए बिठाए जा रहे हैं, वे सारे के सारे इस देश के बहुसंख्यक समाज को कहीं से नहीं छूते। साठ फीसद लोग इस देश में पूरी तरह दरिद्र हैं जो किसी व्यवस्था में नहीं हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली
के जाल में नहीं हैं, किसी किस्म के आर्थिक विकास कार्यक्रम के जाल में नहीं हैं। डंकल आता है कि जाता है, इससे उनकी स्थिति पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। कांग्रेस क्या कर रही है, बीजेपी क्या कर रही है, गैट समझौता लागू हो रहा है या नहीं इस देश की
पिसी हुई जनता को इससे कुछ भी लेना-देना नहीं है। ये लोग इतने नीचे जा चुके हैं। उनके सारे के सारे सरोकार बदल गए हैं। जिसको राजनीतिक दल संबोधित नहीं कर पा रहे हैं। इस देश में पूरी की पूरी दो दुनिया बन गई हैं। एक मध्यवर्ग की दुनिया- इसके अंदर सारे संगठित मजदूर, मझौले किसान, व्यापारी, सारे नौकरी-पेशा लोग, शहरी लोगदृ वे शहरी लोग भी जो झुग्गियों में रहते हैं लेकिन जिनके हाथ में थोड़े-से साधन हैं, सुविधा है, जो थोड़ी-सी अलग जिंदगी जी रहे हैंदृशामिल हैं। इन चालीस फीसद की राजनीति हो रही है बकिया साठ फीसद लोगों को पूरी तरह से छोड़ दिया गया है।

जो सामाजिक आधार वाली पार्टियां हैं सतही रूप से ही सही, कहीं न कहीं उनकी भावनाओं को छू रही हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसी एक चुनाव क्षेत्र को उठाकर देख लीजिए। भाजपा 70 हजार, तो बसपा 76 हजार, कांग्रेस 4 हजार और जनता दल 3 हजार। ध्रुवीकरण
की यह दिशा है। जो उस तरफ गए हैं वे इसलिए नहीं कि उन्हें कोई बड़ा भारी आश्वासन मिला है या कि कोई बड़ा भारी परिवर्तन होने वाला है। वो धक्के खाते-खाते ऐसी जगह पहुंचे हैं कि उन्हें लगता है कि यही है जो हमारी भाषा बोल रहा है। शायद उसके पास समाधान भी हो, न भी हो तो कम-से-कम मुहावरे के स्तर पर उनसे एक तादात्म्य हो रहा है। खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा, बोली-बानी इस सबमें कहीं-न-कहीं उसे एक तादात्म्य दिख रहा है। उसे लग रहा है, फिर इसी को वोट दीजिए।

हो सकता है उसे वहां यह सब न मिले लेकिन वह उसी दिशा में आगे जाएगा। लौटकर पुनर्मूषकोभव नहीं होने वाला। भारत के अंदर एक यूरोप और एक अफ्रीका का यह जो विभाजन होता जा रहा है उसका अभी शांतिपूर्ण सहअस्तित्व चल रहा है, लेकिन यह बहुत दिन नहीं चलेगा। दलितों-पिछड़ों, अल्पसंख्यकों में धीरे-धीरे यह बात साफ होती गई है कि ये ऊपर के लोग उन्हें कुछ दे भी रहे थे तो उनकी भलाई के लिए नहीं, उनके पास हमारी भलाई के लिए कोई दूरगामी योजना नहीं है। इनके मन में हमारे लिए कोई दर्द नहीं है। हमारे पास सिर्फ हमारा वोट था जो ये मांग लेते थे हमें कुछ दे देते थे। ज्यादा खुद खाते थे। अब यह एहसास बढ़ रहा है तो दूरी भी बढ़ रही है। ये बसपा के पास जाना, मुलायम सिंह के पास जाना या इस तरह की पार्टियों के पास जाना इसी एहसास का नतीजा है। उनका यह जाना अंतिम जाना (फाइनल) नहीं है लेकिन यह चेतना अब आ गई है तो उससे लड़ाई बहुत साफ, बहुत क्लियर कट होगी।

मुलायम-कांशीराम के रूप में जो चेतना दिखाई दे रही है वह स्थानीय चरित्र की कतई नहीं है। देश में राजनीति की एक अंडरकरेंट (अन्तर लहर) चल रही है। यह उसका एक क्षेत्रीय उभार या एक क्षेत्रीय अभिव्यक्ति है। देश में आगे, इन सामाजिक आधार वाली पार्टियों का उभार होगा। कहीं यह कांग्रेस के रूप में दिखाई दे रहा है, कहीं मुलायम-कांशीराम के रूप में। हो सकता है, कहीं भाजपा के रूप में भी दिखाई दे- महाराष्ट्र में भाजपा के मजबूत होने का सबसे बड़ा कारण वहां पिछड़ी जातियों का इसके साथ होना है। उप्र में कांशीराम जीत रहे हैं और विदर्भ में विश्वविद्यालय के नामांतरण के नाम पर चार लोग आत्मदाह कर लेते हैं- ये कोई विच्छिन्न घटनाएं नहीं हैं, जुड़ी हुई घटनाएं हैं।

उत्तर प्रदेश में दलित-पिछड़ा उभार तो इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि इस देश में अकेला उप्र ऐसा राज्य है जहां की पूरी हिंदू आबादी में सवर्णों की संख्या सबसे ज्यादा हैदृतीस-पैंतीस फीसद। उस राज्य में यह चेतना कितनी तीव्र हुई होगी कि इस तरह का ध्रुवीकरण होकर एक ऐसा नतीजा सामने आ गया। यह पूरे देश में फैलेगा। इसे रोका नहीं जा सकता। ये सामाजिक प्रश्न हमेशा से हमारे बीच थे। बस, हम लोग इसे अनदेखा कर रहे थे। अगर इन सामाजिक शक्तियों को प्रगतिशील पार्टियां उसी शिद्दत से उठातीं कि उनको लगता कि हमारी बात की जा रही है, हमारे साथ कोई बेईमानी नहीं हो रही है तो इस तरह की शक्तियों को बढ़ने का अवसर नहीं मिलता। जाहिर है, कहीं न कहीं से उनकी लगातार उपेक्षा की गई है।

यानी क्या कारण है कि जातिवाद-जातिवाद होने लगा? अचानक देश में जातिवाद बढ़ गया। प्रधानमंत्री नरसिंह राव ब्राह्मण हैं, उनकी सलाहकार समिति में सारे ब्राह्मण हैं, उनके मंत्रिामंडल में सबसे ज्यादा मंत्राी ब्राह्मण हैं, देश का राष्ट्रपति ब्राह्मण है, देश का सेनापति ब्राह्मण है, पर कोई नहीं कहता कि देश में जातिवाद हो रहा है। एक मुलायम सिंह यादव कहीं एक यादव लाकर बैठा दे तो अखबारों में संपादकीय छपने शुरू हो जाते हैं कि जातिवाद बढ़ गया, अभी बहुत सारी बहसें जातिवाद पर चल पड़ी हैं।

इससे पहले जो सामाजिक समीकरण था, वह उच्च और निम्न वर्ण यानी ब्राह्मण और शूद्र के बीच था, बहुत दिनों तक इसे सफलतापूर्वक चलाया जाता रहा, जबकि उनके बीच खाई बहुत बड़ी थी। दलित और पिछड़ों के बीच भी खाई है- सामाजिक भी, आर्थिक भी, लेकिन एक छोटी सी बात देखिए, एक जमींदार जो भूमिहार, राजपूत या ब्राह्मण हो उसके और शूद्र जो खेतिहर मजदूर हैं उसके बीच जो संबंध हैं वह काफी टकराहट वाले थे। उसका कारण यह था कि ऊंची जाति का व्यक्ति शारीरिक श्रम में नहीं था। मालिक और नौकर या कहें राजा और प्रजा के संबंध थे, इससे दुराव, टकराव बहुत ज्यादा था, उसके बावजूद समीकरण चलता रहा।

पिछड़ी जातियों में जो अच्छी खेती-बाड़ी वाले लोग हैं, उन्होंने उसे अपनी मेहनत से अर्जित किया है। उनकी औरतें, मां-बाप, बेटे-बेटियां- सब मिलजुल के खेत में काम करते हैं। उन्हें जरूरत पड़ती है मजदूर की, अधिक से अधिक बुआई या कटाई के समय। बीच में उनका कोई संबंध नहीं होता। बहुत ही आर्थिक आधार पर वह संबंध निर्धारित होता है। उसमें बहुत तनाव की गुंजाइश नहीं होती। तीन दिन का काम हुआ और तीन दिन का पैसा लो और जाओ। जिस तरह के तनाव मालिक और मजदूर के संबंध में सालों साल बने रहने के कारण होते थे, पिछड़ी और दलित जातियों के बीच वे तनाव उतने और उस ऊंचाई पर नहीं रहते।

दूसरी प्रक्रिया है संस्कृतिकरण की। वह हिंदू धर्म में लगातार चलती रहती है। हर वह आदमी जो नीचे बैठा है वह अपने से ऊपर जाने की कोशिश करता है। चाहे जितनी गालियां दें लेकिन हर आदमी के मन में ब्राह्मण बनने की इच्छा लगातार रहती है- जरा जनेऊ पहन ले, थोड़ा संस्कृत बोल ले, सबके साथ चारपाई पर बैठ ले, थोड़ा पूजा-पाठ कर ले, भगवान से सीधी पहुंच बना ले- इस सबमें लगा रहता है। इसमें भी पिछड़ों और दलितों के बीच इतना फर्क नहीं है कि कोई बड़ा भारी तनाव जनम जाए। पिछड़ों के मंदिर में दलित चले जाएं तो इस पर लाठी नहीं चल जाती, ब्राह्मण के मंदिर में दलितों के चले जाने पर जरूर चल जाती है। ये तनाव जिस मात्रा में भी है, आगे चलकर विरोध और टकराव का रूप ले लेंगे। लेकिन जिस तरह शहरों में बैठे लोग कयास लगा रहे हैं कि वे आपस में लड़-कट मरेंगे, ऐसा नहीं है। यह इतनी आसानी से नहीं होने वाला। उनके अन्तरविरोध किसी बिंदु पर पहुंचकर तनाव में बदलेंगे लेकिन इसमें समय लगेगा। यह सारी सामाजिक परिघटना जो हमारा मूल भारत था, उसी में सीमित है। मूल भारत से मतलब अंग्रेजों के आने से पहले जो सांस्कृतिक रूप से भारत था- आर्याव्रत या उसे जो कुछ भी कह लीजिए। कश्मीर, उत्तर-पूर्व आदि ये हमारे राजनीतिक भारत के हिस्से हैं। इसलिए यह सामाजिक लड़ाई वहां नहीं पहुंचेगी। यह उनकी समस्या भी नहीं है। ये पूरी तरह से भिन्न राजनीतिक इकाइयां हैं। इसलिए वहां लड़ाई दूसरी है। राजनीतिक है। जो भी सत्ता में रहेगा उसको इसे हल करना पड़ेगा।

इस देश में अगर ब्राह्मणवाद विरोधी शक्तियां बढ़ती रही हैं तो इससे संघात्मक ढांचे को मजबूत बनाने की परिस्थितियां मजबूत होंगी। कश्मीर, उत्तर पूर्व की समस्याएं हल होंगी, तो एक सच्चे संघात्मक ढांचे में ही। उन्हें उनका वाजिब हक चाहिए। उन्हें भ्रष्ट बनाकर,
रिश्वत देकर, बेवकूफ बनाकर, उनको मार-पीटकर भारत में नहीं रखा जा सकता। क्षेत्रीय उभार के रूप में आ रही ब्राह्मणवाद विरोधी ताकतें एक शुभ संकेत हैं जो अपने अधिकार के साथ इन प्रदेशों के अधिकार की भी मांग करेंगी तभी वे प्रदेश भारत में रह पाएंगे, नहीं तो भारत से उनका निकलना तय है। बिना सामाजिक ढांचे को समझे किसी तरह का राजनीतिक, आर्थिक आंदोलन नहीं चलाया जा सकता।

31 जनवरी-14 फरवरी 1994, समकालीन जनमत