भारतीय जनता पार्टी कुछ विचित्र सशोपंज में है। न तो उसे राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार को निगलते बन रहा है और न ही उगलते। कश्मीर-पंजाब समस्या हो या रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का समाधान ढूंढ़ने की चेष्टा, चाहे मंडल आयोग की सिफारिशें लागू या न लागू करने का मामला हो या मूल्यवृद्धि के प्रश्न पर सरकार की असफलता का सवाल। भाजपा करीब हर महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर सरकार के काम या नीतियों से नितांत अप्रसन्न है। पर विडम्बना कुछ ऐसी है कि सरकार से हाथ खींचने की बात तो दूर, वह जमकर आलोचना भी नहीं कर पा रही है।
भाजपा भले ही यह कहे कि इस सरकार को गिराने से कांग्रेस को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि गैर-कांग्रेसी पार्टियां सरकार चला नहीं सकतीं, इसलिए वह अपने सीने पर मजबूरन पहाड़ ढो रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इस सरकार की रीति- नीति के कारण भाजपा का अंकगणित थोड़ा गड़बड़ा गया है। उसे लग रहा है कि आज यदि सरकार गिर जाती है, तो सबल एवं एकल विकल्प बनने का भाजपा का सपना पूरा नहीं हो सकता, जिसके लिए यह पार्टी सरकार बनने के पहले दिन से ही कोशिश कर रही है। सच तो यह है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार और उसका जनता दल तथा लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी सारे ऊपरी प्रेम और सौहार्द्र के बावजूद अंदर ही अंदर लगातार एक-दूसरे को काटने में लिप्त रहे हैं।
इन लोगों ने यह सोचा कि राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस विफल हो चुकी है और यह पार्टी अगले चुनाव तक इस काबिल नहीं रह पाएगी कि सार्थक चुनौती के रूप में उभर सके। इसलिए अगली लड़ाई तो विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चे तथा लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व पर धर्मदीप्त राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी शक्तियों के बीच लड़ी जाएगी। यही सोचकर दोनों पक्ष सरकार गठन के पहले दिन से ही अगले निर्वाचन को लक्ष्य बनाकर अपनी गतिविधियां संजो रहे हैं। फर्क सिर्फ यह है कि एक नंगी लड़ाई लड़ने की बजाए दोनों पक्ष शतरंज बिछाकर एक अच्छे मित्रा की तरह अपनी-अपनी चाल चल रहे हैं और क्षमतानुसार अगली तीन-चार चालों के बारे में सोच रहे हैं।
मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए सरकारी निर्णय के ठीक पहले तक शतरंज का यह खेल अपने अपने प्यादों को एक-एक कर आगे सरकाने तथा सिर्फ घेरेबंदी करने तक सीमित था। भाजपा का कहना था कि लामबंदी थोड़े दिनों तक इसी तरह चलती रहेगी कि अचानक मंडल आयोग के रूप में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इनका एक महत्त्वपूर्ण प्यादा मार डाला और इस तरह खेल को खूनी दौर तक पहुंचाने की पहल कर डाली। भाजपा ने जवाबी हमले के रूप में सोमनाथ से अयोध्या तक 10 हजार किलोमीटर की रथयात्रा का अपना इरादा घोषित किया और पहली बार विश्वनाथ प्रताप सिंह को भाजपा ने शह देने की कोशिश की।
रामजन्म भूमि के प्रश्न पर भारतीय जनता पार्टी बहुत चतुराई से अब तक अपना खेल खेलती रही है। ऐसे सारे काम, जिनसे एक राजनीतिक पार्टी के रूप में भाजपा की साख बढ़े और अगले चुनाव तक यह पार्टी देश में एक सक्षम विकल्प के रूप में उभर सके, भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व खुद करता रहा है। अन्य सारे काम, जिनसे हिंदू उग्रवाद को बढ़ावा मिले और देश में हिंदू एकता का ऐसा माहौल बने, जो आगे चलकर भाजपा के लिए मजबूत और विश्वसनीय वोट बैंक बन सके, विश्व हिंदू परिषद के जिम्मे है। इस खेल में तीसरा महत्त्वपूर्ण भागीदार है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो इन दोनों संगठनों से थोड़ी पृथक राय रखता है, लेकिन उसके क्रिया-कलाप अंततः उसी दिशा की ओर ले जाते हैं। अपने समर्थन, विरोध, आलोचना, प्रत्यालोचना तथा नरम- गरम नीतियों के बीच में तीनों संगठन राम जन्मभूमि के प्रश्न को अपनी वांछित दिशा में ले जाकर इसका सम्पूर्ण लाभ सिर्फ अपने पक्ष में उठाने का योजनाबद्ध काम कर रहे थे कि मंडल आयोग के रूप में इस योजना से भारी व्यवधान आ गया।
हो सकता है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब मंडल आयोग की सिफारिशों को ताबड़तोड़ लागू करने की घोषणा की, उस समय उनके सामने एक सीमित लक्ष्य सिर्फ यही रहा हो कि कैसे अगले दिन देवीलाल की रैली फ्लाॅप कर सकें और इसके दूरगामी परिणामों के बारे में उन्होंने ध्यान न दिया हो। पर अब जो बौखलाहट भाजपा नेतृत्व में लक्ष्य की जा रही है, उससे ऐसा नहीं लगता कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सिर्फ देवीलाल को ठिकाने लगाने के लिए ही यह मंडलास्त्र छोड़ा था।
अब तो इस विश्वास के लिए पूरा आधार दीख रहा है कि जो लड़ाई विश्वनाथ प्रताप सिंह और भाजपा शतरंज के बिसात पर सद्भावनापूर्ण वातावरण में लड़ रहे थे, उसकी अगली कड़ी निश्चय ही मंडल आयोग को लागू करने का निर्णय थी। अगस्त का पूरा महीना मंडल आयोग के उदर में समा गया और यह वही महीना है जिसे विश्व हिंदू परिषद ने कार सेवकों की सेना इकट्ठी करने, उन्हें ग्राम, शहर, ब्लॉक तथा जनपद स्तर पर संगठित करने तथा गांव स्तर पर उन वीरों का स्वागत करने के लिए चुना था। देशभर में यह कार्यक्रम कितना सफल-असफल हुआ, इसके बारे में कोई आधिकारिक जानकारी फिलहाल उपलब्ध नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश से जो सूचनाएं आई हैं वे विश्व हिंदू परिषद तथा उससे सहानुभूति रखने वालों को निश्चय ही चिंता में डालने वाली हैं। इस राज्य के 63 जिलों में से 16 में ही जिला स्तर पर स्वयंसेवकों का जत्था संगठित किया जा सका। बाकी राज्य आरक्षण के विरोध-समर्थन के माध्यम से बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था से उपजे असंतोष तथा अन्य सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक पिछड़ेपन तथा गैर बराबरी की सार्थक बहस में शामिल हो गया और रामजन्म भूमि का मामला पीछे पड़ गया। आरक्षण का विरोध या उसके समर्थन में आयाजित जुलूस और रैलियां आज भले ही एक जाति युद्ध का आभास दे रही हों लेकिन वास्तविकता यही है कि इस प्रक्रिया से ही वह सार्थक बहस प्रारंभ होगी जो सदियों से जड़ हिंदू समाज में कोई हलचल पैदा कर पाएगी। यह काम कोई राम शिला या राम ज्योति नहीं कर सकती, यह एहसास ही विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रमों की उत्तर प्रदेश में विफलता का मुख्य कारण है।
वि.हि.प. के कार्यक्रमों की विफलता की परिणति अंततः भाजपा और आरएसएस के राजनीतिक सपने के धराशायी होने में होगी, भाजपा नेतृत्व इस बात को अच्छी तरह समझता है। यही कारण है कि हर मोर्चे पर राष्ट्रीय मोर्चा सरकार की असफलता भाजपा के लिए अचानक मुखर चिंता का विषय हो गई है। सोमनाथ से अयोध्या तक की लंबी रथयात्रा का नेतृत्व लालकृष्ण आडवाणी खुद करें और अपने विधायकों-सांसदों को रामजन्म भूमि मंदिर निर्माण में सक्रिय भागीदारी की अनुमति दें, यह राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार के प्रति भाजपा के उग्र और नए आक्रामक तेवर की शुरुआत है। प्रश्न भविष्य में सत्ता की पूर्ण भागीदारी का है, इसलिए देश को इसके लिए तैयार रहना चाहिए कि यह छायायुद्ध उग्र से उग्रतर भी हो सकता है, पूर्ण युद्ध में भी परिणत हो सकता है या फिर एक ऐसे यादवी संघर्ष का रूप ले सकता है जिसके अंत में सिर्फ वही कांग्रेस बची रह सकती है जिसका अंत अंतिम मानकर यह लड़ाई छेड़ी गई है।
(18 सितंबर 1990, नवभारत टाइम्स)
ये थी खबरें आजतक,इंतजार कीजिए कल तक. एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह। दूरदर्शन कार्यक्रम आज तक के संपादक एसपी सिंह जितना यथार्थ बताते रहे, उतना फिर कभी किसी संपादक ने टीवी पर नहीं बताया।रविवार पत्रिका की खोजी पत्रकारिता के पीछे उन्हीं की दृष्टि थी।राजनीतिक-सामाजिक हलचलों के असर का सटीक अंदाज़ा लगाना और सरल भाषा में उसका खुलासा कर देना उनका स्टाइल था।पाखंड से आगे की पत्रकारिता के माहिर थे एसपी।पत्रकारिता के पहले और आखिरी महानायक एसपी के लेखन का संचयन राजकमल ने छापा है। वही लेख आपको यहां मिलेंगे
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शनिवार, 29 अक्टूबर 2011
शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011
सामाजिक न्याय पर सर्वसम्मति संभव है
आरक्षण विरोधी आंदोलन के अब करीब दो महीने पूरे होने को आ रहे हैं। एक अहिंसक और काफी हद तक लोकतांत्रिक शुरुआत के बाद यह आंदोलन उत्तर भारत के प्रमुख शहरों में हिंसक, युवा और छात्र वर्ग में आत्मघाती तथा राजनीतिक क्षेत्र में विस्फोटक मोड़ लेता हुआ एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा है जहां आंदोलनकारियों के अपने अलग-अलग उद्देश्य और उनके वास्तविक चेहरे स्पष्ट रूप से सामने आ गए हैं।
एक तरफ आंदोलन की वह मुख्यधारा है जिसका सूत्रपात स्कूल-कालेजों के छात्र शहरी युवा तथा मूल रूप से पढ़े-लिखे बेरोजगार नौजवानों ने जुलूस, धरनों तथा रैलियों के रूप में प्रारंभ किया था। वह अब आत्मदाह तथा आत्महत्या जैसे विकृत रूप में सामने आ रही है। देश के करोड़ों युवाओं के मन में स्वाभाविक रूप से घोर असंतोष है और कुंठा व निराशा की यह भावना मंडल आयोग की घोषणाओं को लागू करने के सरकारी निर्णय से अचानक नहीं पैदा हुई है। असंतोष के इस संचित बारूद में मंडल आयोग ने पलीता लगाने का काम जरूर किया है। असंतोष और निराशा के कारण भी हैं। विकास तथा प्रगति की भ्रामक अवधारणाओं और योजनाओं की विफलता ने आज एक ऐसा समाज तैयार किया है जहां मध्य वर्ग गांवों से शहरों की ओर अंधाधुंध भाग रहा है। लोग अपने पुश्तैनी कामधंधों तथा अपनी जमीन से कट कर सरकारी नौकरी की मृगमरीचिका की तलाश में ऐसी अधकचरी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जो न केवल उन्हें अपने पारंपरिक हुनर से नफरत सिखाती है बल्कि उन्हें इस योग्य भी नहीं रहने देती कि करोड़ों बेरोजगारों के हुजूम में शामिल हो कर अपने लिए एक सरकारी नौकरी झपट सकें। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में पढ़े-लिखे चार करोड़ से ज्यादा बेरोजगार काम दिलाऊ दफ्तर के रजिस्टर में दर्ज पड़े हैं। सरकार यदि पूरी ईमानदारी से प्रयास करे तो साल में 40 हजार से ज्यादा नौकरियां नहीं दे सकती। ऐसी स्थिति में अंधेरी गुफाओं में भटकते युवाओं को यदि यह लगता है कि कई दिनों की भूख के बाद मिली सूखी रोटी में भी कोई नाजायज़ ढंग से हिस्सा बंटाना चाहता है तो इस तरह की सोच के लिए उन्हें बहुत ज्यादा दोषी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे में यदि उत्तेजित होकर मंडल आयोग के विरुद्ध कोई आंदोलन छेड़ देता है तो उसे बहुत अनुचित भी नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में यदि वे यह भी भूल जाते हैं कि समाज के प्रति उनका भी एक दायित्व है और आर्थिक-सामाजिक न्याय तथा गैर बराबरी को दूर करने के लिए उठाए गए कदम का यदि वे विरोध करते हैं तो उनका दोष कम है और उन लोगों का ज्यादा, जो एक तरफ तो अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए इस विषम सामाजिक व्यवस्था को जारी रखने में सहायक होते हैं और दूसरे इन दिशाहीन युवाओं को उस अंधेरी सुरंग में और आगे बढ़ाकर उनके आक्रोश की ऊर्जा को विध्वंस की आग में बदलने का षड्यंत्र रचते रहते हैं। आज यदि युवक आत्मदाह और आत्महत्या जैसे असंतोष और आंदोलन के विकृत साधनों का सहारा ले रहे हैं तो इसका मुख्य कारण व्यवस्था की विफलता के कारण उपजी निराशा और कुंठा है न कि मंडल आयोग की सिफारिशें। मंडल आयोग ने तो सिर्फ उत्प्रेरक का काम किया है।
इस मामले में प्रधानमंत्री सिर्फ मीडिया को जिम्मेदार ठहरा कर और यह कह कर बरी नहीं हो सकते कि प्रेस ने मंडल आयोग रिपोर्ट के सिर्फ एक पक्ष् को ही उभारा, इसलिए सामाजिक रूप से स्थिति विस्फोटक हो गई और यदि प्रेस ने संतुलित रवैया अपनाया होता तो जनभावना के इस कदर भड़कने का नजारा सामने नहीं आता। प्रेस के एक बहुत बड़े हिस्से की भूमिका निश्चित रूप से सराहनीय नहीं कही जा सकती, क्योंकि मीडिया ने न केवल आंदोलन के लिए युवाओं को उत्प्रेरित किया बल्कि आत्मदाह के मामले में बलिदान, आहुति या शहीद जैसे शब्दों का प्रयोग कर इस कुकृत्य को इतना महिमा मंडित किया कि पहले से ही कुंठित और निराश युवकों को यह देश और समाज के लिए सचमुच बलिदान का प्रतीक लगने लगा। कुछ समाचार पत्रों का यह कर्म सती के महिमा मंडन जैसे कृत्य से कम जघन्य नहीं था। लेकिन यदि सरकार समय रहते चेत जाती और मंडल आयोग लागू की घोषणा के साथ युवकों के सामाजिक दायित्व और मंडल आयोग की सिफारिशों को आंशिक रूप से लागू करने की बात को समझा कर सामने रखती तो लोग इस तरह के आत्मघाती कदम कतई नहीं उठाते।
इस बात पर विवाद हो सकता है, पर यदि मंडल आयोग के प्रतिवेदन को लागू करने की घोषणा अचानक न की जाती और पहले से विचार-विमर्श करके माहौल बनाने का काम किया जाता तो इसे लागू करना नितांत असंभव कर्म होता। लेकिन सच यह भी है कि इसे लागू करने की घोषणा के बाद जिस व्यापक स्तर पर सरकार को जन शिक्षण का कार्यक्रम प्रारंभ करना चाहिए था, उसमें वह पूरी तरह से विफल रही। सरकारी घोषणा के महीने भर बाद तक लोगों को धीरे-धीरे छन-छन कर यह बात पता चलती रही कि मंडल आयोग की ढेर सरी सिफारिशों में से सरकार ने सिर्फ एक केंद्रीय सरकार की नौकरियों में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की बात को ही माना है कि शिक्षण संस्थाओं में यह आरक्षण नहीं लागू होगा कि तरक्की में भी आरक्षण नहीं होगा आदि। जानकारी के अभाव में छात्र युवाओं का आंदोलन उग्र से उग्रतर होता रहा और सरकार इसे शांत करने के प्रशासनिक कर्म में भी विफल रही।
आंदोलन के उग्र होने की प्रतीक्षा में दूर बैठे तत्वों के लिए इस स्थिति में घुसपैठ करने का यह स्वर्ण अवसर था। कहीं व्यक्तिगत कारणों से रुष्ट सत्तापक्ष के राजनीतिज्ञ तो कहीं अवसर की तलाश में समाज विरोधी तत्व और सरकार की परेशानियों से लाभ उठाने के लिए सदा तत्पर विपक्षी राजनीतिक पार्टियों, सबके लिए यह आंदोलन अपने स्वार्थ साधन का हथियार मात्र बन कर रह गया। छात्र, युवा, बेरोजगार पीछे रह गए। सामने आ गए राजनीतिक नेता। सारी मांगें पीछे रह गईं, सिर्फ एक मांग ही बची कि विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दें। सड़कों पर आंदोलन कर रहे युवा छात्रों के निर्मल चेहरों की जगह मंजे हुए अपराधियों के चेहरे छा गए। कहीं छात्र स्वेच्छा से आत्मदाह कर रहे थे तो कहीं-कहीं उनकी इच्छा के विरुद्ध मानव दहन होने लगे। शराब की दुकानें लूटना, पुलिस की कनपटी पर रिवाल्वर रख कर गोली मारना और सारी-सारी रात लूटपाट का तांडव मचाना निश्चय ही छात्रों का काम नहीं हो सकता। वे सारे चेहरे अब सामने आ गए थे जिन्होंने सन 84 में लोगों को जिंदा जलाने का अभ्यास किया था या जिन्हें दहेज के लालच में अपनी निर्दोष बहुओं को जलाने में हिचक नहीं होती। इसके लिए सभी दोषी हैं। सामाजिक न्याय के प्रति हिंदू समाज की घोर असहिष्णुता, मीडिया और बौद्धिक वर्ग की गैर जिम्मेदार और खतरनाक भूमिका, लेकिन इनसे भी कहीं ज्यादा सरकार की असफलता प्रशासन के क्षेत्र में भी और जन शिक्षण के मामले में भी। मंडल आयोग की सिफारिश लागू करने की घोषणा से लेकर आंदोलन के राजनीतिज्ञों और समाज विरोधियों के हाथ पहुंचने के बीच सरकार के पास पर्याप्त समय था। वह यदि चाहती तो युवाओं, छात्रों की आशंकाओं को दूर कर सकती थी। शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और समाजशास्त्रियों के साथ मिल-बैठ कर एक सर्वसहमति का रास्ता निकाल सकती थी और बहुत थोड़ी सी कोशिश से यह धारणा भी दूर कर सकती थी कि इस कदम के पीछे सरकार की सामाजिक न्याय दिलाने की सदिच्छा नहीं, बल्कि राजनीतिक गोटी बिठाने की वासना है। कांग्रेस, भाजपा तथा वामदलों सहित सभी प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में इस बात पर सहमति तो पहले दिन से ही है कि पिछड़े वर्ग को आरक्षण मिलना चाहिए। मतभेद सिर्फ इन मुद्दों पर है कि वर्ग निर्धारण का आधार क्या हो और कितना आरक्षण दिया जाए। थोड़ी सी चेष्टा में इस पर भी सर्वसम्मति हो सकती है। प्रश्न सामाजिक-आर्थिक न्याय का न्यूनतम समान स्तर दिलाने का है, मंडल आयोग की रिपोर्ट को शब्दशः लागू कराने का नहीं। यदि यह लक्ष्य आम सहमति से संभव है और मुख्य राजनीतिक दलों के बीच सह सहमति है भी तो एक सर्वसम्मत समाधान में बाधा कहां है।
20 अक्तूबर 1990 नवभारत टाइम्स
एक तरफ आंदोलन की वह मुख्यधारा है जिसका सूत्रपात स्कूल-कालेजों के छात्र शहरी युवा तथा मूल रूप से पढ़े-लिखे बेरोजगार नौजवानों ने जुलूस, धरनों तथा रैलियों के रूप में प्रारंभ किया था। वह अब आत्मदाह तथा आत्महत्या जैसे विकृत रूप में सामने आ रही है। देश के करोड़ों युवाओं के मन में स्वाभाविक रूप से घोर असंतोष है और कुंठा व निराशा की यह भावना मंडल आयोग की घोषणाओं को लागू करने के सरकारी निर्णय से अचानक नहीं पैदा हुई है। असंतोष के इस संचित बारूद में मंडल आयोग ने पलीता लगाने का काम जरूर किया है। असंतोष और निराशा के कारण भी हैं। विकास तथा प्रगति की भ्रामक अवधारणाओं और योजनाओं की विफलता ने आज एक ऐसा समाज तैयार किया है जहां मध्य वर्ग गांवों से शहरों की ओर अंधाधुंध भाग रहा है। लोग अपने पुश्तैनी कामधंधों तथा अपनी जमीन से कट कर सरकारी नौकरी की मृगमरीचिका की तलाश में ऐसी अधकचरी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जो न केवल उन्हें अपने पारंपरिक हुनर से नफरत सिखाती है बल्कि उन्हें इस योग्य भी नहीं रहने देती कि करोड़ों बेरोजगारों के हुजूम में शामिल हो कर अपने लिए एक सरकारी नौकरी झपट सकें। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में पढ़े-लिखे चार करोड़ से ज्यादा बेरोजगार काम दिलाऊ दफ्तर के रजिस्टर में दर्ज पड़े हैं। सरकार यदि पूरी ईमानदारी से प्रयास करे तो साल में 40 हजार से ज्यादा नौकरियां नहीं दे सकती। ऐसी स्थिति में अंधेरी गुफाओं में भटकते युवाओं को यदि यह लगता है कि कई दिनों की भूख के बाद मिली सूखी रोटी में भी कोई नाजायज़ ढंग से हिस्सा बंटाना चाहता है तो इस तरह की सोच के लिए उन्हें बहुत ज्यादा दोषी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे में यदि उत्तेजित होकर मंडल आयोग के विरुद्ध कोई आंदोलन छेड़ देता है तो उसे बहुत अनुचित भी नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में यदि वे यह भी भूल जाते हैं कि समाज के प्रति उनका भी एक दायित्व है और आर्थिक-सामाजिक न्याय तथा गैर बराबरी को दूर करने के लिए उठाए गए कदम का यदि वे विरोध करते हैं तो उनका दोष कम है और उन लोगों का ज्यादा, जो एक तरफ तो अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए इस विषम सामाजिक व्यवस्था को जारी रखने में सहायक होते हैं और दूसरे इन दिशाहीन युवाओं को उस अंधेरी सुरंग में और आगे बढ़ाकर उनके आक्रोश की ऊर्जा को विध्वंस की आग में बदलने का षड्यंत्र रचते रहते हैं। आज यदि युवक आत्मदाह और आत्महत्या जैसे असंतोष और आंदोलन के विकृत साधनों का सहारा ले रहे हैं तो इसका मुख्य कारण व्यवस्था की विफलता के कारण उपजी निराशा और कुंठा है न कि मंडल आयोग की सिफारिशें। मंडल आयोग ने तो सिर्फ उत्प्रेरक का काम किया है।
इस मामले में प्रधानमंत्री सिर्फ मीडिया को जिम्मेदार ठहरा कर और यह कह कर बरी नहीं हो सकते कि प्रेस ने मंडल आयोग रिपोर्ट के सिर्फ एक पक्ष् को ही उभारा, इसलिए सामाजिक रूप से स्थिति विस्फोटक हो गई और यदि प्रेस ने संतुलित रवैया अपनाया होता तो जनभावना के इस कदर भड़कने का नजारा सामने नहीं आता। प्रेस के एक बहुत बड़े हिस्से की भूमिका निश्चित रूप से सराहनीय नहीं कही जा सकती, क्योंकि मीडिया ने न केवल आंदोलन के लिए युवाओं को उत्प्रेरित किया बल्कि आत्मदाह के मामले में बलिदान, आहुति या शहीद जैसे शब्दों का प्रयोग कर इस कुकृत्य को इतना महिमा मंडित किया कि पहले से ही कुंठित और निराश युवकों को यह देश और समाज के लिए सचमुच बलिदान का प्रतीक लगने लगा। कुछ समाचार पत्रों का यह कर्म सती के महिमा मंडन जैसे कृत्य से कम जघन्य नहीं था। लेकिन यदि सरकार समय रहते चेत जाती और मंडल आयोग लागू की घोषणा के साथ युवकों के सामाजिक दायित्व और मंडल आयोग की सिफारिशों को आंशिक रूप से लागू करने की बात को समझा कर सामने रखती तो लोग इस तरह के आत्मघाती कदम कतई नहीं उठाते।
इस बात पर विवाद हो सकता है, पर यदि मंडल आयोग के प्रतिवेदन को लागू करने की घोषणा अचानक न की जाती और पहले से विचार-विमर्श करके माहौल बनाने का काम किया जाता तो इसे लागू करना नितांत असंभव कर्म होता। लेकिन सच यह भी है कि इसे लागू करने की घोषणा के बाद जिस व्यापक स्तर पर सरकार को जन शिक्षण का कार्यक्रम प्रारंभ करना चाहिए था, उसमें वह पूरी तरह से विफल रही। सरकारी घोषणा के महीने भर बाद तक लोगों को धीरे-धीरे छन-छन कर यह बात पता चलती रही कि मंडल आयोग की ढेर सरी सिफारिशों में से सरकार ने सिर्फ एक केंद्रीय सरकार की नौकरियों में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की बात को ही माना है कि शिक्षण संस्थाओं में यह आरक्षण नहीं लागू होगा कि तरक्की में भी आरक्षण नहीं होगा आदि। जानकारी के अभाव में छात्र युवाओं का आंदोलन उग्र से उग्रतर होता रहा और सरकार इसे शांत करने के प्रशासनिक कर्म में भी विफल रही।
आंदोलन के उग्र होने की प्रतीक्षा में दूर बैठे तत्वों के लिए इस स्थिति में घुसपैठ करने का यह स्वर्ण अवसर था। कहीं व्यक्तिगत कारणों से रुष्ट सत्तापक्ष के राजनीतिज्ञ तो कहीं अवसर की तलाश में समाज विरोधी तत्व और सरकार की परेशानियों से लाभ उठाने के लिए सदा तत्पर विपक्षी राजनीतिक पार्टियों, सबके लिए यह आंदोलन अपने स्वार्थ साधन का हथियार मात्र बन कर रह गया। छात्र, युवा, बेरोजगार पीछे रह गए। सामने आ गए राजनीतिक नेता। सारी मांगें पीछे रह गईं, सिर्फ एक मांग ही बची कि विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दें। सड़कों पर आंदोलन कर रहे युवा छात्रों के निर्मल चेहरों की जगह मंजे हुए अपराधियों के चेहरे छा गए। कहीं छात्र स्वेच्छा से आत्मदाह कर रहे थे तो कहीं-कहीं उनकी इच्छा के विरुद्ध मानव दहन होने लगे। शराब की दुकानें लूटना, पुलिस की कनपटी पर रिवाल्वर रख कर गोली मारना और सारी-सारी रात लूटपाट का तांडव मचाना निश्चय ही छात्रों का काम नहीं हो सकता। वे सारे चेहरे अब सामने आ गए थे जिन्होंने सन 84 में लोगों को जिंदा जलाने का अभ्यास किया था या जिन्हें दहेज के लालच में अपनी निर्दोष बहुओं को जलाने में हिचक नहीं होती। इसके लिए सभी दोषी हैं। सामाजिक न्याय के प्रति हिंदू समाज की घोर असहिष्णुता, मीडिया और बौद्धिक वर्ग की गैर जिम्मेदार और खतरनाक भूमिका, लेकिन इनसे भी कहीं ज्यादा सरकार की असफलता प्रशासन के क्षेत्र में भी और जन शिक्षण के मामले में भी। मंडल आयोग की सिफारिश लागू करने की घोषणा से लेकर आंदोलन के राजनीतिज्ञों और समाज विरोधियों के हाथ पहुंचने के बीच सरकार के पास पर्याप्त समय था। वह यदि चाहती तो युवाओं, छात्रों की आशंकाओं को दूर कर सकती थी। शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और समाजशास्त्रियों के साथ मिल-बैठ कर एक सर्वसहमति का रास्ता निकाल सकती थी और बहुत थोड़ी सी कोशिश से यह धारणा भी दूर कर सकती थी कि इस कदम के पीछे सरकार की सामाजिक न्याय दिलाने की सदिच्छा नहीं, बल्कि राजनीतिक गोटी बिठाने की वासना है। कांग्रेस, भाजपा तथा वामदलों सहित सभी प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में इस बात पर सहमति तो पहले दिन से ही है कि पिछड़े वर्ग को आरक्षण मिलना चाहिए। मतभेद सिर्फ इन मुद्दों पर है कि वर्ग निर्धारण का आधार क्या हो और कितना आरक्षण दिया जाए। थोड़ी सी चेष्टा में इस पर भी सर्वसम्मति हो सकती है। प्रश्न सामाजिक-आर्थिक न्याय का न्यूनतम समान स्तर दिलाने का है, मंडल आयोग की रिपोर्ट को शब्दशः लागू कराने का नहीं। यदि यह लक्ष्य आम सहमति से संभव है और मुख्य राजनीतिक दलों के बीच सह सहमति है भी तो एक सर्वसम्मत समाधान में बाधा कहां है।
20 अक्तूबर 1990 नवभारत टाइम्स
वि.प्र. को कसौटी पर खरा उतरना होगा
मोहलत शब्द इन दिनों चर्चा में आम है। खासकर वे लोग, जो मानते हैं कि मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने का सरकारी फैसला शुद्ध राजनीतिक उद्देश्य से किया गया था, इस बात पर बार-बार बल दे रहे हैं कि उच्चतम न्यायालय के आदेश से आरक्षण विरोधी आंदोलन की उग्रता और तीव्रता में जो कमी आई है सरकार इस वास्तविकता को देखे, समझे और इस अवसर का लाभ उठाते हुए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के फैसले को वापस लेने का व्यावहारिक कदम उठाए। यह समाज के उस प्रभावशाली तबके का तर्क है जो यह भी मानता रहा है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह का यह फैसला मूलतः देवीलाल की किसान रैली की हवा निकालने के एक तुच्छ प्रयास के रूप में उठाया गया एक ऐसा बगैर सोचा समझा हड़बड़ी में उठाया गया कदम था, जिसने देश को जातियुद्ध के भयानक दावानल में ठेल दिया। यह वह वर्ग है जो यह भी मानता है कि इसका दूरगामी उद्देश्य पिछड़े और दलित तबके को सामाजिक न्याय दिलाने का कतई नहीं है, उसका वास्तविक उद्देश्य तो सिर्फ पिछड़ों के बीच अपने वोट बैंक का आधार मजबूत करना है, इसके लिए चाहे कितनी भी मासूम जानें बलि क्यों न चढ़ जाएं, हृदयहीन प्रधानमंत्री को इसकी कोई चिंता नहीं है। मूलतः आरक्षण की परिकल्पना का विरोधी यह वर्ग जब उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई इस मोहलत का जिक्र करता है, तो एक तरफ जहां इसमें प्रच्छन्न धमकी होती है कि देखिए, यदि अब भी आप अपनी इस गंदी राजनीति से बाज नहीं आए तो देश में हिंसा का एक ज्यादा भयानक दौर प्रारंभ हो सकता है, जिसके जिम्मेवार आप होंगे और यह कहते हुए कहीं न कहीं कनखी मार कर यह भी साफ कर रहा होता है कि इस तरह की आग लगाने और बुझाने में इस वर्ग की भूमिका को भी कृपया आप समझने का प्रयास करें।
यह सच है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनकी सरकार को उच्चतम न्यायालय की कृपा से एक बड़ी मोहलत मिली है वरना समाज में भावनाओं का अतिरेक उस सीमा पर पहुंचा हुआ था, जहां सच तो क्या कुछ भी सुनने के लिए लोग तैयार नहीं दीख रहे थे अब मौका है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह अपनी स्थिति स्पष्ट करें कि क्या सचमुच उनका उद्देश्य सिर्फ यही था कि वेदेवीलाल की किसान रैली की हवा निकाल दें। यदि हां, तो अब भी देर नहीं हुई है। कृपया मंडल आयोग तत्काल वापस कर लें। या यदि उनका उद्देश्य सिर्फ यही था कि इसे लागू करने से उनको वोट बैंक का नया आधार मिलेगा तो उनकी राजनीतिक सूझबूझ पर तरस खाना आना चाहिए क्योंकि पिछड़ी जातियों का वोट बैंक तो इस सरकार के साथ था ही और न ही दूर दूर तक इस बात की कहीं आशंका थी कि यह आधार खिसक कर कहीं और जाने वाला है। यह कहा जा सकता है कि यह वोट बैंक विश्वनाथ प्रताप का अपना नहीं था। इस आधार को बनाने में कहीं लालू-मुलायम, तो कहीं शरद-रामविलास जैसे क्षत्रपों का उन्हें सहारा लेना पड़ता था, इसलिए अपना निजी ठोस आधार बनाने के चक्कर में विश्वनाथ प्रताप ने अपने जनमोर्चा आधार की सारी जमा पूंजी दांव पर लगा कर इस पिछड़े वोट बैंक के व्यापक जनाधार को जीतने का जुआ खेला। यदि सचमुच विश्वनाथ प्रताप की इतनी सीमित महत्वाकांक्षा थी, जिसके लिए उन्होंने छात्र, शिक्षक, वकील, बुद्धिजीवी जैसे मुखर समर्थक वर्ग को तथाकथित जाति युद्ध में झांक दिया, तो उनके राजनीतिक ज्ञान और निर्वाचनी समीकरण का भगवान ही मालिक है। यदि सचमुच ऐसा ही है तो कृपया मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के अपने फैसले को तत्काल निरस्त करने के आदेश जारी कर दें। अभी बहुत देर नहीं हुई है। यदि महत्वाकांक्षाओं के अपने इस नितांत निजी समुद्र में ही वे डूब उतरा रहे हैं, तो सचमुच उनके लिए मोहलत शब्द तिनके का सहारा साबित हो सकता है उसे छोड़े नहीं, सामाजिक न्याय भले ही पीछे पड़ जाए।
लेकिन यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा इन टुच्चे स्वार्थों के लिए नहीं बल्कि जैसा कि वे कह रहे हैं पिछड़े वर्गों में तेजी से बढ़ रहे आक्रोश और शहर तथा अभिजात्य वर्ग विरोधी भावना को रोकने के लिए यह समाज में व्याप्त उग्रविभाजन की भावना को कम करने के लिए या पिछड़े वर्ग को राज्य संचालन में उनकी उचित निर्णायक भूमिका दिलाने के लिए या सिर्फ सामाजिक-आर्थिक न्याय दिलाने की दिशा में उठाए गए पहले कदम के रूप में यह कार्रवाई की गई है, तो प्रधानमंत्री को इस दिशा में निस्संकोच आगे बढ़ना चाहिए।(मोहलत दिलाने वाले उस वर्ग को धन्यवाद देते हुए) क्योंकि वातावरण निश्चय ही इतना विषाक्त हो गया था और माहौल में चलते मानव मांस की चिराइन गंध कुछ इस कदर हावी थी कि उसमें सामाजिक न्याय दिलाने की बात तो दूर, किसी भी प्रकार का सार्थक-असार्थक संवाद संभव ही नहीं था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि विश्वनाथ प्रताप फिलहाल समाज के सबसे प्रभावशाली और मुखर वर्ग में घोर अलोकप्रिय हो रहे हैं। वे निश्चय ही इस तथ्य से भी अवगत होंगे कि इस महत्वपूर्ण वर्ग को अपनी ओर रख कर इस देश में निर्वाचनी राजनीति सफलतापूर्वक करना असंभव तो नहीं, लेकिन कठिन अवश्य है। अब तक तक किसी भी राजनेता ने इस कठिन रास्ते को अपनाने की कोशिश भी नहीं की। ऐसी स्थिति में यदि विश्वनाथ प्रताप अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता पर डटे रहते हैं तो यह तय है कि इस देश की राजनीति की दिशा और इस समाज के पारंपरिक ढांचे में ऐसे मूलभूत परिवर्तन आएंगे, जिसकी इस देश-समाज ने कल्पना भी नहीं की होगी। हो सकता है कि इस महती प्रक्रिया से विश्वनाथ प्रताप और उनकी पार्टी अगला चुनाव हार जाए, लेकिन यदि वे सचमुच समता मूलक समाज के निर्धारण के लिए प्रतिबद्ध हैं तो देश इस बलिदान के लिए उनका कृतज्ञ रहेगा और उनके खुद के दामन पर जो टुच्ची राजनीति के छींटे डाल दिए गए हैं, उनसे भी वे मुक्त हो पाएंगे। विश्वनाथ प्रताप यदि पिछड़े एवं दलित वर्गों के शोषण के कुचक्र को तोड़ कर वास्तविक सामाजिक-आर्थिक बराबरी की दिशा में बढ़ने के प्रयास के रूप में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की बात कर रहे हैं तो मंडल आयोग के प्रश्न पर पीछे नहीं हटें, और इस मोहलत का उपयोग सरकार की इस प्रतिबद्धता को और दृढ़ करने के एक अवसर के रूप में करें।
कानूनी लड़ाई मूलतः तीन मुद्दों पर लड़ी जाएगी। एक, संविधान सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने की गारंटी देता है, पिछड़ी जातियों को नहीं। दो, जातियों की गणना और उनकी पहचान का आधार चूंकि 60 साल पुराना है, इसलिए अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक है। तीसरी, सरकारी नौकरियों में आरक्षण की उच्चतम सीमा क्या हो- क्या 50 प्रतिशत नौकरियों को आरक्षित कर देना उचित होगा? ये तीनों प्रश्न कई मुकदमों में कई उच्च न्यायालयों द्वारा विवेचित हो चुके हैं और इनके आधार पर दिए गए निर्णयों के बावजूद देश के अनेक राज्यों में आरक्षण-व्यवस्था सफलतापूर्वक बिना सड़कों पर खून बहाए, सुचारू रूप से चल रही है। यदि विश्वनाथ प्रताप की सरकार सिर्फ राजनीतिक उद्देश्य से मंडल आयोग का दुरुपयोग नहीं कर रही है तो उसके लिए सचमुच यह एक ऐसा अवसर है, कि सामाजिक न्याय के आवश्यक अस्त्र के रूप में आरक्षण व्यवस्था को वह वैधानिक, नैतिक और अंततः व्यावहारिक स्वरूप दिलवा सकती है। वह मंडल आयोग के रूप में भी हो सकता है और मुंगेरी लाल आयोग के रूप में भी या दक्षिण में लागू अन्य किसी भी आरक्षण व्यवस्था के रूप में इसे लागू कर सकते हैं। शर्त सिर्फ यही है कि सरकार सदाशयी हो और ईमानदारी से न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करे। साथ ही, आंदोलनकारी युवा छात्रों को यह विश्वास दिलाने में भी सफल हो सके कि वह सिर्फ सामाजिक न्याय दिलाने के लिए ही प्रतिबद्ध नहीं है, बल्कि वह इस दिशा मं भी सार्थक कदम उठाने जा रही है, जिससे देश के युवाओं में व्याप्त हताशा और कुंठा की ऊर्जा का राष्ट्र निर्माण में सदुपयोग किया जा सके, न कि आत्मदाह या आत्महत्या जैसे पलायनवादी कर्म में। सरकार की विश्वसनीयता फिलहाल शून्य के बराबर है, इसलिए शब्द चाहे वे कितने ही पवित्र क्यों न हों अभी खोखले ही लगेंगे, इसलिए सरकार इस मोहलत को चाहे तो कर्म के रूप में सार्थक उपयोग कर सकती है। सार्थक संवाद तभी बन सकेगा।
9 अक्टूबर 1990, नव भारत टाइम्स
यह सच है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनकी सरकार को उच्चतम न्यायालय की कृपा से एक बड़ी मोहलत मिली है वरना समाज में भावनाओं का अतिरेक उस सीमा पर पहुंचा हुआ था, जहां सच तो क्या कुछ भी सुनने के लिए लोग तैयार नहीं दीख रहे थे अब मौका है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह अपनी स्थिति स्पष्ट करें कि क्या सचमुच उनका उद्देश्य सिर्फ यही था कि वेदेवीलाल की किसान रैली की हवा निकाल दें। यदि हां, तो अब भी देर नहीं हुई है। कृपया मंडल आयोग तत्काल वापस कर लें। या यदि उनका उद्देश्य सिर्फ यही था कि इसे लागू करने से उनको वोट बैंक का नया आधार मिलेगा तो उनकी राजनीतिक सूझबूझ पर तरस खाना आना चाहिए क्योंकि पिछड़ी जातियों का वोट बैंक तो इस सरकार के साथ था ही और न ही दूर दूर तक इस बात की कहीं आशंका थी कि यह आधार खिसक कर कहीं और जाने वाला है। यह कहा जा सकता है कि यह वोट बैंक विश्वनाथ प्रताप का अपना नहीं था। इस आधार को बनाने में कहीं लालू-मुलायम, तो कहीं शरद-रामविलास जैसे क्षत्रपों का उन्हें सहारा लेना पड़ता था, इसलिए अपना निजी ठोस आधार बनाने के चक्कर में विश्वनाथ प्रताप ने अपने जनमोर्चा आधार की सारी जमा पूंजी दांव पर लगा कर इस पिछड़े वोट बैंक के व्यापक जनाधार को जीतने का जुआ खेला। यदि सचमुच विश्वनाथ प्रताप की इतनी सीमित महत्वाकांक्षा थी, जिसके लिए उन्होंने छात्र, शिक्षक, वकील, बुद्धिजीवी जैसे मुखर समर्थक वर्ग को तथाकथित जाति युद्ध में झांक दिया, तो उनके राजनीतिक ज्ञान और निर्वाचनी समीकरण का भगवान ही मालिक है। यदि सचमुच ऐसा ही है तो कृपया मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के अपने फैसले को तत्काल निरस्त करने के आदेश जारी कर दें। अभी बहुत देर नहीं हुई है। यदि महत्वाकांक्षाओं के अपने इस नितांत निजी समुद्र में ही वे डूब उतरा रहे हैं, तो सचमुच उनके लिए मोहलत शब्द तिनके का सहारा साबित हो सकता है उसे छोड़े नहीं, सामाजिक न्याय भले ही पीछे पड़ जाए।
लेकिन यदि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा इन टुच्चे स्वार्थों के लिए नहीं बल्कि जैसा कि वे कह रहे हैं पिछड़े वर्गों में तेजी से बढ़ रहे आक्रोश और शहर तथा अभिजात्य वर्ग विरोधी भावना को रोकने के लिए यह समाज में व्याप्त उग्रविभाजन की भावना को कम करने के लिए या पिछड़े वर्ग को राज्य संचालन में उनकी उचित निर्णायक भूमिका दिलाने के लिए या सिर्फ सामाजिक-आर्थिक न्याय दिलाने की दिशा में उठाए गए पहले कदम के रूप में यह कार्रवाई की गई है, तो प्रधानमंत्री को इस दिशा में निस्संकोच आगे बढ़ना चाहिए।(मोहलत दिलाने वाले उस वर्ग को धन्यवाद देते हुए) क्योंकि वातावरण निश्चय ही इतना विषाक्त हो गया था और माहौल में चलते मानव मांस की चिराइन गंध कुछ इस कदर हावी थी कि उसमें सामाजिक न्याय दिलाने की बात तो दूर, किसी भी प्रकार का सार्थक-असार्थक संवाद संभव ही नहीं था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि विश्वनाथ प्रताप फिलहाल समाज के सबसे प्रभावशाली और मुखर वर्ग में घोर अलोकप्रिय हो रहे हैं। वे निश्चय ही इस तथ्य से भी अवगत होंगे कि इस महत्वपूर्ण वर्ग को अपनी ओर रख कर इस देश में निर्वाचनी राजनीति सफलतापूर्वक करना असंभव तो नहीं, लेकिन कठिन अवश्य है। अब तक तक किसी भी राजनेता ने इस कठिन रास्ते को अपनाने की कोशिश भी नहीं की। ऐसी स्थिति में यदि विश्वनाथ प्रताप अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता पर डटे रहते हैं तो यह तय है कि इस देश की राजनीति की दिशा और इस समाज के पारंपरिक ढांचे में ऐसे मूलभूत परिवर्तन आएंगे, जिसकी इस देश-समाज ने कल्पना भी नहीं की होगी। हो सकता है कि इस महती प्रक्रिया से विश्वनाथ प्रताप और उनकी पार्टी अगला चुनाव हार जाए, लेकिन यदि वे सचमुच समता मूलक समाज के निर्धारण के लिए प्रतिबद्ध हैं तो देश इस बलिदान के लिए उनका कृतज्ञ रहेगा और उनके खुद के दामन पर जो टुच्ची राजनीति के छींटे डाल दिए गए हैं, उनसे भी वे मुक्त हो पाएंगे। विश्वनाथ प्रताप यदि पिछड़े एवं दलित वर्गों के शोषण के कुचक्र को तोड़ कर वास्तविक सामाजिक-आर्थिक बराबरी की दिशा में बढ़ने के प्रयास के रूप में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की बात कर रहे हैं तो मंडल आयोग के प्रश्न पर पीछे नहीं हटें, और इस मोहलत का उपयोग सरकार की इस प्रतिबद्धता को और दृढ़ करने के एक अवसर के रूप में करें।
कानूनी लड़ाई मूलतः तीन मुद्दों पर लड़ी जाएगी। एक, संविधान सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने की गारंटी देता है, पिछड़ी जातियों को नहीं। दो, जातियों की गणना और उनकी पहचान का आधार चूंकि 60 साल पुराना है, इसलिए अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक है। तीसरी, सरकारी नौकरियों में आरक्षण की उच्चतम सीमा क्या हो- क्या 50 प्रतिशत नौकरियों को आरक्षित कर देना उचित होगा? ये तीनों प्रश्न कई मुकदमों में कई उच्च न्यायालयों द्वारा विवेचित हो चुके हैं और इनके आधार पर दिए गए निर्णयों के बावजूद देश के अनेक राज्यों में आरक्षण-व्यवस्था सफलतापूर्वक बिना सड़कों पर खून बहाए, सुचारू रूप से चल रही है। यदि विश्वनाथ प्रताप की सरकार सिर्फ राजनीतिक उद्देश्य से मंडल आयोग का दुरुपयोग नहीं कर रही है तो उसके लिए सचमुच यह एक ऐसा अवसर है, कि सामाजिक न्याय के आवश्यक अस्त्र के रूप में आरक्षण व्यवस्था को वह वैधानिक, नैतिक और अंततः व्यावहारिक स्वरूप दिलवा सकती है। वह मंडल आयोग के रूप में भी हो सकता है और मुंगेरी लाल आयोग के रूप में भी या दक्षिण में लागू अन्य किसी भी आरक्षण व्यवस्था के रूप में इसे लागू कर सकते हैं। शर्त सिर्फ यही है कि सरकार सदाशयी हो और ईमानदारी से न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करे। साथ ही, आंदोलनकारी युवा छात्रों को यह विश्वास दिलाने में भी सफल हो सके कि वह सिर्फ सामाजिक न्याय दिलाने के लिए ही प्रतिबद्ध नहीं है, बल्कि वह इस दिशा मं भी सार्थक कदम उठाने जा रही है, जिससे देश के युवाओं में व्याप्त हताशा और कुंठा की ऊर्जा का राष्ट्र निर्माण में सदुपयोग किया जा सके, न कि आत्मदाह या आत्महत्या जैसे पलायनवादी कर्म में। सरकार की विश्वसनीयता फिलहाल शून्य के बराबर है, इसलिए शब्द चाहे वे कितने ही पवित्र क्यों न हों अभी खोखले ही लगेंगे, इसलिए सरकार इस मोहलत को चाहे तो कर्म के रूप में सार्थक उपयोग कर सकती है। सार्थक संवाद तभी बन सकेगा।
9 अक्टूबर 1990, नव भारत टाइम्स
बुधवार, 5 अक्टूबर 2011
बदलाव से नावाकिफ कांग्रेस-भाजपा
मंडल आयोग की रिपोर्ट करीब करीब सभी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के गले की फांस बन गई है। पार्टिया न तो इसे अंतर से स्वीकार कर पा रही हैं, न ही दिल खोल कर इसका विरोध कर पा रही हैं। सब से विकट स्थिति भाजपा और कांग्रेस की है क्योंकि इन पार्टियों का नेतृत्व तो अब भी पारंपरिक श्रेष्ठी वर्ग के हाथों में है, जबकि इनके जनाधार का वर्ग चरित्र धीरे-धीरे खिसक कर नीचे चला गया है। यही कारण है कि इन पार्टियों का नेतृत्व निजी बातचीत में इस मुद्दे पर जो रुख अखितयार करता है, सार्वजनिक जीवन और व्यवहार में उसी आधार पर टिक नहीं पा रहा है क्योंकि जनाधार का दबाव नेतृत्व को कहीं न कहीं मजबूर कर रहा है कि वह कोई आरक्षण विरोधी रवैया अख्तियार न कर सके। जिसका परिणाम यह हो रहा है कि राजीव गांधी पहले तो कोशिश करते हैं कि वे कुछ बोलें ही नहीं, फिर जब बोलते हैं तो जो राजीव फार्मूला बड़े धूमधाम से जनता के सामने पेश किया जाता है दूसरे दिन खुद उससे दूर खड़े दिखते हैं। फिर (मणि शंकर अय्यर आदि सहयोगियों के अथक प्रयास से) वे लोकसभा में तीन घंटे का एक भाषण देते हैं जिसका लब्बोलुआब यह निकलता है कि आरक्षण का आधार केवल आर्थिक ही हो सकता है लेकिन जब उन्हें याद दिलाया जाता है कि आंध्र और कर्नाटक जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में जाति पर आधारित आरक्षण सफलतापूर्वक चल रहा है तो घबरा कर दूसरे दिन फिर वे अपनी बात बदल देते हैं। कुल मिला कर राजीव गांधी और उनके दल के वरिष्ठ नेताओं के वक्तव्यों और भाषणों के आधार पर कोई भी यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि आरक्षण के मामले में कांग्रेस आखिर कहां खड़ी है।
कारण यह है कि भारतीय राजनीति का सामाजिक चेहरा किस जाति से बदला है, मुख्य राजनीतिक दलों के नेताओं को संभवतः इसका अंदाजा ही नहीं है। सन 1984 की लोकसभा के कुल 543 में 210 यानी 40 प्रतिशत सदस्य ब्राहमण थे, जबकि 1989 की लोकसभा के कुल 525 में सिर्फ 76 यानी 15 प्रतिशत सदस्य ब्राह्मण हैं। लोकसभा में ब्राहमणों का प्रतिशत इतना कम इससे पहले कभी नहीं रहा है। 1977 में जब कांग्रेस हारी थी तब भी 25 प्रतिशत ब्राह्मण चुन कर आए थे और 1957 में तो लोकसभा के कुल सांसदों का 47 प्रतिशत स्थान ब्राह्मणें के कब्जे में था। इसमें पहले की आठों लोकसभाओं में ब्राह्मण सदस्यों का प्रतिशत हमेशा ही 40 के आसपास रहा है जो नौंवी लोकसभा में घट कर 15 पर आ गया है जबकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ब्राह्मणें को टिकट देने में कोई कोताही नहीं की। भाजपा के कुल 226 में से 113 प्रत्याशी ब्राह्मण जाति के थे, जिनमे से 24 जीत कर भी आए और इतने ही कांग्रेस से भी जीत कर आए जबकि इन दलों के नेताओं को शायद इसका अहसास भी नहीं हुआ और कांग्रेस तथा भाजपा के क्रमशः 82 तथा 37 सदस्य इस बार पिछड़ी जातियों से चुन कर आ गए और पहली बार इन पार्टियों के संसदीय दल का एक नया चेहरा सामने आया। इन पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व शायद इस तथ्य को अभी ठीक से आत्मसात नहीं कर पाया है इसीलिए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के सवाल पर वे पार्टियां कोई ठोस मन नहीं बना पा रही हैं क्योंकि मन जो कहता है पार्टी की आंतरिक शक्ति तत्काल उस पर हावी हो कर उसे बदलवाने के लिए बाध्य कर देती है। मंडल आयोग के तत्काल बाद इन पार्टियों के कुछ नेताओं ने चेतावनी दी कि इस निर्णय से भीषण जातीय तनाव बढ़ेगा, जो अंततः गृह युद्ध में परिणत हो सकता हैं मजे की बात है कि जातीय तनाव तो बढ़ा परंतु गृह युद्ध गुप्त रूप से इन पार्टियों के अंदर लड़े जा रहे हैं, समाज में नहीं।
कांग्रेस की तो और भी दुर्दशा है, क्योंकि इस पार्टी के नेतृत्व में सामाजिक परिवर्तन के कई बड़े महत्वपूर्ण संघर्ष दक्षिण और पश्चिम भारत में शांतिपूर्वक छेड़े गए, जिन्होंने न केवल उन राज्यों में एक सामाजिक क्रांति की, बल्कि उन राज्यों का राजनीतिक स्वरूप भी पूरी तरह से बदल दिया और आज यही पार्टी उत्तर भारत के कुछ नेताओं के बहकावे में आकर आरक्षण और राजनीति में पिछड़ी जातियों के उभार के प्रश्न पर ऐसा प्रतिगामी सोच सामने ला रही है जिससे उत्तर भारत में इस पार्टी का आधार तो संकुचित होगा ही, दक्षिण भारत में भी इसकी जीम जमाई जड़ भी हिल सकती है। जाति आधारित आरक्षण और उससे उपजी राजनीति के बल पर ही कर्नाटक में कांग्रेस ने पिछड़ी दलित और अल्पसंख्यक जातियों तथा वर्गों का एक ऐसा मोर्चा बनाया था कि देवराज अर्स को लिंगायतों तथा वोक्कालिगाओं जैसी शक्तिशाली जातियों को राज्य की राजनीति में दरकिनार कर देने में सफलता मिली। पिछले 25 सालों से कांग्रेस तमिलनाडु में किसी द्रविड़ पार्टी से जुड़ी रही है जो पिछड़ी दलित जातियों की उग्र राजनीतिक आकांक्षाओं की देश में सबसे बड़ी अभिव्यक्ति कही जा सकती है। आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस को इस जाति आधारित रणनीति के कारण ही सत्ता वापस मिली है, इस तथ्य को कांग्रेस नेतृत्व झुठला नहीं सकता। आंध्र की राजनीति में एन टी रामाराव के उदय से पहले राज्य राजनीति की बागडोर रेड्डी जाति के हाथों में थी और यह जाति पूरे तौर पर कांग्रेस के साथ थी। इस वर्चस्व को एन टी आर ने कम्मा और कापू जाति के नेतृत्व में बने नए राजनीतिक समीकरण से तोड़ा और तब तक शक्तिशाली बने रहे जब तक कांग्रेस को कापुओं के रूप में एक नई शक्तिशाली पिछड़ी जाति समूह का समर्थन नहीं प्राप्त हो गया। रेड्डी-कापू सहयोग के कारण ही आज चन्ना रेड्डी की कांगेस सरकार हैदराबाद में स्थापित दीख रही है। दक्षिण भारत तथा महाराष्ट्र और गुजरात में पिछड़ी जातियों के वोट बैंक के आधार पर बने राजनीतिक समीकरणों से अपनी गोटी लाल करने वाली कांग्रेस पार्टी को ब्राह्ण वर्चस्व वाला स्वरूप हमेशा से उत्तर भारत देता रहा है। इस बार उत्तर भारत में कांग्रेस धराशायी है लेकिन नेतृत्व बरकरार है जबकि लोकसभा में इस पार्टी के कुल सांसदों का 40 प्रतिशत पिछड़ी जातियों से चुन कर आ गया है। आरक्षण के प्रश्न पर पार्टी के इस विरोधाभासी कदम का मुख्य कारण यही है कि पार्टी नेतृत्व जब जगन्नाथ मिश्र की ओर देखता है तो आरक्षण के सवाल पर उत्तर भारत में लाभ उठाने का लोभ संवरण नहीं कर पाता और तभी जब शिवशंकर का चेहरा सामने आता है तो अपनी पार्टी की जमीनी वास्तविकात का स्वरूप सामने उभर आता है और राजीव गांधी यह कहने के लिए विवश हो जाते हैं कि उनकी पार्टी सामाजिक-शैक्षिक रूप से पिछड़ों को आरक्षण देने के विरुद्ध नहीं है। लेकिन आर्थिक आधार पर भी विचार किया जाए और अगले दिन फिर अपने विचार बदल देते हैं। राजीव गांधी और लालकृष्ण आडवाणी जब तक अपनी राजनीतिक विवशताओं को अनदेखी करने का स्वांग करते रहेंगे उनके विरोधाभास इसी तरह सामने आते रहेंगे।
11 सितंबर 1990, नव भारत टाइम्स
कारण यह है कि भारतीय राजनीति का सामाजिक चेहरा किस जाति से बदला है, मुख्य राजनीतिक दलों के नेताओं को संभवतः इसका अंदाजा ही नहीं है। सन 1984 की लोकसभा के कुल 543 में 210 यानी 40 प्रतिशत सदस्य ब्राहमण थे, जबकि 1989 की लोकसभा के कुल 525 में सिर्फ 76 यानी 15 प्रतिशत सदस्य ब्राह्मण हैं। लोकसभा में ब्राहमणों का प्रतिशत इतना कम इससे पहले कभी नहीं रहा है। 1977 में जब कांग्रेस हारी थी तब भी 25 प्रतिशत ब्राह्मण चुन कर आए थे और 1957 में तो लोकसभा के कुल सांसदों का 47 प्रतिशत स्थान ब्राह्मणें के कब्जे में था। इसमें पहले की आठों लोकसभाओं में ब्राह्मण सदस्यों का प्रतिशत हमेशा ही 40 के आसपास रहा है जो नौंवी लोकसभा में घट कर 15 पर आ गया है जबकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ब्राह्मणें को टिकट देने में कोई कोताही नहीं की। भाजपा के कुल 226 में से 113 प्रत्याशी ब्राह्मण जाति के थे, जिनमे से 24 जीत कर भी आए और इतने ही कांग्रेस से भी जीत कर आए जबकि इन दलों के नेताओं को शायद इसका अहसास भी नहीं हुआ और कांग्रेस तथा भाजपा के क्रमशः 82 तथा 37 सदस्य इस बार पिछड़ी जातियों से चुन कर आ गए और पहली बार इन पार्टियों के संसदीय दल का एक नया चेहरा सामने आया। इन पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व शायद इस तथ्य को अभी ठीक से आत्मसात नहीं कर पाया है इसीलिए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के सवाल पर वे पार्टियां कोई ठोस मन नहीं बना पा रही हैं क्योंकि मन जो कहता है पार्टी की आंतरिक शक्ति तत्काल उस पर हावी हो कर उसे बदलवाने के लिए बाध्य कर देती है। मंडल आयोग के तत्काल बाद इन पार्टियों के कुछ नेताओं ने चेतावनी दी कि इस निर्णय से भीषण जातीय तनाव बढ़ेगा, जो अंततः गृह युद्ध में परिणत हो सकता हैं मजे की बात है कि जातीय तनाव तो बढ़ा परंतु गृह युद्ध गुप्त रूप से इन पार्टियों के अंदर लड़े जा रहे हैं, समाज में नहीं।
कांग्रेस की तो और भी दुर्दशा है, क्योंकि इस पार्टी के नेतृत्व में सामाजिक परिवर्तन के कई बड़े महत्वपूर्ण संघर्ष दक्षिण और पश्चिम भारत में शांतिपूर्वक छेड़े गए, जिन्होंने न केवल उन राज्यों में एक सामाजिक क्रांति की, बल्कि उन राज्यों का राजनीतिक स्वरूप भी पूरी तरह से बदल दिया और आज यही पार्टी उत्तर भारत के कुछ नेताओं के बहकावे में आकर आरक्षण और राजनीति में पिछड़ी जातियों के उभार के प्रश्न पर ऐसा प्रतिगामी सोच सामने ला रही है जिससे उत्तर भारत में इस पार्टी का आधार तो संकुचित होगा ही, दक्षिण भारत में भी इसकी जीम जमाई जड़ भी हिल सकती है। जाति आधारित आरक्षण और उससे उपजी राजनीति के बल पर ही कर्नाटक में कांग्रेस ने पिछड़ी दलित और अल्पसंख्यक जातियों तथा वर्गों का एक ऐसा मोर्चा बनाया था कि देवराज अर्स को लिंगायतों तथा वोक्कालिगाओं जैसी शक्तिशाली जातियों को राज्य की राजनीति में दरकिनार कर देने में सफलता मिली। पिछले 25 सालों से कांग्रेस तमिलनाडु में किसी द्रविड़ पार्टी से जुड़ी रही है जो पिछड़ी दलित जातियों की उग्र राजनीतिक आकांक्षाओं की देश में सबसे बड़ी अभिव्यक्ति कही जा सकती है। आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस को इस जाति आधारित रणनीति के कारण ही सत्ता वापस मिली है, इस तथ्य को कांग्रेस नेतृत्व झुठला नहीं सकता। आंध्र की राजनीति में एन टी रामाराव के उदय से पहले राज्य राजनीति की बागडोर रेड्डी जाति के हाथों में थी और यह जाति पूरे तौर पर कांग्रेस के साथ थी। इस वर्चस्व को एन टी आर ने कम्मा और कापू जाति के नेतृत्व में बने नए राजनीतिक समीकरण से तोड़ा और तब तक शक्तिशाली बने रहे जब तक कांग्रेस को कापुओं के रूप में एक नई शक्तिशाली पिछड़ी जाति समूह का समर्थन नहीं प्राप्त हो गया। रेड्डी-कापू सहयोग के कारण ही आज चन्ना रेड्डी की कांगेस सरकार हैदराबाद में स्थापित दीख रही है। दक्षिण भारत तथा महाराष्ट्र और गुजरात में पिछड़ी जातियों के वोट बैंक के आधार पर बने राजनीतिक समीकरणों से अपनी गोटी लाल करने वाली कांग्रेस पार्टी को ब्राह्ण वर्चस्व वाला स्वरूप हमेशा से उत्तर भारत देता रहा है। इस बार उत्तर भारत में कांग्रेस धराशायी है लेकिन नेतृत्व बरकरार है जबकि लोकसभा में इस पार्टी के कुल सांसदों का 40 प्रतिशत पिछड़ी जातियों से चुन कर आ गया है। आरक्षण के प्रश्न पर पार्टी के इस विरोधाभासी कदम का मुख्य कारण यही है कि पार्टी नेतृत्व जब जगन्नाथ मिश्र की ओर देखता है तो आरक्षण के सवाल पर उत्तर भारत में लाभ उठाने का लोभ संवरण नहीं कर पाता और तभी जब शिवशंकर का चेहरा सामने आता है तो अपनी पार्टी की जमीनी वास्तविकात का स्वरूप सामने उभर आता है और राजीव गांधी यह कहने के लिए विवश हो जाते हैं कि उनकी पार्टी सामाजिक-शैक्षिक रूप से पिछड़ों को आरक्षण देने के विरुद्ध नहीं है। लेकिन आर्थिक आधार पर भी विचार किया जाए और अगले दिन फिर अपने विचार बदल देते हैं। राजीव गांधी और लालकृष्ण आडवाणी जब तक अपनी राजनीतिक विवशताओं को अनदेखी करने का स्वांग करते रहेंगे उनके विरोधाभास इसी तरह सामने आते रहेंगे।
11 सितंबर 1990, नव भारत टाइम्स
मुद्दा नौकरी नहीं, सम्मान है
मंडल आयोग की सिफारिशों को मानकर सरकार ने केंद्रीय सरकार तथा सार्वजनिक उपक्रमों की नौकरियों में पिछड़ी जातियों को जो 27 प्रतिशत का आरक्षण दिया है, इससे उत्तर भारत का जनमानस आज बेहद उद्वेलित है। खासतौर से हिंदी क्षेत्र के उच्चवर्गीय-मध्यवर्गीय शहरी युवा का मन, जो अपने पूर्ववर्तियों की अपेक्षा आज कहीं ज्यादा अनम्य और असहिष्णु लग रहा है। वातावरण इतना विषाक्त गया है कि आरक्षण जैसे हिंदू समाज के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे पर भी बिना घोर विषयपरक कुतर्क के कोई सार्थक वस्तुपरक बहस अब शायद संभव ही नहीं रह गई।
ऐसे अप्रिय माहौल में, आरक्षण के समर्थन में लिखने के लिए मन बना कर बैठना, एक तरह का दुस्साहस ही कहा जाएगा। इसलिए नहीं कि कहने के लिए नया कुछ नहीं है और आरक्षण-विरोधियों के तरकश में अब ऐसे अचूक और अमोघ नए बाण आ गए हैं, जिनका कोई जवाब ही नहीं है। सच तो यह है कि आरक्षण के विरोध में आज भी करीब-करीब वही सारे तर्क दोहराए जा रहे हैं, जिस तर्क के चादर की पिछले 40 सालों में बार-बार इस्तेमाल होने के कारण अब उसकी चिंदियां उड़ती दीख रही है और यही कारण है कि माहौल में हिंसा की बारूदी गंध छाई हुई है। बुद्धि, विवेक और तर्क की सीमा जहां समाप्त होती है वहीं से प्रारंभ होता है हिंसक प्रतिरोध। झिझक इस माहौल के कारण हैं, क्योंकि डर है कि ऐसे माहौल में कोई सार्थक बहस हो भी सकती है या नहीं।
संविधान निर्माताओं के मन में भी यह सवाल उठा था कि क्या यह विरोधाभास नहीं होगा कि एक तरफ संविधान समानता और सभी धर्म, वर्ग, वर्ण की बराबरी की बात करे, दूसरी ओर यह भी कहा जाए कि दलितों-आदिवासियों को आरक्षण तो दिया ही जाए, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ों को भी उसी तरह की सरकारी सहायता मिले। एक तरफ संविधान समानता का मौलिक अधिकार देता है, और दूसरी ओर उन योग्य और प्रतिभाशाली लोगों को अवसर से सिर्फ इसलिए वंचित करता है कि सौभाग्य या दुर्भाग्य से उनका जन्म ऊंची जाति की कोख से हुआ। ऊंची जाति के लोगों की शिक्षा-दीक्षा, प्रतिभा, योग्यता और क्षमता सिर्फ इसलिए नकार दी जाए कि सरकार उन सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ों को आगे लाने का प्रयत्न कर रही है जो ऐतिहासिक कारणों से पिछड़े रह गए और अब भी इसलिए पिछड़े हैं कि यह उनका आनुवांशिक पिछड़ापन है और इस तरह से बैसाखियों के सहारे किसी को खड़ा तो किया जा सकता है लेकिन उसे किसी फर्राटेदार दौड़ की प्रतियोगिता में जबर्दस्ती शामिल नहीं किया जा सकता। तर्क यह था कि वह दौड़ेगा तो नहीं ही, दौड़ की गति भी धीमी करता रहेगा यानि देश पिछड़ेपन के लिए अभिशप्त रहेगा।
जहिर है, यह तर्क तब भी काम नहीं आएगा। आरक्षण की बात संविधान में रखी गई। संविधान का अनुच्छेद 370 और निदेशक सिद्धांत इसके गवाह हैं। और गवाह है काका साहेब कालेलकर की अध्यक्षता में गठित 1953 का पिछड़ा वर्ग आयोग जो तब गठित हुआ था जब देश में तथाकथित लोकदलीय समाजवादी पिछड़ी मानसिकता की सरकार नहीं थी। सरकार समाजवादी स्वप्नदृष्टा जवाहरलाल नेहरू की थी और आयोग के अध्यक्ष थे महान गांधीवादी काका साहेब कालेलकर।
कालेलकर आयोग ने दो साल लगातार मार्च 1955 में अपनी रिपोर्ट तो दे दी पर कहीं न कहीं वे उन सवर्ण पूर्वाग्रहों के तर्कों से उबर नहीं पाए जो संविधान निर्माण के समय ही इस मुद्दे पर अड़ंगा डाल रहे थे। अपनी रिपोर्ट को राष्ट्रपति के सामने पेश करते हुए काका साहेब ने जो तीस पेजी चिट्ठी लिखी उसमें उन्होंने अपनी ही रिपोर्ट को पूरी तरह से धराशायी कर दिया। सर्वोदयी काका साहेब का हृदय पिछड़ों की दुर्वस्था से द्रवित था पर वे यह लिखना नहीं भूले कि हिंदू समाज की ऊंची जातियों ने पिछड़ों की उपेक्षा के पाप का जो अपराध किया है उसका प्रायश्चित उन्हें करना पड़ेगा। इसके लिए मैं इस हद तक अनुशंसा करने को तैयार था कि पिछड़े वर्ग को ऊपर लाने के लिए सरकार हर तरह की विशेष सहायता दे और यह विशेष सहायता ऊंची जातियों के मेधावी और गरीब लोगों के हितों की कीमत पर भी पिछड़े वर्ग को दी जाए लेकिन जब आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि इसका आधार जातीय होगा तो जैसे मेरी आंखें खुल गईं।
यह मेरे लिए एक चैंकाने वाला सदमा था जिसने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए मजबूर किया कि जो उपचार हम सुझा रहे हैं वह तो उस व्याधि से भी ज्यादा भयानक होगा जिसे हम दूर करना चाहते हैं।
यदि इन (पिछड़ी) जातियों ने शिक्षा का तिरस्कार किया है तो इसलिए कि इनके लिए इसकी कोई उपयोगिता नहीं थी। अब जब वे अपनी गलती महसूस कर रहे हैं तो यह उन्हीं की जिम्मेदारी है कि वे इस कमी को दूर करने के खुद प्रयास करें।
मैं निश्चित रूप से सरकारी नौकरियों में जाति के आधार पर आरक्षण के विरुद्ध हूं क्योंकि ये नौकरियां सिर्फ नौकरी के लिए नहीं हैं, ये नौकरियां मूलतः समाज के सेवा के लिए हैं।
मेरा विश्वास है कि पहली और दूसरी श्रेणी की सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लोग नैतिक और भौतिक दोनों रूप से लाभान्वित होंगे। यदि वे इन नौकरियों में आरक्षण के कोटे की मांग छोड़ दें और प्रशासन को अपने विवेक से काम करने का अवसर दें ताकि वे पिछड़े वर्गों की बेहतरी के लिए सही उपाय कर सकें।
1955 में काका साहेब कालेलकर जब प्रशासन और ऊंची जातियों के विवेक पर इस सवाल को छोड़ने की बात कर रहे थे तब इन नौकरियों में पिछड़ों का वास्तविक प्रतिशत क्या था। इसका सही सरकारी आंकड़ा नहीं मिल पाया। लेकिन एक मोटा अंदाजा लगाया गया था कि केंद्रीय सरकार की प्रथम श्रेणी की नौकरियों में पिछड़ों की भागीदारी 4 प्रतिशत से ज्यादा नहीं थी। 1980 आते-आते मंडल आयोग ने इस तरह के हिसाब किताब में कोई कमी नहीं रखी। इस रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार की प्रथम वर्ग की 1 लाख 74 हजार 43 नौकरियों में पिछड़ों का कुल हिस्सा केवल 4.69 प्रतिशत था। आज इसकी क्या स्थिति है? केंद्रीय कल्याण मंत्रालय के एक सूत्र का यदि विश्वास किया जाए तो इस हिस्से में अब .04 प्रतिशत की कमी आ गई है। अब पिछड़ों का हिस्सा 4.65 प्रतिशत है। यह नतीजा है प्रशासन के उस विवेक का जिसकी बात काका साहेब ने 1955 में की थी। पंडित नेहरू की तत्कालीन सरकार ने जाहिर है, कालेलकर आयोग की रिपोर्ट के साथ वैसा ही सुलूक किया जैसा काका साहेब शायद चाहते थे। उस रिपोर्ट को दाखिल दफतर करते हुए केंद्र सरकार ने फरमाया कि राज्य सरकारें यदि चाहंी तो अपने-अपने क्षेत्रों में पिछड़ेपन का आधार ढूंढने तथा उसे दूर करने के लिए जो भी कदम उठाना चाहें उठाएं। लेकिन जहां तक केंद्र सरकार का सवाल है यहां उचित यही होगा कि इस तरह के किसी भी कदम का आधार आर्थिक होगा न कि जाति आधारित।
आरक्षण विरोधी आज भी अपने वही तर्क दोहरा रहे हैं जिनके आधार पर काका सहेब का गांधीवादी मन जाति को आरक्षण का आधार मानने के सवाल पर डोल गया था या पंडित जवाहर लाल नेहरू का समाजवादी मन अपने मुख्यमंत्रियों को इस तरह का पत्र लिखने के लिए उन्हें मजबूर कर रहा था कि जाति आधारित आरक्षण से देश रसातल में चला जाएगा। नेहरू जी को अपने समाजवादी समाज की स्थापना के स्वप्न पर पूरा भरोसा था। उन्हें सचमुच शायद लगा था कि उनकी पंचवर्षीय योजनाएं जिन विराट बांधों, दूर-दूर तक फैली नहरों तथा विशाल कारखानों को जन्म देंगी उनमें जाति-पांति की पिछड़ी अवधारणाएं अपने आप डूब जाएंगी। भारतीय समाज की जटिल कुटिलताओं से दूर पंडित नेहरू का मन शायद सचमुच ऐसी अवधारणाओं को अशलील मानता होगा। उस जमाने के उस भोले गांधीवादी समाजवादियों को शायद ही इसका आभास रहा होगा कि हमारा दृढ़ समाज न केवल जड़ता की निरंतरता को बनाए रखेगा बल्कि इस धारावाहिकता को अक्षुण बनाए रखने के लिए उनके भोले तर्कों का तोड़ मरोड़ कर निरंतर दुरुपयोग भी करता रहेगा।
पिछले 40 वर्षों में हमारे समाज की स्थिति में बदलाव नहीं आया है। इसका अहसास आज 1990 में विश्वनाथ प्रताप को अचानक नहीं हुआ है। बीच के वर्षों में भी कुछ लोगों को यह अहसास कहीं न कहीं निश्चय ही सालता रहा होगा, वरना अलग-अलग 10 राज्य सरकारें अब तक इस तरह के 15 आयोग नहीं बिठाती। मंडल आयोग के बारे में आरक्षण-विरोधियों का यह कहना है कि यदि भारतीय प्रशासन ने 1977-80 का व्यवधान नहीं आता, तो मंडल आयोग जैसी अश्लील अवधारणा के बारे में कोई सोचता भी नहीं। चलिए मान लेते हैं कि यह जातिवादी लोकदली सोच का स्खलन था, पर बाकी के 15 राज्यों में ऐसे आयोग क्यों बने और इन सारे आयोगों ने जाति को ही पिछड़ेपन का आधार क्यों माना?
सिर्फ इसीलिए कि कालेलकर और नेहरू की पवित्र इच्छाओं के बावजूद, आज भी केंद्र सरकार की प्रथम श्रेणी की नौकरियों में पिछड़ों, अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों और अल्पसंख्यकों की कुल संख्या 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। जबकि कुल आबादी की सिर्फ 15 प्रतिशत सवर्ण जातियां और इन जातियों में भूमिहार, त्यागी, मोहियाल सहित ब्राह्मण, राजपूत, जाट, मराठा, कायस्थ और वैश्य सभी शामिल हैं, अब भी सरकार और प्रशासन के 85 प्रतिशत पदों पर काबिज हैं। जब भी आरक्षण की बात चलती है तो इस व्यवस्था को बरकरार रखने वाले ही योग्यता, प्रतिभा और अनुभव की बात करते हैं। तभी इन्हें याद आता है कि जाति व्यवस्था हिंदू समाज का कोढ़ है और कोई भी कल्याणकारी सरकार ऐसी व्यवस्था कैसे बना सकती है, जिससे समाज की यह बुराई न सिर्फ जारी रहे, बल्कि और भी मजबूत हो। पिछड़ा वर्ग जब भी इस विषमता की ओर उंगली उठाता है इन्हें संपूर्ण समाज और उसकी दुर्बलताओं की चिंता सालने लगती है। और यह उन कुछ लोगों की बात है, जिनके मन में कहीं न कहीं अब भी एक समतामूलक समाज के प्रति कुछ सम्मान शेष है। शायद आंख की एक शर्म है, जो उन घोर नात्सीवादी और नस्लवादी जुमलों के प्रयोग से उन्हें रोक रही है जिनका प्रयोग समाज का एक तबका अब खुल कर करने लगा है। आरक्षण के समर्थन में बात करने से झिझक इसीलिए हो रही है। फासिज्म को सबसे ज्यादा चिढ़ तर्क और न्याय से होती है। आरक्षण के विरुद्ध छेड़ा गया हिंसक आंदोलन कहीं हमें उसी ओर तो नहीं ले जा रहा है? आखिर दक्षिण अफ्रीका में भी बेशर्म गोरों का एक बड़ा तबका तो है ही, जो आज भी उस देश में अपनी सड़ी व्यवस्था लागू रखना चाहती है और वह भी तर्कों के सहारे।
उधर, समाज का एक प्रतिशील तबका है, जो खुल कर इस अन्याय का समर्थन भी नहीं कर सकता और न ही आरक्षण को मानने के लिए अपने को तैयार कर पाता है। ऐसे लोग ही आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात करते हैं। ये वे लोग हैं जो हिंदू समाज के हजारों साल के दमन और शोषण के इतिहास से आंखें मूंदे रहना तो चाहते ही हैं, इस तथ्य को भी नजरअंदाज करना चाहते हैं कि सारी धर्मनिरपेक्षता तथा समाजवादी नारों के बावजूद सामाजिक ढांचा ज्यों का त्यों क्यों है। सच तो यह है कि सदियों के व्यवस्थित शोषण से आज समाज का एक वर्ग पिछड़ेपन की जिस अवस्था में पहुंचा है उससे उबरने के लिए शायद कुछेक सौ सालों का आरक्षण भी कम पड़ेगा। इस बात को समझने के लिए थोड़े खुले मन की जरूरत पड़ेगी कि जब पिछड़े, दलित या समाज के शोषित वर्ग के लोग जोर देकर यह कहते हैं कि आरक्षण उनकी समस्याओं का एकमात्र समाधान है, तो निश्चय ही वे सिर्फ अपने या अपने समाज की आर्थिक उन्नति की बात नहीं कर रहे होते हैं। पिछड़े समाज की कुछ जातियां अपने बाहुबल से इतना कुछ तो अर्जित कर चुकी हैं कि आर्थिक समस्या अब उनके लिए बहुत बड़ी समस्या नहीं है। सरकारी पद उन्हें सामाजिक सम्मान के लिए चाहिए। यह समाज में बराबरी का अधिकार पाने की ललक है सिर्फ आर्थिक उन्नति की बात नहीं। हिंदू समाज में शोषण और दमन का यह चक्र जाति व्यवस्था को आधार बना कर ही चलाया गया था। जब तक यह चक्र एक बार उल्टा नहीं चल पड़ता, तब तक इस समाज में जाति व्यवस्था को समाप्त करने की बात करना एक छलावा ही होगा। या यों कहें कि शोषित पिछड़े वर्ग के लोगों के जायज अधिकारी को हड़पने की एक सवर्ण साजिश।
आरक्षण के मुद्दे पर सवर्ण जातियां, जो कुल जनसंख्या की सिर्फ 15 प्रतिशत हैं, यदि इस तरह सोचने लगें कि अब तक जिन 15 प्रतिशत लोगों के लिए नौकरियों में 100 प्रतिशत स्थान आरक्षित थे, उन्हें अब 50.5 प्रतिशत नौकरियों पर संतोष करना पड़ेगा, तो शायद यह उनके सोचने का स्वस्थ तरीका साबित हो, क्योंकि अब भी आबादी के 85 प्रतिशत लोगों के लिए सिर्फ 49.5 प्रतिशत स्थान ही तो आरक्षित हैं।
26 अगस्त 1990, रविवार्ता, नवभारत टाइम्स
ऐसे अप्रिय माहौल में, आरक्षण के समर्थन में लिखने के लिए मन बना कर बैठना, एक तरह का दुस्साहस ही कहा जाएगा। इसलिए नहीं कि कहने के लिए नया कुछ नहीं है और आरक्षण-विरोधियों के तरकश में अब ऐसे अचूक और अमोघ नए बाण आ गए हैं, जिनका कोई जवाब ही नहीं है। सच तो यह है कि आरक्षण के विरोध में आज भी करीब-करीब वही सारे तर्क दोहराए जा रहे हैं, जिस तर्क के चादर की पिछले 40 सालों में बार-बार इस्तेमाल होने के कारण अब उसकी चिंदियां उड़ती दीख रही है और यही कारण है कि माहौल में हिंसा की बारूदी गंध छाई हुई है। बुद्धि, विवेक और तर्क की सीमा जहां समाप्त होती है वहीं से प्रारंभ होता है हिंसक प्रतिरोध। झिझक इस माहौल के कारण हैं, क्योंकि डर है कि ऐसे माहौल में कोई सार्थक बहस हो भी सकती है या नहीं।
संविधान निर्माताओं के मन में भी यह सवाल उठा था कि क्या यह विरोधाभास नहीं होगा कि एक तरफ संविधान समानता और सभी धर्म, वर्ग, वर्ण की बराबरी की बात करे, दूसरी ओर यह भी कहा जाए कि दलितों-आदिवासियों को आरक्षण तो दिया ही जाए, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ों को भी उसी तरह की सरकारी सहायता मिले। एक तरफ संविधान समानता का मौलिक अधिकार देता है, और दूसरी ओर उन योग्य और प्रतिभाशाली लोगों को अवसर से सिर्फ इसलिए वंचित करता है कि सौभाग्य या दुर्भाग्य से उनका जन्म ऊंची जाति की कोख से हुआ। ऊंची जाति के लोगों की शिक्षा-दीक्षा, प्रतिभा, योग्यता और क्षमता सिर्फ इसलिए नकार दी जाए कि सरकार उन सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ों को आगे लाने का प्रयत्न कर रही है जो ऐतिहासिक कारणों से पिछड़े रह गए और अब भी इसलिए पिछड़े हैं कि यह उनका आनुवांशिक पिछड़ापन है और इस तरह से बैसाखियों के सहारे किसी को खड़ा तो किया जा सकता है लेकिन उसे किसी फर्राटेदार दौड़ की प्रतियोगिता में जबर्दस्ती शामिल नहीं किया जा सकता। तर्क यह था कि वह दौड़ेगा तो नहीं ही, दौड़ की गति भी धीमी करता रहेगा यानि देश पिछड़ेपन के लिए अभिशप्त रहेगा।
जहिर है, यह तर्क तब भी काम नहीं आएगा। आरक्षण की बात संविधान में रखी गई। संविधान का अनुच्छेद 370 और निदेशक सिद्धांत इसके गवाह हैं। और गवाह है काका साहेब कालेलकर की अध्यक्षता में गठित 1953 का पिछड़ा वर्ग आयोग जो तब गठित हुआ था जब देश में तथाकथित लोकदलीय समाजवादी पिछड़ी मानसिकता की सरकार नहीं थी। सरकार समाजवादी स्वप्नदृष्टा जवाहरलाल नेहरू की थी और आयोग के अध्यक्ष थे महान गांधीवादी काका साहेब कालेलकर।
कालेलकर आयोग ने दो साल लगातार मार्च 1955 में अपनी रिपोर्ट तो दे दी पर कहीं न कहीं वे उन सवर्ण पूर्वाग्रहों के तर्कों से उबर नहीं पाए जो संविधान निर्माण के समय ही इस मुद्दे पर अड़ंगा डाल रहे थे। अपनी रिपोर्ट को राष्ट्रपति के सामने पेश करते हुए काका साहेब ने जो तीस पेजी चिट्ठी लिखी उसमें उन्होंने अपनी ही रिपोर्ट को पूरी तरह से धराशायी कर दिया। सर्वोदयी काका साहेब का हृदय पिछड़ों की दुर्वस्था से द्रवित था पर वे यह लिखना नहीं भूले कि हिंदू समाज की ऊंची जातियों ने पिछड़ों की उपेक्षा के पाप का जो अपराध किया है उसका प्रायश्चित उन्हें करना पड़ेगा। इसके लिए मैं इस हद तक अनुशंसा करने को तैयार था कि पिछड़े वर्ग को ऊपर लाने के लिए सरकार हर तरह की विशेष सहायता दे और यह विशेष सहायता ऊंची जातियों के मेधावी और गरीब लोगों के हितों की कीमत पर भी पिछड़े वर्ग को दी जाए लेकिन जब आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि इसका आधार जातीय होगा तो जैसे मेरी आंखें खुल गईं।
यह मेरे लिए एक चैंकाने वाला सदमा था जिसने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए मजबूर किया कि जो उपचार हम सुझा रहे हैं वह तो उस व्याधि से भी ज्यादा भयानक होगा जिसे हम दूर करना चाहते हैं।
यदि इन (पिछड़ी) जातियों ने शिक्षा का तिरस्कार किया है तो इसलिए कि इनके लिए इसकी कोई उपयोगिता नहीं थी। अब जब वे अपनी गलती महसूस कर रहे हैं तो यह उन्हीं की जिम्मेदारी है कि वे इस कमी को दूर करने के खुद प्रयास करें।
मैं निश्चित रूप से सरकारी नौकरियों में जाति के आधार पर आरक्षण के विरुद्ध हूं क्योंकि ये नौकरियां सिर्फ नौकरी के लिए नहीं हैं, ये नौकरियां मूलतः समाज के सेवा के लिए हैं।
मेरा विश्वास है कि पहली और दूसरी श्रेणी की सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लोग नैतिक और भौतिक दोनों रूप से लाभान्वित होंगे। यदि वे इन नौकरियों में आरक्षण के कोटे की मांग छोड़ दें और प्रशासन को अपने विवेक से काम करने का अवसर दें ताकि वे पिछड़े वर्गों की बेहतरी के लिए सही उपाय कर सकें।
1955 में काका साहेब कालेलकर जब प्रशासन और ऊंची जातियों के विवेक पर इस सवाल को छोड़ने की बात कर रहे थे तब इन नौकरियों में पिछड़ों का वास्तविक प्रतिशत क्या था। इसका सही सरकारी आंकड़ा नहीं मिल पाया। लेकिन एक मोटा अंदाजा लगाया गया था कि केंद्रीय सरकार की प्रथम श्रेणी की नौकरियों में पिछड़ों की भागीदारी 4 प्रतिशत से ज्यादा नहीं थी। 1980 आते-आते मंडल आयोग ने इस तरह के हिसाब किताब में कोई कमी नहीं रखी। इस रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार की प्रथम वर्ग की 1 लाख 74 हजार 43 नौकरियों में पिछड़ों का कुल हिस्सा केवल 4.69 प्रतिशत था। आज इसकी क्या स्थिति है? केंद्रीय कल्याण मंत्रालय के एक सूत्र का यदि विश्वास किया जाए तो इस हिस्से में अब .04 प्रतिशत की कमी आ गई है। अब पिछड़ों का हिस्सा 4.65 प्रतिशत है। यह नतीजा है प्रशासन के उस विवेक का जिसकी बात काका साहेब ने 1955 में की थी। पंडित नेहरू की तत्कालीन सरकार ने जाहिर है, कालेलकर आयोग की रिपोर्ट के साथ वैसा ही सुलूक किया जैसा काका साहेब शायद चाहते थे। उस रिपोर्ट को दाखिल दफतर करते हुए केंद्र सरकार ने फरमाया कि राज्य सरकारें यदि चाहंी तो अपने-अपने क्षेत्रों में पिछड़ेपन का आधार ढूंढने तथा उसे दूर करने के लिए जो भी कदम उठाना चाहें उठाएं। लेकिन जहां तक केंद्र सरकार का सवाल है यहां उचित यही होगा कि इस तरह के किसी भी कदम का आधार आर्थिक होगा न कि जाति आधारित।
आरक्षण विरोधी आज भी अपने वही तर्क दोहरा रहे हैं जिनके आधार पर काका सहेब का गांधीवादी मन जाति को आरक्षण का आधार मानने के सवाल पर डोल गया था या पंडित जवाहर लाल नेहरू का समाजवादी मन अपने मुख्यमंत्रियों को इस तरह का पत्र लिखने के लिए उन्हें मजबूर कर रहा था कि जाति आधारित आरक्षण से देश रसातल में चला जाएगा। नेहरू जी को अपने समाजवादी समाज की स्थापना के स्वप्न पर पूरा भरोसा था। उन्हें सचमुच शायद लगा था कि उनकी पंचवर्षीय योजनाएं जिन विराट बांधों, दूर-दूर तक फैली नहरों तथा विशाल कारखानों को जन्म देंगी उनमें जाति-पांति की पिछड़ी अवधारणाएं अपने आप डूब जाएंगी। भारतीय समाज की जटिल कुटिलताओं से दूर पंडित नेहरू का मन शायद सचमुच ऐसी अवधारणाओं को अशलील मानता होगा। उस जमाने के उस भोले गांधीवादी समाजवादियों को शायद ही इसका आभास रहा होगा कि हमारा दृढ़ समाज न केवल जड़ता की निरंतरता को बनाए रखेगा बल्कि इस धारावाहिकता को अक्षुण बनाए रखने के लिए उनके भोले तर्कों का तोड़ मरोड़ कर निरंतर दुरुपयोग भी करता रहेगा।
पिछले 40 वर्षों में हमारे समाज की स्थिति में बदलाव नहीं आया है। इसका अहसास आज 1990 में विश्वनाथ प्रताप को अचानक नहीं हुआ है। बीच के वर्षों में भी कुछ लोगों को यह अहसास कहीं न कहीं निश्चय ही सालता रहा होगा, वरना अलग-अलग 10 राज्य सरकारें अब तक इस तरह के 15 आयोग नहीं बिठाती। मंडल आयोग के बारे में आरक्षण-विरोधियों का यह कहना है कि यदि भारतीय प्रशासन ने 1977-80 का व्यवधान नहीं आता, तो मंडल आयोग जैसी अश्लील अवधारणा के बारे में कोई सोचता भी नहीं। चलिए मान लेते हैं कि यह जातिवादी लोकदली सोच का स्खलन था, पर बाकी के 15 राज्यों में ऐसे आयोग क्यों बने और इन सारे आयोगों ने जाति को ही पिछड़ेपन का आधार क्यों माना?
सिर्फ इसीलिए कि कालेलकर और नेहरू की पवित्र इच्छाओं के बावजूद, आज भी केंद्र सरकार की प्रथम श्रेणी की नौकरियों में पिछड़ों, अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों और अल्पसंख्यकों की कुल संख्या 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। जबकि कुल आबादी की सिर्फ 15 प्रतिशत सवर्ण जातियां और इन जातियों में भूमिहार, त्यागी, मोहियाल सहित ब्राह्मण, राजपूत, जाट, मराठा, कायस्थ और वैश्य सभी शामिल हैं, अब भी सरकार और प्रशासन के 85 प्रतिशत पदों पर काबिज हैं। जब भी आरक्षण की बात चलती है तो इस व्यवस्था को बरकरार रखने वाले ही योग्यता, प्रतिभा और अनुभव की बात करते हैं। तभी इन्हें याद आता है कि जाति व्यवस्था हिंदू समाज का कोढ़ है और कोई भी कल्याणकारी सरकार ऐसी व्यवस्था कैसे बना सकती है, जिससे समाज की यह बुराई न सिर्फ जारी रहे, बल्कि और भी मजबूत हो। पिछड़ा वर्ग जब भी इस विषमता की ओर उंगली उठाता है इन्हें संपूर्ण समाज और उसकी दुर्बलताओं की चिंता सालने लगती है। और यह उन कुछ लोगों की बात है, जिनके मन में कहीं न कहीं अब भी एक समतामूलक समाज के प्रति कुछ सम्मान शेष है। शायद आंख की एक शर्म है, जो उन घोर नात्सीवादी और नस्लवादी जुमलों के प्रयोग से उन्हें रोक रही है जिनका प्रयोग समाज का एक तबका अब खुल कर करने लगा है। आरक्षण के समर्थन में बात करने से झिझक इसीलिए हो रही है। फासिज्म को सबसे ज्यादा चिढ़ तर्क और न्याय से होती है। आरक्षण के विरुद्ध छेड़ा गया हिंसक आंदोलन कहीं हमें उसी ओर तो नहीं ले जा रहा है? आखिर दक्षिण अफ्रीका में भी बेशर्म गोरों का एक बड़ा तबका तो है ही, जो आज भी उस देश में अपनी सड़ी व्यवस्था लागू रखना चाहती है और वह भी तर्कों के सहारे।
उधर, समाज का एक प्रतिशील तबका है, जो खुल कर इस अन्याय का समर्थन भी नहीं कर सकता और न ही आरक्षण को मानने के लिए अपने को तैयार कर पाता है। ऐसे लोग ही आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात करते हैं। ये वे लोग हैं जो हिंदू समाज के हजारों साल के दमन और शोषण के इतिहास से आंखें मूंदे रहना तो चाहते ही हैं, इस तथ्य को भी नजरअंदाज करना चाहते हैं कि सारी धर्मनिरपेक्षता तथा समाजवादी नारों के बावजूद सामाजिक ढांचा ज्यों का त्यों क्यों है। सच तो यह है कि सदियों के व्यवस्थित शोषण से आज समाज का एक वर्ग पिछड़ेपन की जिस अवस्था में पहुंचा है उससे उबरने के लिए शायद कुछेक सौ सालों का आरक्षण भी कम पड़ेगा। इस बात को समझने के लिए थोड़े खुले मन की जरूरत पड़ेगी कि जब पिछड़े, दलित या समाज के शोषित वर्ग के लोग जोर देकर यह कहते हैं कि आरक्षण उनकी समस्याओं का एकमात्र समाधान है, तो निश्चय ही वे सिर्फ अपने या अपने समाज की आर्थिक उन्नति की बात नहीं कर रहे होते हैं। पिछड़े समाज की कुछ जातियां अपने बाहुबल से इतना कुछ तो अर्जित कर चुकी हैं कि आर्थिक समस्या अब उनके लिए बहुत बड़ी समस्या नहीं है। सरकारी पद उन्हें सामाजिक सम्मान के लिए चाहिए। यह समाज में बराबरी का अधिकार पाने की ललक है सिर्फ आर्थिक उन्नति की बात नहीं। हिंदू समाज में शोषण और दमन का यह चक्र जाति व्यवस्था को आधार बना कर ही चलाया गया था। जब तक यह चक्र एक बार उल्टा नहीं चल पड़ता, तब तक इस समाज में जाति व्यवस्था को समाप्त करने की बात करना एक छलावा ही होगा। या यों कहें कि शोषित पिछड़े वर्ग के लोगों के जायज अधिकारी को हड़पने की एक सवर्ण साजिश।
आरक्षण के मुद्दे पर सवर्ण जातियां, जो कुल जनसंख्या की सिर्फ 15 प्रतिशत हैं, यदि इस तरह सोचने लगें कि अब तक जिन 15 प्रतिशत लोगों के लिए नौकरियों में 100 प्रतिशत स्थान आरक्षित थे, उन्हें अब 50.5 प्रतिशत नौकरियों पर संतोष करना पड़ेगा, तो शायद यह उनके सोचने का स्वस्थ तरीका साबित हो, क्योंकि अब भी आबादी के 85 प्रतिशत लोगों के लिए सिर्फ 49.5 प्रतिशत स्थान ही तो आरक्षित हैं।
26 अगस्त 1990, रविवार्ता, नवभारत टाइम्स
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