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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

संक्षिप्त जीवन वृत्त*

नाम- सुरेंद्र प्रताप सिंह

जन्म- 3 दिसंबर 1948 में गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) के पातेपुर गांव में

पिता का नाम- जगन्नाथ सिंह

भाई-बहन- चार बहनें, दो भाई।

शिक्षा- गारुलिया मिल हाई स्कूल, गारुलिया (जिला 24 परगना, पश्चिम बंगाल), कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर, पी एच. डी, एलएलबी

व्यवसाय- पत्रकारिता में आने से पहले सुरेंद्रनाथ महाविद्यालय, कलकत्ता के हिंदी विभाग में व्याख्याता।

पत्रकारिता में- 1972 में टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़, मुंबई में प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में चुने गए। माधुरी/धर्मयुग में प्रशिक्षु, फिर धर्मयुग में उप-संपादक

मई 1977 से रविवार में सहायक संपादक, अक्टूबर 1977 में संपादक।

जनवरी 1985 से नवभारत टाइम्स मुंबई में स्थानीय संपादक, 1986 में नवभारत टाइम्स के नई दिल्ली संस्करण में कार्यकारी संपादक।

1991 में देव फीचर्स, नई दिल्ली से जुड़े।

1994 में अंग्रेजी दैनिक टेलीग्राफ के राजनीतिक संपादक।

1995 जुलाई में इंडिया टुडे पत्रिका के भाषायी संस्करणों के कार्यकारी संपादक।

टीवी समाचार पत्रिका आजतक के कार्यकारी प्रोड्यूसर।

फिल्मों में लेखन- प्रेम कपूर की फिल्म क्षितिज (1974) की पटकथा लिखी।
1984 में समरेश बसु की कहानी पर गौतम घोष की फिल्म पार के संवाद लिखे।
मृणाल सेन की टेलीफिल्म तसवीर अपनी-अपनी (1984) और फिल्म जेनेसिस (1986) की पटकथाएं लिखी।

मृत्यु- 27 जून 1997 को नई दिल्ली में

*(सुरेंद्र प्रताप सिंह के भतीजे चंदन प्रताप सिंह की दी गई जानकारी के आधार पर)

सुरेंद्र प्रताप सिंह

“तो ये थी खबरें आजतक, इंतजार कीजिए कल तक।”

एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह के कई परिचयों में यह भी एक परिचय था। दूरदर्शन पर प्रसारित कार्यक्रम आज तक के संपादक रहते हुए एसपी सिंह सरकारी सेंसरशिप के बावजूद जितना यथार्थ बताते रहे, उतना फिर कभी किसी संपादक ने टीवी के परदे पर नहीं बताया।

एसपी आज तक के एंकर-संपादक ही नहीं थे। अपने दमखम के लिए याद की जाने वाली रविवार पत्रिका के पीछे संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह की ही दृष्टि थी। दिनमान की विचार पत्रकारिता को रविवार ने खोजी पत्रकारिता और स्पॉट रिपोर्टिंग से नया विस्तार दिया। राजनीतिक-सामाजिक हलचलों के असर का सटीक अंदाज़ा लगाना और सरल, समझ में आने वाली भाषा में साफगोई से उसका खुलासा करके सामने रख देना उनकी पत्रकारिता का स्टाइल था। एक पूरे दौर में पाखंड और आडंबर से आगे की पत्रकारिता एसपी के नेतृत्व में ही साकार हो रही थी।

शायद इसी वजह से उन्हें अभूतपूर्व लोकप्रियता मिली और कहा जा सकता है कि एसपी सिंह पत्रकारिता के पहले और आखिरी सुपरस्टार थे। यह बात दावे के साथ इसलिए कही जा सकती है क्योंकि अब का दौर महानायकों का नहीं, बौने नायकों और तथाकथित नायकों का है।

एसपी जब जब संपादक रहे, उन्होंने कम लिखा। वैसे समय में पूरी पत्रिका, पूरा समाचार पत्र, पूरा टीवी कार्यक्रम उनकी जुबान बोलता था। लेकिन उन्होंने जब लिखा तो खूब लिखा, समाज और राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए लिखा।

जन पक्षधरता एसपी सिंह के लेखन की केंद्रीय विषयवस्तु है, जिससे वे न कभी बाएं हटे, न दाएं। इस मामले में उनके लेखन में जबर्दस्त निरंतरता है। एसपी सिंह अपने लेखन से सांप्रदायिक, पोंगापंथी, जातिवादी और अभिजन शक्तियों को लगातार असहज करते रहे। बारीक राजनीतिक समझ और आगे की सोच रखने वाले इस खांटी पत्रकार का लेखन आज भी सामयिक है।

महानायक पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह की रचनाओं का यह पहला संचयन है। यह पुस्तक राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित की है। इसे ऑनलाइन खरीदने के लिए यहां देखें