जाति फिर चर्चा में है। यह बात आजकल कहीं भी सुनने को मिल जाएगी कि कैसे जाति-पांति की बुराई फिर से सिर उठाने लगी है। ईमानदारी की बात तो यह है कि जाति-पांति का जोर सचमुच कोई खास नहीं बढ़ा है। फर्क सिर्फ यह आया है कि जिन्हें हम सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा, दलित या अल्पसंख्यक कहते हैं, उनमें से कुछ लोग थोड़ी ज्यादा प्रमुखता पाने लगे हैं। कुछ पिछड़ी जातियों के लोग चुनकर आए हैं। उनमें से कुछ मंत्री और मुख्यमंत्री बन गए हैं।
ऐसे नौकरशाह जो हर बाधा-विपत्ति से टकराते हुए अब भी किसी तरह बचे रह गए, उनमें से कुछ की अच्छे पदों पर नियुक्तियां होने लगी हैं। ये थोड़े-बहुत परिवर्तन हो रहे हैं पर इनका असर न के बराबर है। हलचल सिर्फ सतह पर है। मूलभूत परिवर्तन की दूर-दूर तक संभावना नहीं दिखाई देती। जिन्हें जाति-पांति फैलाने का अपराधी माना जा रहा है वे चाहकर भी हर पद पर अपने लोगों को नहीं रख सकते। लोग वहां हैं ही नहीं। हां, आरोप खूब लग रहे हैं।
वंचित तबके के लोग उस ऐतिहासिक गलती को सुधारने का प्रयत्न भी प्रारंभ करें तो उन पर जातिवाद फैलाने का आरोप लग जाता है। अभी राज्यसभा के टिकट बंट रहे थे। आप कोई भी अखबार उठा लीजिए अगर चर्चा उत्तर प्रदेश और बिहार की हो रही है तो अक्सर टिप्पणीकार यह अवश्य लिखते थे कि लालू यादव और मुलायम सिंह यादव अपनी जाति के लोगों को तो अवश्य टिकट देंगे ही। कहीं किसी ने यह पढ़ा कि राव अपनी जाति के लोगों को अवश्य टिकट देंगे।
कांग्रेस ने राज्यसभा के अपने उम्मीदवारों की जो सूची जारी की है उसमें 50 प्रतिशत स्थान ऊंची जातियों को दिया गया जिसमें 26 प्रतिशत ब्राह्मण हैं। कल्पना कीजिए कि ऐसा ही कोई काम लालू या मुलायम कर दें तो अखबारों में आज कुहराम मचा होता, पर सवर्णों द्वारा फैलाई गई जाति-पांति को हमारे समाचार माध्यम जाति-पांति की बुराई नहीं मानते। अभी दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में एक क्रंतिकारी काम हो गया।
अनुसूचित जाति-जनजाति के कोटा से आए छात्रों ने मांग की कि पोस्ट ग्रेजुएट कक्षाओं में दाखिले के लिए आरक्षण समाप्त कर दिया जाए। मेरिट के आधार पर दाखिला हो। सवर्ण छात्रों का कहना था कि उनका अपना अलग से आरक्षण बना रहना चाहिए। कल्पना कीजिए, दलित मेरिट की बात कर रहे हैं। सवर्ण आरक्षण मांग रहे हैं। वे समाचारपत्रा जो मंडल आयोग आंदोलन के समय आरक्षण का विरोध करते हुए मेरिट और योग्यता की बात कर रहे थे क्या उनमें से किसी भी अखबार में इसके बारे में कुछ भी पढ़ने को मिला?
आज अचानक बड़े-बड़े लेख, विश्लेषण और संपादकीय इसीलिए लिखे जा रहे हैं क्योंकि दलितों, वंचितों और पिछड़ों के अदंर एक नई चेतना आ रही है। भद्र समाज में लोग कहते मिल जाएंगे कि देखिए, अपराध बढ़ते जा रहे हैं आदि। फिर अचानक बड़ी-बड़ी खबरें छपने लगती हैं कि पश्चिम उत्तर प्रदेश अपराधियों का स्वर्ग बनता जा रहा है। कोई कैमरा टीम बिहार पहुंचकर किसी नरसंहार का चित्र ले आएगी। हमेशा इसी तरह माहौल बनाया जाता है। यह अक्सर सफल भी होता है। इस बार भी यही कोशिश हो रही है। जाति-पांति की बुराई बढ़ने की खबरें आजकल इसलिए आम हैं।
15 फरवरी 1994, मतांतर, इंडिया टुडे
ये थी खबरें आजतक,इंतजार कीजिए कल तक. एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह। दूरदर्शन कार्यक्रम आज तक के संपादक एसपी सिंह जितना यथार्थ बताते रहे, उतना फिर कभी किसी संपादक ने टीवी पर नहीं बताया।रविवार पत्रिका की खोजी पत्रकारिता के पीछे उन्हीं की दृष्टि थी।राजनीतिक-सामाजिक हलचलों के असर का सटीक अंदाज़ा लगाना और सरल भाषा में उसका खुलासा कर देना उनका स्टाइल था।पाखंड से आगे की पत्रकारिता के माहिर थे एसपी।पत्रकारिता के पहले और आखिरी महानायक एसपी के लेखन का संचयन राजकमल ने छापा है। वही लेख आपको यहां मिलेंगे
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बुधवार, 19 अक्टूबर 2011
शनिवार, 8 अक्टूबर 2011
कमाल कर दिखाया केसरी ने
सीताराम केसरी निश्चय ही बधाई के हकदार हैं कि जिस काम को पिछली सरकारें करीब 40 साल से टालती आ रही थीं, उसे कर दिखाने का उन्होंने साहस किया। राजनैतिक पंडित कह रहे हैं कि यह काम आगामी चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया है। वैसे ही, जैसे यह कहा गया था कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने देवीलाल को राजनैतिक मात देने के लिए मंडलास्त्र छोड़ा था। हो सकता है, दोनों बातें अपनी जगह सही हों पर केवल इसी कारण इस विषय का महत्त्व कम नहीं हो जाता और लोकतांत्रिाक व्यवस्था में लोकप्रिय काम चुनाव के गणित को ध्यान में रखकर ही किए जाते हैं।
सच यह है कि देश जिस आर्थिक दिशा की ओर बढ़ रहा है उस व्यवस्था में सरकार के हाथों से काम देने की शक्ति दिन-ब-दिन छिनती जाएगी। यह भी सच है कि इस तरह के आरक्षण से पीढि़यों के सामाजिक अन्याय की समाप्ति नहीं हो जाएगी। पर सच यह भी है कि इन तर्कों के आधार पर आरक्षण का विरोध मूलतः वही लोग करते हैं जिन्हें सामाजिक न्याय के सिद्धांत में बिल्कुल विश्वास नहीं है। आरक्षण से संपूर्ण सामाजिक न्याय की प्राप्ति नहीं हो सकती, पर इसके बिना आप उस दिशा में बढ़ भी नहीं सकते।
सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग को आरक्षण की सुविधा देनी है और इस वर्ग की पहचान का एकमात्रा आधार जाति हो सकती है। इस वास्तविकता को सुप्रीम कोर्ट से लेकर कांग्रेस, भाजपा तथा वामपंथियों तक ने समझ लिया है। उसी तरह अब उन लोगों को भी उस वास्तविकता को समझ लेना चाहिए कि आरक्षण की सुविधा शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़ों को बराबरी तक लाने के ही लिए दी जानी चाहिए न कि एक नया विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग खड़ा करने के लिए। सामाजिक न्याय के संघर्ष और एक नए सुविधाभोगी वर्ग की यथास्थितिवादी चाहत में अन्तर तो करना ही पड़ेगा। इसलिए यह बात कम-से-कम सिद्धांत रूप में तय हो जानी चाहिए कि एक सीमा के बाद उन सारे लोगों को अपनी बैसाखियां उन लोगों के लिए छोड़नी पड़ेंगी जिन्हें इनकी जरूरत उनसे ज्यादा है। मलाईदार परत के सिद्धांत को इस रूप में देखना चाहिए।
सरकार द्वारा घोषित आरक्षित नीति के साथ जुड़ी मलाईदार परत की सूची से असहमति या आपत्ति हो सकती है पर सिद्धांत रूप में इसे मानने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इस सूची की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें राजनीतिकों के साथ पक्षपात किया गया है। पिछड़ी जाति का कोई व्यक्ति राष्ट्रपति बन जाए तो उसकी संतान को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा, परंतु पिछड़ी जाति के प्रधानमंत्री की संतान आरक्षण की सुविधा प्राप्त करती रहेगी, यह आसानी से गले उतरने वाली बात नहीं है। लेकिन सूची की अच्छी बात यह है कि मलाई हटाने का काम लगातार चलता रहेगा।
मलाईदार परत हटाने का काम सिर्फ नौकरियों के आरक्षण के मामले में ही नहीं, अन्य क्षेत्रों में भी प्रारंभ होना चाहिए, खास तौर पर उद्योग और वाणिज्य के क्षेत्रा में भी इसको तत्काल लागू किया जाना चाहिए।
मलाईदार परत हटाने का काम नौकरियों में आरक्षण नीति लागू होने के साथ किया जा रहा है। इससे विश्वास बन सकता है कि सचमुच यह प्रयास सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है। कांग्रेस में जैसा ब्राह्मणवाद आज चल रहा है वैसा इससे पहले शायद ही कभी था। उस प्रतिकूल माहौल में भी सीताराम केसरी ने इतना बड़ा काम कर लिया है, तो उनसे उम्मीद की जा सकती है कि यादव, कुर्मी, कोइरी तथा लोध जैसी पिछड़ी जातियों में अगड़ी जातियों के मुखर विरोध के बावजूद मलाईदार परत हटाने के अपने वादे से पीछे नहीं हटेंगे।
30 सितंबर 1992, इंडिया टुडे, मतांतर
सच यह है कि देश जिस आर्थिक दिशा की ओर बढ़ रहा है उस व्यवस्था में सरकार के हाथों से काम देने की शक्ति दिन-ब-दिन छिनती जाएगी। यह भी सच है कि इस तरह के आरक्षण से पीढि़यों के सामाजिक अन्याय की समाप्ति नहीं हो जाएगी। पर सच यह भी है कि इन तर्कों के आधार पर आरक्षण का विरोध मूलतः वही लोग करते हैं जिन्हें सामाजिक न्याय के सिद्धांत में बिल्कुल विश्वास नहीं है। आरक्षण से संपूर्ण सामाजिक न्याय की प्राप्ति नहीं हो सकती, पर इसके बिना आप उस दिशा में बढ़ भी नहीं सकते।
सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग को आरक्षण की सुविधा देनी है और इस वर्ग की पहचान का एकमात्रा आधार जाति हो सकती है। इस वास्तविकता को सुप्रीम कोर्ट से लेकर कांग्रेस, भाजपा तथा वामपंथियों तक ने समझ लिया है। उसी तरह अब उन लोगों को भी उस वास्तविकता को समझ लेना चाहिए कि आरक्षण की सुविधा शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़ों को बराबरी तक लाने के ही लिए दी जानी चाहिए न कि एक नया विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग खड़ा करने के लिए। सामाजिक न्याय के संघर्ष और एक नए सुविधाभोगी वर्ग की यथास्थितिवादी चाहत में अन्तर तो करना ही पड़ेगा। इसलिए यह बात कम-से-कम सिद्धांत रूप में तय हो जानी चाहिए कि एक सीमा के बाद उन सारे लोगों को अपनी बैसाखियां उन लोगों के लिए छोड़नी पड़ेंगी जिन्हें इनकी जरूरत उनसे ज्यादा है। मलाईदार परत के सिद्धांत को इस रूप में देखना चाहिए।
सरकार द्वारा घोषित आरक्षित नीति के साथ जुड़ी मलाईदार परत की सूची से असहमति या आपत्ति हो सकती है पर सिद्धांत रूप में इसे मानने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इस सूची की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें राजनीतिकों के साथ पक्षपात किया गया है। पिछड़ी जाति का कोई व्यक्ति राष्ट्रपति बन जाए तो उसकी संतान को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा, परंतु पिछड़ी जाति के प्रधानमंत्री की संतान आरक्षण की सुविधा प्राप्त करती रहेगी, यह आसानी से गले उतरने वाली बात नहीं है। लेकिन सूची की अच्छी बात यह है कि मलाई हटाने का काम लगातार चलता रहेगा।
मलाईदार परत हटाने का काम सिर्फ नौकरियों के आरक्षण के मामले में ही नहीं, अन्य क्षेत्रों में भी प्रारंभ होना चाहिए, खास तौर पर उद्योग और वाणिज्य के क्षेत्रा में भी इसको तत्काल लागू किया जाना चाहिए।
मलाईदार परत हटाने का काम नौकरियों में आरक्षण नीति लागू होने के साथ किया जा रहा है। इससे विश्वास बन सकता है कि सचमुच यह प्रयास सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है। कांग्रेस में जैसा ब्राह्मणवाद आज चल रहा है वैसा इससे पहले शायद ही कभी था। उस प्रतिकूल माहौल में भी सीताराम केसरी ने इतना बड़ा काम कर लिया है, तो उनसे उम्मीद की जा सकती है कि यादव, कुर्मी, कोइरी तथा लोध जैसी पिछड़ी जातियों में अगड़ी जातियों के मुखर विरोध के बावजूद मलाईदार परत हटाने के अपने वादे से पीछे नहीं हटेंगे।
30 सितंबर 1992, इंडिया टुडे, मतांतर
शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011
गलत परम्परा मत डालिए
राष्ट्रपति पद के प्रार्थी का चयन करते समय राजनैतिक दल व्यक्ति के किस गुण और योग्यता
को ध्यान में रखें। अखिल भारतीय अनुसूचित जाति-जनजाति फोरम सभी राजनैतिक दलों
के सांसदों का संयुक्त मंच है। इस फोरम ने मांग की है कि राष्ट्रपति पद पर इस बार किसी
दलित या वनवासी को चुना जाए। अब तक जितने भी हिन्दू राष्ट्रपति हुए हैं, उनमें से कभी
किसी दलित, वनवासी या पिछड़ी जाति के व्यक्ति को राष्ट्रपति बनने का मौका नहीं मिला है।
सोच-समझ से सरोकार रखने वाले अधिकांश लोगों ने राष्ट्र के इस सर्वोच्च पद को
जाति से बाँधने की कोशिश को अनुचित माना है। अधिकांश राजनैतिक दलों की भी यही
मान्यता है, लेकिन कुछ व्यावहारिक कारणों से सर्वदलीय फोरम की इस मांग को राजनैतिक
दल एकबारगी नामंजूर भी नहीं कर पा रहे है। भाजपा और माकपा जैसी काडर अनुशासित
पार्टियों का मामला अलग है। कांगे्रस में भी कुल मिलाकर यही माहौल है कि राष्ट्रपति पद
के प्रार्थी की योग्यता का आधार सिर्फ जाति न हो।
यह अच्छी बात है। किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि समाज के सभी वर्गों
को समुचित और बराबरी का प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण की आवश्यकता पड़े, तो
यह मानना चाहिए कि या तो उस समाज की सभ्यता में कहीं कोई कमी है या उस लोकतांत्रिाक
व्यवस्था में कोई खोट है। हमारे यहां लगता है कि दोनों ही बातें हैं, वरना आजादी के 45
साल बाद दलित-वनवासी जातियों के सांसदों को फोरम बनाकर इस तरह की मांग नहीं करनी
पड़ती। यह चिंता का विषय है, एक अलग और व्यापक चिंता का विषय। इसे सिर्फ किसी
एक पद से जोड़ देना इस अति महत्त्वपूर्ण विषय को अनावश्यक रूप से संकीर्ण दृष्टि से
देखना होगा।
सिर्फ जाति के आधार पर किसी व्यक्ति को राष्ट्रपति पद के लिए उपयुक्त नहीं माना
जा सकता। इस तर्क के आधार पर धर्म, भाषा, वर्ग या क्षेत्रा भी राष्ट्रपति पद के प्रार्थी की
योग्यता के आधार नहीं हो सकते। भारतीय गणराज्य के पहले राष्ट्रपति की बात छोड़ दें
तो पता चलेगा कि इस पद के प्रार्थी के चयन में सिर्फ योग्यता या क्षमता का आधार उसके
बाद शायद ही कभी ईमानदारी से लागू हुआ हो। भारत के पहले प्रधानमंत्री और पहले राष्ट्रपति,
दोनों ही सवर्ण हिन्दू थे। दोनों हिंदीभाषी थे और कमोबेश एक ही वर्ग का प्रतिनिधित्व करते
थे। सिर्फ इन्हीं कारणों से उनमें से किसी एक को चुनने की बात तब नहीं उठी। शायद
इसलिए कि तब पद प्राप्त करने के लिए सिर्फ योग्य होना ही काफी होता था।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के बाद राष्ट्रपतियों के चयन का आधार सिर्फ योग्यता ही रही, इस
बात को दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। डॉ. राधाकृष्णन की योग्यता और क्षमता के
बारे में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है। वे विश्वस्तर के दार्शनिक, विद्वान तथा शिक्षाशास्त्री
थे। एक ऐसा व्यक्तित्व, जिसे निस्संदेह राष्ट्रपति पद की गरिमा के सर्वथा उपयुक्त कहा
जा सकता है। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और डॉ. राधाकृष्णन तक आते-आते राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी
चुनने में इतना अन्तर अवश्य आ गया था कि योग्यता और पात्राता के अतिरिक्त भी कुछ
और ढूंढ़ा जाने लगा। कहा गया कि प्रधानमंत्री चूंकि उत्तर का है, इसलिए राष्ट्रपति दक्षिण
का होना चाहिए। यह अतिरिक्त योग्यता की मांग की शुरुआत थी।
भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन भले ही डॉ. राधाकृष्णन जैसे अंतर्राष्ट्रीय
स्तर के विद्वान व शिक्षाशास्त्री तथा डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे विख्यात विधिवेत्ता और संविधान
सभा के सभापति वाली हैसियत के व्यक्ति न रहे हों, पर उनकी विद्वत्ता, निष्पक्षता, दलगत
राजनीति से उनका परे होना तथा मुस्लिम समाज के सांस्कृतिक- सामाजिक नेता की हैसियत
उनकी अवश्य थी।
उनके चुने जाने के पीछे एक बड़ा कारण उनका मुसलमान होना भी था। यानी क्षेत्रा
और भाषा के बाद अब एक अतिरिक्त योग्यता धर्म बन रहा था। जाहिर है, जब सर्वथा
योग्य लोगों को चुनने के बाद भी धर्म, क्षेत्र और भाषा के रूप में योग्यता की कुछ अतिरिक्त
कसौटियां काम में लाई जाती रहीं तो जाति के प्रश्न को बहुत दिनों तक कैसे दबाया जा
सकता था। अतिरिक्त योग्यता को ही प्राथमिक योग्यता मानने की प्रवृत्ति अब थोड़ी और
ज्यादा विकृत दिखाई देने लगी है।
इस विकृति का प्रारंभ इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रिात्व काल में हुआ। राष्ट्रपति के रूप
में वराहगिरि व्यंकट गिरि कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति की देन थे। उनका चयन करते समय
राष्ट्रपति पद की गरिमा को नहीं, बल्कि इस बात को ध्यान में रखा गया था कि कांग्रेस
की अंदरूनी राजनीति में राष्ट्रपति पद के इस चुनाव से श्रीमती गांधी को कितना लाभ
मिलेगा।
गिरि के बाद ऐसी परम्परा चली कि राष्ट्रपति पद की सारी वांछित योग्यताएं एक ओर
धरी रह गईं और सबसे महत्त्वपूर्ण योग्यता यह बनी कि राष्ट्रपति का कद किसी भी हालत
में प्रधानमंत्री के कद से ऊंचा न हो। वे प्रधानमंत्री की सही-गलत हर बात को स्वीकार
कर लें। भारत के पांचवें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इमर्जेंसी के आदेश पर बिना
चूं-चपड़ किए दस्तखत करके इसे सिद्ध भी कर दिया कि राष्ट्रपति का कद अब उतना ही
होगा, जितना प्रधानमंत्री चाहेंगे।
योग्यता, क्षमता तथा पात्राता के आधार पर भारत के सातवें और आठवें राष्ट्रपति की
बात जितनी कम करें, उतना ही बेहतर होगा। यह राष्ट्रपति पद की पतनगाथा की पराकाष्ठा
थी। यहां तक आते-आते प्रार्थी की अतिरिक्त योग्यता ही मुख्य योग्यता बन चुकी थी। पंजाब
समस्या को जटिल बनाने वाले जैल सिंह और पनडुब्बी-तोपकांड की लीपापोती के लिए प्रसिद्ध
वेंकटरामन आखिर किन योग्यताओं के आधार पर राष्ट्रपति चुने गए।
ऐसी स्थिति में यदि एक वर्ग यह मांग करता है कि वह समाज का बहुसंख्य वर्ग है
और उसे आज तक इस पद से वंचित रखा गया है, अतः उसे सिर्फ इसी आधार पर यह
पद मिलना चाहिए, तो वह कोई बहुत गैरवाजिब बात नहीं कर रहा होता है। योग्यताओं
की कसौटी तो तहस-नहस हो चुकी है। ज्यादा से ज्यादा हम यह कह सकते हैं कि इस तरह की मांग पतनगाथा की धारावाहिकता को और जीवन प्रदान करेगी। ऐसी स्थिति में वे पलटकर
पूछ सकते हैं कि योग्यता की मांग आखिर आज ही क्यों, इससे पहले क्यों नही?
इसलिए सिर्फ जाति के आधार को विनम्रता से अस्वीकार करते हुए भी इन जातियों
के दर्द को समझना पड़ेगा, क्योंकि यह पीड़ा वास्तविक है। इस वर्ग का विश्वास समाज को
वापस मिले, इसके लिए आवश्यक है कि इस बार ऐसा राष्ट्रपति चुना जाए जो न सिर्फ संविधान
के पालक और संरक्षक के रूप में सक्षम हो, बल्कि सक्षम दिखे भी। दलगत राजनीति से
वह ऊपर हो। राष्ट्र उसे परिवार के एक ऐसे उदार मुखिया के रूप में देखे, जिसके लिए
हर राजनैतिक मतवाद, क्षेत्रा, भाषा, जाति तथा धर्म के लोग समान हों। फिर वह किसी भी
जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्रा का क्यों न हो, सम्पूर्ण राष्ट्र उसे स्वीकार करेगा।
इस चयन में जब तक पारदर्शी ईमानदारी नहीं होगी, देश-समाज के वंचितों को यह
लगता रहेगा कि जब उन्हें कुछ देने की बारी आती है, तभी योग्यता सर्वोपरि होती है वरना
नहीं। दलितों-वंचितों की इस मांग से पूर्ण सहानुभूति रखते हुए भी उन्हें यह समझाया जाना
आवश्यक है कि उनकी मांग को ज्यों का त्यों मान लेने का अर्थ होगा, एक गलत परम्परा
को और आगे बढ़ाना। इस पर पूर्णविराम कर्म से ही लगाया जा सकता है, सिर्फ शब्दों की
चालाकी से नहीं। देखना है कि नरसिंह राव क्या इंदिरा गांधी की इस परम्परा को तोड़ पाएंगे?
15 जून 1992, मतांतर, इंडिया टुडे
को ध्यान में रखें। अखिल भारतीय अनुसूचित जाति-जनजाति फोरम सभी राजनैतिक दलों
के सांसदों का संयुक्त मंच है। इस फोरम ने मांग की है कि राष्ट्रपति पद पर इस बार किसी
दलित या वनवासी को चुना जाए। अब तक जितने भी हिन्दू राष्ट्रपति हुए हैं, उनमें से कभी
किसी दलित, वनवासी या पिछड़ी जाति के व्यक्ति को राष्ट्रपति बनने का मौका नहीं मिला है।
सोच-समझ से सरोकार रखने वाले अधिकांश लोगों ने राष्ट्र के इस सर्वोच्च पद को
जाति से बाँधने की कोशिश को अनुचित माना है। अधिकांश राजनैतिक दलों की भी यही
मान्यता है, लेकिन कुछ व्यावहारिक कारणों से सर्वदलीय फोरम की इस मांग को राजनैतिक
दल एकबारगी नामंजूर भी नहीं कर पा रहे है। भाजपा और माकपा जैसी काडर अनुशासित
पार्टियों का मामला अलग है। कांगे्रस में भी कुल मिलाकर यही माहौल है कि राष्ट्रपति पद
के प्रार्थी की योग्यता का आधार सिर्फ जाति न हो।
यह अच्छी बात है। किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि समाज के सभी वर्गों
को समुचित और बराबरी का प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण की आवश्यकता पड़े, तो
यह मानना चाहिए कि या तो उस समाज की सभ्यता में कहीं कोई कमी है या उस लोकतांत्रिाक
व्यवस्था में कोई खोट है। हमारे यहां लगता है कि दोनों ही बातें हैं, वरना आजादी के 45
साल बाद दलित-वनवासी जातियों के सांसदों को फोरम बनाकर इस तरह की मांग नहीं करनी
पड़ती। यह चिंता का विषय है, एक अलग और व्यापक चिंता का विषय। इसे सिर्फ किसी
एक पद से जोड़ देना इस अति महत्त्वपूर्ण विषय को अनावश्यक रूप से संकीर्ण दृष्टि से
देखना होगा।
सिर्फ जाति के आधार पर किसी व्यक्ति को राष्ट्रपति पद के लिए उपयुक्त नहीं माना
जा सकता। इस तर्क के आधार पर धर्म, भाषा, वर्ग या क्षेत्रा भी राष्ट्रपति पद के प्रार्थी की
योग्यता के आधार नहीं हो सकते। भारतीय गणराज्य के पहले राष्ट्रपति की बात छोड़ दें
तो पता चलेगा कि इस पद के प्रार्थी के चयन में सिर्फ योग्यता या क्षमता का आधार उसके
बाद शायद ही कभी ईमानदारी से लागू हुआ हो। भारत के पहले प्रधानमंत्री और पहले राष्ट्रपति,
दोनों ही सवर्ण हिन्दू थे। दोनों हिंदीभाषी थे और कमोबेश एक ही वर्ग का प्रतिनिधित्व करते
थे। सिर्फ इन्हीं कारणों से उनमें से किसी एक को चुनने की बात तब नहीं उठी। शायद
इसलिए कि तब पद प्राप्त करने के लिए सिर्फ योग्य होना ही काफी होता था।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के बाद राष्ट्रपतियों के चयन का आधार सिर्फ योग्यता ही रही, इस
बात को दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। डॉ. राधाकृष्णन की योग्यता और क्षमता के
बारे में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है। वे विश्वस्तर के दार्शनिक, विद्वान तथा शिक्षाशास्त्री
थे। एक ऐसा व्यक्तित्व, जिसे निस्संदेह राष्ट्रपति पद की गरिमा के सर्वथा उपयुक्त कहा
जा सकता है। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और डॉ. राधाकृष्णन तक आते-आते राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी
चुनने में इतना अन्तर अवश्य आ गया था कि योग्यता और पात्राता के अतिरिक्त भी कुछ
और ढूंढ़ा जाने लगा। कहा गया कि प्रधानमंत्री चूंकि उत्तर का है, इसलिए राष्ट्रपति दक्षिण
का होना चाहिए। यह अतिरिक्त योग्यता की मांग की शुरुआत थी।
भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन भले ही डॉ. राधाकृष्णन जैसे अंतर्राष्ट्रीय
स्तर के विद्वान व शिक्षाशास्त्री तथा डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे विख्यात विधिवेत्ता और संविधान
सभा के सभापति वाली हैसियत के व्यक्ति न रहे हों, पर उनकी विद्वत्ता, निष्पक्षता, दलगत
राजनीति से उनका परे होना तथा मुस्लिम समाज के सांस्कृतिक- सामाजिक नेता की हैसियत
उनकी अवश्य थी।
उनके चुने जाने के पीछे एक बड़ा कारण उनका मुसलमान होना भी था। यानी क्षेत्रा
और भाषा के बाद अब एक अतिरिक्त योग्यता धर्म बन रहा था। जाहिर है, जब सर्वथा
योग्य लोगों को चुनने के बाद भी धर्म, क्षेत्र और भाषा के रूप में योग्यता की कुछ अतिरिक्त
कसौटियां काम में लाई जाती रहीं तो जाति के प्रश्न को बहुत दिनों तक कैसे दबाया जा
सकता था। अतिरिक्त योग्यता को ही प्राथमिक योग्यता मानने की प्रवृत्ति अब थोड़ी और
ज्यादा विकृत दिखाई देने लगी है।
इस विकृति का प्रारंभ इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रिात्व काल में हुआ। राष्ट्रपति के रूप
में वराहगिरि व्यंकट गिरि कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति की देन थे। उनका चयन करते समय
राष्ट्रपति पद की गरिमा को नहीं, बल्कि इस बात को ध्यान में रखा गया था कि कांग्रेस
की अंदरूनी राजनीति में राष्ट्रपति पद के इस चुनाव से श्रीमती गांधी को कितना लाभ
मिलेगा।
गिरि के बाद ऐसी परम्परा चली कि राष्ट्रपति पद की सारी वांछित योग्यताएं एक ओर
धरी रह गईं और सबसे महत्त्वपूर्ण योग्यता यह बनी कि राष्ट्रपति का कद किसी भी हालत
में प्रधानमंत्री के कद से ऊंचा न हो। वे प्रधानमंत्री की सही-गलत हर बात को स्वीकार
कर लें। भारत के पांचवें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इमर्जेंसी के आदेश पर बिना
चूं-चपड़ किए दस्तखत करके इसे सिद्ध भी कर दिया कि राष्ट्रपति का कद अब उतना ही
होगा, जितना प्रधानमंत्री चाहेंगे।
योग्यता, क्षमता तथा पात्राता के आधार पर भारत के सातवें और आठवें राष्ट्रपति की
बात जितनी कम करें, उतना ही बेहतर होगा। यह राष्ट्रपति पद की पतनगाथा की पराकाष्ठा
थी। यहां तक आते-आते प्रार्थी की अतिरिक्त योग्यता ही मुख्य योग्यता बन चुकी थी। पंजाब
समस्या को जटिल बनाने वाले जैल सिंह और पनडुब्बी-तोपकांड की लीपापोती के लिए प्रसिद्ध
वेंकटरामन आखिर किन योग्यताओं के आधार पर राष्ट्रपति चुने गए।
ऐसी स्थिति में यदि एक वर्ग यह मांग करता है कि वह समाज का बहुसंख्य वर्ग है
और उसे आज तक इस पद से वंचित रखा गया है, अतः उसे सिर्फ इसी आधार पर यह
पद मिलना चाहिए, तो वह कोई बहुत गैरवाजिब बात नहीं कर रहा होता है। योग्यताओं
की कसौटी तो तहस-नहस हो चुकी है। ज्यादा से ज्यादा हम यह कह सकते हैं कि इस तरह की मांग पतनगाथा की धारावाहिकता को और जीवन प्रदान करेगी। ऐसी स्थिति में वे पलटकर
पूछ सकते हैं कि योग्यता की मांग आखिर आज ही क्यों, इससे पहले क्यों नही?
इसलिए सिर्फ जाति के आधार को विनम्रता से अस्वीकार करते हुए भी इन जातियों
के दर्द को समझना पड़ेगा, क्योंकि यह पीड़ा वास्तविक है। इस वर्ग का विश्वास समाज को
वापस मिले, इसके लिए आवश्यक है कि इस बार ऐसा राष्ट्रपति चुना जाए जो न सिर्फ संविधान
के पालक और संरक्षक के रूप में सक्षम हो, बल्कि सक्षम दिखे भी। दलगत राजनीति से
वह ऊपर हो। राष्ट्र उसे परिवार के एक ऐसे उदार मुखिया के रूप में देखे, जिसके लिए
हर राजनैतिक मतवाद, क्षेत्रा, भाषा, जाति तथा धर्म के लोग समान हों। फिर वह किसी भी
जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्रा का क्यों न हो, सम्पूर्ण राष्ट्र उसे स्वीकार करेगा।
इस चयन में जब तक पारदर्शी ईमानदारी नहीं होगी, देश-समाज के वंचितों को यह
लगता रहेगा कि जब उन्हें कुछ देने की बारी आती है, तभी योग्यता सर्वोपरि होती है वरना
नहीं। दलितों-वंचितों की इस मांग से पूर्ण सहानुभूति रखते हुए भी उन्हें यह समझाया जाना
आवश्यक है कि उनकी मांग को ज्यों का त्यों मान लेने का अर्थ होगा, एक गलत परम्परा
को और आगे बढ़ाना। इस पर पूर्णविराम कर्म से ही लगाया जा सकता है, सिर्फ शब्दों की
चालाकी से नहीं। देखना है कि नरसिंह राव क्या इंदिरा गांधी की इस परम्परा को तोड़ पाएंगे?
15 जून 1992, मतांतर, इंडिया टुडे
दलितों-वंचितों की राजनीतिः चेतावनी की घंटी
कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव में किसी भी दलित, महिला या आदिवासी के न चुने जाने से
उत्पन्न संकट ने इस वास्तविकता को गहरे रेखांकित किया है कि कांग्रेस की राजनीति का
सामाजिक आधार क्रान्तिकारी रूप से परिवर्तित हो चुका है, जबकि कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व
इस तथ्य से अनभिज्ञ बना रहना चाहता है। कांग्रेस अध्यक्ष की विशेष चिंता स्वाभाविक
है। दक्षिण भारतीय होने के नाते नरसिंह राव इस ऐतिहासिक प्रक्रिया के साक्षी रहे हैं, इसलिए
वे इसे समझ भी पा रहे हैं, जबकि कांग्रेस का उत्तर भारतीय नेतृत्व अब भी अपनी पारम्परिक
राजनीति-शैली से चिपके रहना चाहता है।
यह संकट सिर्फ कांग्रेस का निजी राजनैतिक संकट नहीं है, यह संकट भारतीय राजनीति
में आ रहे आन्तरिक उफान का प्रतीक भी है। शायद ही कोई राजनैतिक दल इससे अछूता
बचा है। एक लोकतान्त्रिाक व्यवस्था में बहुसंख्य वर्ग को समुचित और व्यापक राजनैतिक
प्रतिनिधित्व कैसे मिले, यह प्रश्न अधिकांश राजनैतिक दलों के पिछड़े, दलित, आदिवासी
कार्यकर्ताओं को मथ रहा है। विभिन्न दलों में इस दर्द की अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न रूप से
हो रही है। इस प्रक्रिया को यदि इस संदर्भ में देखा जाए तो भारतीय राजनीति के वर्तमान
संकट को शायद सही परिपे्रक्ष्य में देख पाना संभव हो।
भाजपा जैसा अनुशासित दल बिहार में टूट गया। ध्यान देने की बात है कि दल से
टूटकर अलग हुए अधिकांश कार्यकर्ता पिछड़े वर्ग के थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जैसे घोर वामपंथी
विचारधारा वाले दल में टूट हुई। वहां भी टूटने वाले लोग पिछड़े वर्ग के ही थे। महाराष्ट्र
में शिवसेना जैसे अधिनायकवादी दल में भी टूट कुछ इसी प्रकार हुई। छगन भुजबल के नेतृत्व
में पिछड़े वर्ग के कार्यकर्ताओं का एक समूह शिवसेना से अलग हो गया और कांग्रेस में शामिल
हो गया।
जनता दल के विखंडन का पैटर्न थोड़ा अलग है। यहां हर विघटन के बाद अवर्णों का
वर्चस्थ थोड़ा और बढ़ रहा है। नेतृत्व हालांकि अब भी सवर्ण-बहुल है लेकिन अब वह शायद
प्रतीकात्मक ज्यादा रह गया है, वास्तविक कम। सभी राजनैतिक दलों के दलित-आदिवासी
सांसदों की इस मांग को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए कि कोई दलित ही इस बार भारत
का राष्ट्रपति बने। संस्कृति से जोड़ने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी में भी कल्याण
सिंह और उमा भारती जैसे नेताओं को ही क्यों लांछित होना पड़ता है? इस सचाई को भी
इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। मामला यहां भी व्यापक राजनैतिक प्रतिनिधित्व तथा अवर्णों
की प्रगति से उत्पन्न सवर्ण रोष का ही है लेकिन भाजपा चूंकि अभी तक इस कसौटी पर
कसे जाने की आदी नहीं है, इसलिए इस विषय को भविष्य के लिए सुरक्षित रखकर फिलहाल
कांगे्रस के वर्तमान संकट को समझने की चेष्टा से ही ढेर सारे अनसुलझे प्रश्नों का एक संबद्ध
उत्तर मिल सकता है।
यह सच है कि कांग्रेस अध्यक्ष की इस चिंता के पीछे मूल कारण राजनैतिक है, जो
सीधे कांग्रेस की शिखर राजनीति से जुड़ा हुआ है, वरना क्या कारण है कि राव ने चुनाव
हो जाने के बाद ही अपनी चिंता को अभिव्यक्ति देना उचित समझा। यह तो ब्लॉक स्तर
के प्रारम्भिक चुनाव से ही स्पष्ट होने लगा था कि कांग्रेसी नेतृत्व समाज के कमजोर वर्ग
के स्वार्थ की उपेक्षा कर रहा है। विभिन्न प्रदेश कांग्रेस कमेटियों तथा अखिल भारतीय कांग्रेस
कमेटी के सदस्यों की सूची देख डालिए। इसी से स्पष्ट हो जाता है कि कम-से-कम हिंदी
भारत का कांग्रेस नेतृत्व इस बात की कतई चिंता नहीं कर रहा था कि समाज के विभिन्न
वर्गों के लोगों को कैसे हर स्तर पर समुचित प्रतिनिधित्व मिले। उत्तर प्रदेश में दलित और
आदिवासी सम्पूर्ण आबादी के करीब 24 प्रतिशत हैं और पिछड़े 60 प्रतिशत के करीब, लेकिन
उत्तर प्रदेश की सूची पर गौर करें तो पता चलेगा कि इस वर्ग का प्रतिनिधित्व इसमें दस
प्रतिशत भी नहीं है।
यही हालत बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा सहित सम्पूर्ण हिंदी भारत की है।
यह अचानक नहीं हुआ। कांग्रेस अध्यक्ष निश्चित ही इस तथ्य से भी अनभिज्ञ नहीं होंगे।
इसलिए उचित तो यह होता कि चुनाव प्रक्रिया से अपने आपको निरपेक्ष रखते हुए भी राव
कम-से-कम इस तथ्य की ओर चुनाव से पहले ही लोगों का ध्यान आकृष्ट करते कि कांग्रेस
की मतदाता सूची विकृत है और इसमें समाज के सभी वर्गों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं
हुआ है। जिस क्षत्राप को जहां मौका मिला है, वहीं उसने अपनी स्थिति मजबूत करने की
कोशिश की है। इस बात से बिल्कुल बेखबर कि उसका यह कर्म कांग्रेस के वास्तविक सामाजिक
आधार के हितों के सर्वथा विपरीत जा रहा है। समाज के वंचित वर्ग को समुचित प्रतिनिधित्व
देने के लिए राव यदि चुनाव से ऐन पहले एक आधिकारिक सूची प्रसारित करते, जिसमें
केवल दलित, महिला, आदिवासी सहित समाज के वंचित वर्ग को प्रतिनिधित्व देने की अपील
होती, तो उनकी आज की चिंता ज्यादा वास्तविक और सार्थक दिखती। चुनाव प्रक्रिया में
अनावश्यक दखलअंदाजी का आरोप भी उन पर नहीं लगता, न ही उनकी निरपेक्षता पर
कोई प्रश्नचिद्द लगता। इसलिए आज जब दबी जबान यह कहा जा रहा है कि राव अपने
इस कदम से क्षत्रापों की बढ़ती शक्ति का मुकाबला करना चाहते हैं, तो इसकी सचाई से
इनकार भी नहीं किया जा सकता। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि राव ने वर्तमान
भारतीय राजनीति में कमजोर वर्ग की आकांक्षा को भी सही समझा है। यह बात दीगर है
कि अपनी इस समझ का वे अपने राजनैतिक हित में भी इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए जब
वे कह रहे होते हैं कि कांग्रेस जैसी संस्था भी यदि दलित, आदिवासी, महिला जैसे वंचित
वर्ग को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं दे सकती, तो फिर वे और कहां से उम्मीद करें, तब वे
भारतीय राजनीति के वर्तमान यथार्थ से भी साक्षात्कार करा रहे होते हैं, शिखर राजनीति
की उनकी अपनी विवशताएं चाहे कुछ भी क्यों न हों।
इसीलिए इस मसले को दलित राष्ट्रपति के सवाल या भाजपा-शिवसेना जैसी पार्टियों
से पिछड़ों-दलितों के मोहभंग के प्रश्न से जोड़कर देखना भी सार्थक होगा। उसे इस संदर्भ
में भी देखना चाहिए कि आरक्षण का बंधन ढीला करते ही समाज के वंचित तबकों को वह
न्यूनतम प्रतिनिधित्व भी क्यों नहीं मिल पाता, जितना उन्हें आरक्षण दिला देता है। इसलिए
ये प्रश्न बेमानी हैं कि राव शिखर राजनीति पर अपनी पकड़ मजबूत करने या सिर्फ कमजोर
वर्ग के बीच लोकप्रिय होने के लिए इस सवाल को छेड़ रहे हैं। इस बात का भी कोई अर्थ
नहीं कि जो आज दलित राष्ट्रपति चुनने की बात कर रहे हैं, उनका उद्देश्य दलित राष्ट्रपति
प्राप्त करना नहीं बल्कि इस मुद्दे का राजनीतिक शोषण करना तथा दलित समस्या को विकृत
करने की कोशिश करना है।
पर यह घटनाचक्र यह सिद्ध करता है कि जैसे-जैसे भारत में लोकतंत्रा की जडें मजबूत
होंगी, समाज के वंचित लेकिन बहुसंख्य वर्ग को ईंधन बनाकर उसकी आंच पर सवर्ण राजनीति
की रोटी सेंकना शायद अब लंबे अरसे तक संभव न रह पाए। यदि लोकतांत्रिाक व्यवस्था
कायम रहती है, तो यह वर्ग उसमें अपना समुचित हक भी लेकर रहेगा। चेतावनी की यह
घंटी हर राजनीतिक दल के अंदर घनघना रही है। जो सुन पा रहे हैं, वे वास्तविक सत्ता में
बहुसंख्य वर्ग की हिस्सेदारी के रास्ते में रुकावट नहीं बनेंगे, जो नहीं सुन पा रहे हैं या
सुनकर भी अनसुनी कर रहे हैं, उनकी राजनीतिक मंजिल सिर्फ इतिहास की कचरा पेटी ही
हो सकती है।
15 मई 1992, मतांतर, इंडिया टुडे
उत्पन्न संकट ने इस वास्तविकता को गहरे रेखांकित किया है कि कांग्रेस की राजनीति का
सामाजिक आधार क्रान्तिकारी रूप से परिवर्तित हो चुका है, जबकि कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व
इस तथ्य से अनभिज्ञ बना रहना चाहता है। कांग्रेस अध्यक्ष की विशेष चिंता स्वाभाविक
है। दक्षिण भारतीय होने के नाते नरसिंह राव इस ऐतिहासिक प्रक्रिया के साक्षी रहे हैं, इसलिए
वे इसे समझ भी पा रहे हैं, जबकि कांग्रेस का उत्तर भारतीय नेतृत्व अब भी अपनी पारम्परिक
राजनीति-शैली से चिपके रहना चाहता है।
यह संकट सिर्फ कांग्रेस का निजी राजनैतिक संकट नहीं है, यह संकट भारतीय राजनीति
में आ रहे आन्तरिक उफान का प्रतीक भी है। शायद ही कोई राजनैतिक दल इससे अछूता
बचा है। एक लोकतान्त्रिाक व्यवस्था में बहुसंख्य वर्ग को समुचित और व्यापक राजनैतिक
प्रतिनिधित्व कैसे मिले, यह प्रश्न अधिकांश राजनैतिक दलों के पिछड़े, दलित, आदिवासी
कार्यकर्ताओं को मथ रहा है। विभिन्न दलों में इस दर्द की अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न रूप से
हो रही है। इस प्रक्रिया को यदि इस संदर्भ में देखा जाए तो भारतीय राजनीति के वर्तमान
संकट को शायद सही परिपे्रक्ष्य में देख पाना संभव हो।
भाजपा जैसा अनुशासित दल बिहार में टूट गया। ध्यान देने की बात है कि दल से
टूटकर अलग हुए अधिकांश कार्यकर्ता पिछड़े वर्ग के थे। इंडियन पीपुल्स फ्रंट जैसे घोर वामपंथी
विचारधारा वाले दल में टूट हुई। वहां भी टूटने वाले लोग पिछड़े वर्ग के ही थे। महाराष्ट्र
में शिवसेना जैसे अधिनायकवादी दल में भी टूट कुछ इसी प्रकार हुई। छगन भुजबल के नेतृत्व
में पिछड़े वर्ग के कार्यकर्ताओं का एक समूह शिवसेना से अलग हो गया और कांग्रेस में शामिल
हो गया।
जनता दल के विखंडन का पैटर्न थोड़ा अलग है। यहां हर विघटन के बाद अवर्णों का
वर्चस्थ थोड़ा और बढ़ रहा है। नेतृत्व हालांकि अब भी सवर्ण-बहुल है लेकिन अब वह शायद
प्रतीकात्मक ज्यादा रह गया है, वास्तविक कम। सभी राजनैतिक दलों के दलित-आदिवासी
सांसदों की इस मांग को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए कि कोई दलित ही इस बार भारत
का राष्ट्रपति बने। संस्कृति से जोड़ने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी में भी कल्याण
सिंह और उमा भारती जैसे नेताओं को ही क्यों लांछित होना पड़ता है? इस सचाई को भी
इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। मामला यहां भी व्यापक राजनैतिक प्रतिनिधित्व तथा अवर्णों
की प्रगति से उत्पन्न सवर्ण रोष का ही है लेकिन भाजपा चूंकि अभी तक इस कसौटी पर
कसे जाने की आदी नहीं है, इसलिए इस विषय को भविष्य के लिए सुरक्षित रखकर फिलहाल
कांगे्रस के वर्तमान संकट को समझने की चेष्टा से ही ढेर सारे अनसुलझे प्रश्नों का एक संबद्ध
उत्तर मिल सकता है।
यह सच है कि कांग्रेस अध्यक्ष की इस चिंता के पीछे मूल कारण राजनैतिक है, जो
सीधे कांग्रेस की शिखर राजनीति से जुड़ा हुआ है, वरना क्या कारण है कि राव ने चुनाव
हो जाने के बाद ही अपनी चिंता को अभिव्यक्ति देना उचित समझा। यह तो ब्लॉक स्तर
के प्रारम्भिक चुनाव से ही स्पष्ट होने लगा था कि कांग्रेसी नेतृत्व समाज के कमजोर वर्ग
के स्वार्थ की उपेक्षा कर रहा है। विभिन्न प्रदेश कांग्रेस कमेटियों तथा अखिल भारतीय कांग्रेस
कमेटी के सदस्यों की सूची देख डालिए। इसी से स्पष्ट हो जाता है कि कम-से-कम हिंदी
भारत का कांग्रेस नेतृत्व इस बात की कतई चिंता नहीं कर रहा था कि समाज के विभिन्न
वर्गों के लोगों को कैसे हर स्तर पर समुचित प्रतिनिधित्व मिले। उत्तर प्रदेश में दलित और
आदिवासी सम्पूर्ण आबादी के करीब 24 प्रतिशत हैं और पिछड़े 60 प्रतिशत के करीब, लेकिन
उत्तर प्रदेश की सूची पर गौर करें तो पता चलेगा कि इस वर्ग का प्रतिनिधित्व इसमें दस
प्रतिशत भी नहीं है।
यही हालत बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा सहित सम्पूर्ण हिंदी भारत की है।
यह अचानक नहीं हुआ। कांग्रेस अध्यक्ष निश्चित ही इस तथ्य से भी अनभिज्ञ नहीं होंगे।
इसलिए उचित तो यह होता कि चुनाव प्रक्रिया से अपने आपको निरपेक्ष रखते हुए भी राव
कम-से-कम इस तथ्य की ओर चुनाव से पहले ही लोगों का ध्यान आकृष्ट करते कि कांग्रेस
की मतदाता सूची विकृत है और इसमें समाज के सभी वर्गों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं
हुआ है। जिस क्षत्राप को जहां मौका मिला है, वहीं उसने अपनी स्थिति मजबूत करने की
कोशिश की है। इस बात से बिल्कुल बेखबर कि उसका यह कर्म कांग्रेस के वास्तविक सामाजिक
आधार के हितों के सर्वथा विपरीत जा रहा है। समाज के वंचित वर्ग को समुचित प्रतिनिधित्व
देने के लिए राव यदि चुनाव से ऐन पहले एक आधिकारिक सूची प्रसारित करते, जिसमें
केवल दलित, महिला, आदिवासी सहित समाज के वंचित वर्ग को प्रतिनिधित्व देने की अपील
होती, तो उनकी आज की चिंता ज्यादा वास्तविक और सार्थक दिखती। चुनाव प्रक्रिया में
अनावश्यक दखलअंदाजी का आरोप भी उन पर नहीं लगता, न ही उनकी निरपेक्षता पर
कोई प्रश्नचिद्द लगता। इसलिए आज जब दबी जबान यह कहा जा रहा है कि राव अपने
इस कदम से क्षत्रापों की बढ़ती शक्ति का मुकाबला करना चाहते हैं, तो इसकी सचाई से
इनकार भी नहीं किया जा सकता। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि राव ने वर्तमान
भारतीय राजनीति में कमजोर वर्ग की आकांक्षा को भी सही समझा है। यह बात दीगर है
कि अपनी इस समझ का वे अपने राजनैतिक हित में भी इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए जब
वे कह रहे होते हैं कि कांग्रेस जैसी संस्था भी यदि दलित, आदिवासी, महिला जैसे वंचित
वर्ग को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं दे सकती, तो फिर वे और कहां से उम्मीद करें, तब वे
भारतीय राजनीति के वर्तमान यथार्थ से भी साक्षात्कार करा रहे होते हैं, शिखर राजनीति
की उनकी अपनी विवशताएं चाहे कुछ भी क्यों न हों।
इसीलिए इस मसले को दलित राष्ट्रपति के सवाल या भाजपा-शिवसेना जैसी पार्टियों
से पिछड़ों-दलितों के मोहभंग के प्रश्न से जोड़कर देखना भी सार्थक होगा। उसे इस संदर्भ
में भी देखना चाहिए कि आरक्षण का बंधन ढीला करते ही समाज के वंचित तबकों को वह
न्यूनतम प्रतिनिधित्व भी क्यों नहीं मिल पाता, जितना उन्हें आरक्षण दिला देता है। इसलिए
ये प्रश्न बेमानी हैं कि राव शिखर राजनीति पर अपनी पकड़ मजबूत करने या सिर्फ कमजोर
वर्ग के बीच लोकप्रिय होने के लिए इस सवाल को छेड़ रहे हैं। इस बात का भी कोई अर्थ
नहीं कि जो आज दलित राष्ट्रपति चुनने की बात कर रहे हैं, उनका उद्देश्य दलित राष्ट्रपति
प्राप्त करना नहीं बल्कि इस मुद्दे का राजनीतिक शोषण करना तथा दलित समस्या को विकृत
करने की कोशिश करना है।
पर यह घटनाचक्र यह सिद्ध करता है कि जैसे-जैसे भारत में लोकतंत्रा की जडें मजबूत
होंगी, समाज के वंचित लेकिन बहुसंख्य वर्ग को ईंधन बनाकर उसकी आंच पर सवर्ण राजनीति
की रोटी सेंकना शायद अब लंबे अरसे तक संभव न रह पाए। यदि लोकतांत्रिाक व्यवस्था
कायम रहती है, तो यह वर्ग उसमें अपना समुचित हक भी लेकर रहेगा। चेतावनी की यह
घंटी हर राजनीतिक दल के अंदर घनघना रही है। जो सुन पा रहे हैं, वे वास्तविक सत्ता में
बहुसंख्य वर्ग की हिस्सेदारी के रास्ते में रुकावट नहीं बनेंगे, जो नहीं सुन पा रहे हैं या
सुनकर भी अनसुनी कर रहे हैं, उनकी राजनीतिक मंजिल सिर्फ इतिहास की कचरा पेटी ही
हो सकती है।
15 मई 1992, मतांतर, इंडिया टुडे
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