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रविवार, 30 जून 2013

पत्रकारिता के नाम पर दुकान चलाने की स्वतंत्रता का मैं पक्षधर नहीं हूं

सुरेंद्र प्रताप सिंह से कुमार नरेंद्र सिंह की बातचीत

प्र.- पत्रकारिता में आने के पीछे आपका क्या उद्देश्य था?
उ.- पत्रकारिता में मैं दुर्घटनावश ही आया। इसलिए कहूं कि कोई महान उद्देश्य लेकर आया था तो यह झूठ होगा। हां, आने के बाद धीरे-धीरे उद्देश्य मेरे सामने स्पष्ट होने लगे। पत्रकारिता का जीवनदर्शन खुलने लगा। यह प्रक्रिया आज भी चल रही है।

प्र.- सफल पत्रकार आप किसे कहेंगे?
उ.- सफल पत्रकार मैं उसे कहूंगा जो देश, समाज और व्यक्ति (मैं समाज में अंतिम व्यक्ति की बात कर रहा हूं) के हित में इस काम को करता है या जो उसे करना चाहिए, उसमें वह सफल है। सफलता के कई मानदंड हो सकते हैं। हो सकता है कि कोई व्यक्ति पत्रकार के रूप में सफल न हो, पर पत्रकार का रूप धर कर सफल व्यक्ति बन जाए। बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके लिए पत्रकारिता अन्य कुछप्राप्त करने का साधन है। पत्रकारिता के जरिए कोई राजनीति में जाना चाहता है, कोई पैसा बनाना चाहता है और कोई नाम कमाना चाहता है। मैं समझता हूं कि इस तरह की सफलता पत्रकारिता की नहीं, बल्कि व्यक्ति की सफलता के मानदंड हैं। पत्रकार तो वही सफल है जो उसका सफलतापूर्वक संप्रेषण करता है, जिसे वह कहना चाहता है। यानि जो कुछ वह कहता है लोग उसे उसी तरह ग्रहण करते हैं। उसके कहने के पीछे कोई दूसरा कारण नहीं ढूंढते। इस मायने में मैं अरुण शौरी को एक सफल
पत्रकार मानता हूं। (यद्यपि उनके विचारों से मैं घोर असहमति रखता हूं।) वे जो कुछ कहते हैं उसको लोग गंभीरता से लेते हैं।

प्र.- पत्रकारिता में आप अपने को कितना सफल मानते हैं?
उ.- मैंने पत्रकारिता का लंबा और टेढा रास्ता चुना। सीधा रास्ता यह है कि अपने विचारों को धड़ाधड़ लिखकर पत्रकारिता में अपनी जगह और पहचान बना लें। लेकिन पता नहीं किन कारणों से मैंने यह रास्ता नहीं चुना। जो रास्ता मैंने चुना, वह जरा कठिन है। यह बात मैं कोई शहीदी मुद्रा या प्रशंसा पाने के उद्देश्य से नहीं कह रहा हूं। मुझे लगा कि मेरे लिए यही रास्ता ठीक है। पाठक तक एक व्यक्ति की बात पहुंचाने की बजाय मैंने सोचा कि हम ऐसा साधन विकसित करें जिससे बात संस्थागत रूप में पाठक तक पहुंचे। मैं रहूं या न रहूंव्यक्ति रहे या न रहे, लेकिन वह बात लोगों तक पहुंचती रहे। इसमें मेरे लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं था कि मैं क्या लिख रहा हूं बल्कि मेरे लिए यह महत्त्वपूर्ण था कि और लोग क्या लिख रहे हैं। मेरे लिए महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि हम किस तरह की पत्रिका निकाल रहे हैं या हमने किस तरह की टीम बनाई है। पत्रकारिता के अपने शुरुआती दिनों में मैं खूब लिखता था। पर जैसे-जैसे समझ बढ़ी, मुझे लिखने से डर लगने लगा कि मैं यह क्या कर रहा हूं। मुझे लगा कि लेखकों की पत्रकारिता में पूरी-की-पूरी पहचान बनाने का काम एक टीम के
रूप में ही किया जा सकता है। रविवारके माध्यम से थोड़ा-बहुत ऐसा करने का प्रयास मैंने किया। नवभारत टाइम्समें आने के बाद भी मैंने इस काम को जारी रखा। पर नवभारत टाइम्सएक बहुत बड़ा अखबार है। इसका एक जमा हुआ तंत्र है इसलिए उसमें काफी समय लगा। मुझे खुशी है कि आज पत्रकारिता उसी दिशा में बढ़ रही है जिस दिशा में मैंने उसे बढ़ाने का प्रयास किया था। अच्छी पत्रकारिता की दिशा में मैंने ठोस कदम उठाने का प्रयास किया, इसे ही आप मेरी सफलता या उपलब्धि मान सकते हैं।

प्र.- अखबार की कोई निश्चित विचारधारा होनी चाहिए या नहीं?
उ.- अखबार का मतलब मैं दैनिक समाचार पत्र समझता हूं और अगर वह किसी विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में माना जाता है तो यह उसकी असफलता है। इसमें मैं थोड़ा परंपरावादी हूं। मैं मानता हूं कि समाचारपत्र के तीन काम हैं- सूचना देना, जन शिक्षण करना और मनोरंजन करना। सूचना के भी दो अंग हैं- समाचार और विचार। समाचार के मामले में मैं चाहता हूं कि पत्रकार बहुत ही वस्तुनिष्ठ हों, निर्मम और निरपेक्ष हों। उस घटना का समाचार भीजिसका प्रभाव लोगों पर भिन्न-भिन्न रूपों में पड़ता हो, चाहे वह घटना कितनी भी बड़ी क्यों न हो, और उसका प्रभाव बड़े से बड़े समूह पर क्यों न पड़े, पत्रकार को निरपेक्ष होकर देना चाहिए। बड़ा दुख होता है कि पत्रकार ऐसी घटनाओं के प्रति निरपेक्ष नहीं रह पाते। देश के अंदर की घटनाओं पर तो निरपेक्ष रहते भी हैं, पर जहां भारत और पाकिस्तान का मामला आता है, हम निरपेक्ष नहीं रह पाते। विचार के मामले में बहुत वस्तुनिष्ठ नहीं हुआ जा सकता। पत्रिकाएं निश्चित विचारधारा की हो सकती हैं और होनी भी चाहिए। इसमें कोई बुराई नहीं है। पांचजन्यनिकलने से मुझे कोई परेशानी नहीं होती, क्योंकि हमें मालूम है कि वे कौन लोग हैं, उनकी विचारधारा क्या है और वे किस उद्देश्य से निकाल रहे हैं। इसी तरह अन्य दलों या व्यक्तियों की पत्रिकाएं भी हो सकती हैं।

प्र.- अखबार में क्या छपे, इसका अंतिम अधिकार मालिकान को होना चाहिए या संपादक कोसंपादकीय विभाग की स्वतंत्रता के आप किस हद तक पक्षधर हैं?
उ.- देखिए, इस अधिकार का निर्णय रोज-रोज नहीं होता। मालिकान और संपादकों के संबंध का भी निर्धारण रोज-रोज नहीं होता। वैज्ञानिक तरीका यह है कि मालिक जिस दिन संपादक को नियुक्त करता है उसी दिन उसे बता देता है कि हमारे अखबार की नीति क्या है। उस गाइडलाइन के अंदर अखबार को कैसे निकाला जाएगा, कौन सा समाचार जाएगा, यह सारा कार्य संपादक का होता है, उसमें मालिक कहीं नहीं आता। निर्धारित गाइडलाइन्स के अनुसार संपादक काम कर रहा है या नहीं, यह देखने का काम मालिक का है।  जहां तक संपादकीय विभाग की स्वतंत्रता का सवाल है, तो उसमें बहुत साफ लाइनें खिंची हुई हैं यानि समाचार देने में वे स्वतंत्र नहीं हैं। समाचार जो हैं, वे हैं और उन्हें जाना चाहिए। पर कहीं न कहीं स्वतंत्रता की सीमारेखा खींचनी होगी और वह सीमारेखा है संपादक। पत्रकारिता के नाम पर दुकान चलाने की स्वतंत्रता का मैं पक्षधर नहीं हूं। तर्कपूर्ण ढंग से
और सुसंस्कृत भाषा में लिखे गए विचारों को समाचारपत्रों में स्थान मिलना चाहिए- चाहे
वे जैसे भी विचार हों।

प्र.- संपादकीय विभाग और प्रबंधकों के बीच विवाद की मुख्य वजह क्या है और इसका समाधान क्या है?
उ.- मैं समझता हूं कि इसकी मुख्य वजह संपादकीय नीति का अभाव है, जिसके चलते प्रबंधकों एवं संपादकों के विचारों में टकराहट होती है। अपने देश में दिक्कत यह है कि प्रबंधक कोई संपादकीय नीति नहीं बनाना चाहते। संपादकीय नीति बनाना तलवार की धार पर चलने के समान है। इसमें प्रबंधकों को कहना पड़ेगा कि उनके संस्थान की संपादकीय नीति यह है या यह नहीं है, पर उनमें इतना साहस नहीं है। वे तो गंगा आए गंगादास, जमुना आए जमुना दासहोते हैं। नरसिंह राव की सरकार है तो नरसिंह राव का गुणगान, आडवाणी जी आएंगे तो आडवाणी जी महान और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसा कवि तो देखा ही नहीं। यानि जिसकी सत्ता उसका खेल उन्हें खेलना होता है। इसमें जो द्वंद्व चलता है, वह अखबार में भी प्रकट होता है। पश्चिम के देशों में संपादकीय नीति है। उदाहरण के लिए, इंग्लैंड में जब चुनाव होते हैं तो संपादक संपादकीय लिखता है कि वह अमुक पार्टी या अमुक उम्मीदवार का समर्थन करता है। मतदाताओं से उस दल के उम्मीदवार को वोट देने की अपील भी
करता है। पर यह बात रिपोर्टिंग में नहीं झलकनी चाहिए। अपने यहां तो संपादक सबको खुश करने की नीति अपनाते हैं। अखबार से पैसा भी कमाएंगे, मिशन भी बनाएंगे, उसे अंधेरे में बेच भी देंगे और पवित्रता की बात भी करेंगे। प्रबंधक और संपादक, दोनों ही नहीं चाहते कि कोई संपादकीय नीति बने।
इसका समाधान मैं समझता हूं कि अखबार का नियंत्रण पेशेवर (प्रोफेशनल) लोगों के हाथ में होना चाहिए। अन्य प्रोफेशनल्स जैसे डाक्टर, वकील, चार्टर्ड एकाउंटेंट आदि अपनी शर्तों पर काम करते हैं पर अखबारी पेशे का समीकरण कुछ इस तरह बना और बिगड़ा कि प्रोफेशनल्स अखबार के नियंत्रण में हैं। इसका समाधान तभी होगा जब ऐसी संस्थाएं बनेंगीजिनमें कुछ संपादक या लेखक ही अखबार निकालंगे। मुझे दीख रहा है कि यह दिन दूर नहीं है। इसमें सब कुछ खुला होगा। पांच संपादक बैठकर तय कर लेंगे कि उनकी संपादकीय नीति क्या होगी। जिनके लिए अखबार निकाला जाता है, जो अखबार निकालते हैं या जिन्हें निकालना चाहिए- उस पर यदि उनका नियंत्रण होगा तो स्थिति सुधरेगी, वरना ऐसे ही चलती रहेगी छापामार लड़ाई।

प्र.- आप अखबार के प्रबंधन को अन्य उत्पाद इकाइयों के समान ही मानते हैं या उससे भिन्नआप पत्रकार को एक विशिष्ट बुद्धिजीवी कर्मचारी मानते हैं या अन्य के समकक्ष एक सामान्य कर्मचारी?
उ.- मैं समझता हूं कि हर उत्पाद का प्रबंधन दूसरे से अलग होता है। उस मायने में अखबार का प्रबंधन भी दूसरे से अलग होता है। आखिर जूता बनाने और डालडा बनाने का प्रबंधन एक तो नहीं हो सकता। मैं इस तरह का वर्गीकरण नहीं कर सकता कि अखबार के प्रबंधन का एक वर्ग और बाकी उत्पाद इकाइयों का दूसरा वर्ग। अखबार को एक उत्पाद के रूप में तो देखना ही पड़ेगा, पर अखबार निकालने का उद्देश्य सिर्फ बेचना नहीं हो सकता। क्योंकि अगर सिर्फ बेचना ही उद्देश्य होता तो वह अन्य उत्पाद इकाई भी बैठा सकता है। किसी ने अखबार निकाला है तो निश्चित रूप से उसका उद्देश्य सिर्फ बेचना नहीं है, कुछ और भी है और यही उद्देश्य इसे अन्य उत्पादों से अलग करता है।
मैं पत्रकार को कोई विशिष्ट बुद्धिजीवी कर्मचारी नहीं मानता। क्या डाक्टर, वकीलइंजीनियर और कुशल मजदूर बुद्धिहीन होते हैं? पत्रकार लिखने का विशिष्ट कार्य अवश्य करता है पर वह अकेला बुद्धिजीवी नहीं है।

प्र.- अखबारों में सेवा शर्तों के संबंध में प्रबंधकों के मनमानेपन की स्थिति बरकरार क्यों है?
उ.- यह स्थिति हर क्षेत्र में है। मैं प्रबंधकों की मनमानी को डिफेंड नहीं कर रहा हूं। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि जिस तरह का समाज हमने बनाया है, उसमें मजदूरी करने वाले लोगों के साथ लगातार अन्याय होता आ रहा है, चाहे वह कोई भी क्षेत्र या धंधा हो। यह सिर्फ अखबारों की स्थिति नहीं है। पत्रकार संगठित रूप से उनके मनमानेपन का विरोध नहीं कर रहे हैं। अखबारों में मजबूत ट्रेड यूनियन की परंपरा रही है। वह परंपरा नष्ट हो रही है इसलिए प्रबंधकों के मनमानेपन की स्थिति बरकरार है।

प्र.- इस संदर्भ में आखिर बछावत आयोग की सिफारिशें क्यों लागू नहीं की जातीं?
उ.- बछावत आयोग अपने आप में इस समस्या का समाधान नहीं है। बछावत तो उनके लिए है जो नियम मानने के लिए तैयार हैं। आज पत्रकारिता में, खासकर हिंदी पत्रकारिता में, ऐसी स्थिति है कि जो लोग अखबार निकाल रहे हैं, सेवा शर्तों की बात तो छोड़ दीजिएवे किसी भी नियम-कानून को नहीं मानते।

बछावत आयोग इसलिए लागू नहीं होता कि मालिक पैसा नहीं देना चाहते हैं। बहुत साधारण बात है कि अगर मालिक का काम दो पैसे देकर चल जाता है तो वह पचास पैसे क्यों देगा? इस देश में कौन सा कानून लागू होता है? आप जिस समाज में रहते हैं उसी का तो कानून लागू होगा। ऐसा तो है नहीं कि पत्रकारिता के लिए अलग स्थिति है।  

प्र.- अखबार में क्या आप यूनियन के पक्षधर हैं?
उ.- मैं हमेशा यूनियन का पक्षधर रहा हूं, क्योंकि मैं समझता हूं कि यूनियन एक ऐसी संस्था है जो दूसरे पक्ष को वैज्ञानिक तरीके से सामने लाती है। समझौते में अगर दूसरा पक्ष संस्था के रूप में सामने नहीं बैठेगा तो प्रबंधन के किसी निर्णय की प्रतिक्रिया कई रूपों में प्रकट होगी और इससे सिर्फ ऊर्जा का नाश होगा। मैं समझता हूं कि किसी संस्था में यूनियन का होना उतना ही आवश्यक है, जितना एक अच्छे प्रबंधक का होना।

प्र.- अखबार में सत्ता के राजनीतिक दखल को क्या उचित मानते हैं? क्या आप मानते हैं कि सत्ता से तालमेल किए बिना आसानी से अखबार नहीं चलाया जा सकता?
उ.- अखबार में सत्ता के राजनीतिक दखल को मैं बहुत अनुचित मानता हूं। वैसे बहुत सारे अक्षम लोग इसे अपने निकम्मेपन की ढाल भी बनाते हैं। अपने 20-22 सालों की पत्रकारिता में ऐसा कोई उदाहरण याद नहीं पड़ता जब मेरे ऊपर सत्ता का दबाव पड़ा हो। अगर आप बेईमान नहीं हैं, राजनीतिकों से पैसा नहीं लेते या उनकी राजनीति नहीं करते, तो आपके ऊपर सत्ता का दबाव नहीं डाला जा सकता। लेकिन आप अगर चोर-चोर मौसेरे भाईहैं तो आप पर सत्ता का दबाव पड़ेगा। मैं ऐसा कतई नहीं मानता कि सत्ता से तालमेल किए बिना अखबार नहीं चलाया जा सकता।

प्र- आप पर भी सत्ता की राजनीति करने के आरोप लगाए जाते हैं, खासकर जनता दल का समर्थन
करने के लिए। इस संदर्भ में आपका क्या कहना है?
उ.- जब तक जनता दल सत्ता में रहा, तब तक के अखबार निकालकर देख लीजिएपता चल जाएगा कि मैं जनता दल का समर्थन कर रहा था या नहीं। यह तो ऐसी चीज़ है कि जिसे आप चाहकर भी छिपा नहीं सकते। मैं जनता दल का समर्थक हूं या नहीं, यह तो अखबार से ही देखा जा सकता है। सौभाग्य या दुर्भाग्यवश उस समय मैंने बहुत कम लिखा। मैं तो सिर्फ समाचारों का संयोजन करता था, वह भी पूर्वाग्रह से मुक्त होकर। मैंने लिखना तब शुरू किया जब मंडल और मंदिर का मुद्दा सामने आया। उस समय जनता दल के समर्थक तो क्या, जनता दल के खुद के नेता जनता दल के विरोधी हो गए थे। अगर कोई यह समझता है कि मैं मंडल का समर्थन कर रहा था इसलिए जनता दल का समर्थन कर रहा था तो उससे बड़ा मूर्ख मैं किसी को नहीं समझता। वह तो मेरे लिए अलोकप्रियता
के पाताल में ले जाने वाला कदम था, पर मैंने वह कदम इसलिए उठाया क्योंकि मैं वैचारिक रूप से उसे उचित मानता था। उसमें भी मैं समाचारों में कोई दखलअंदाज़ी नहीं करता था। संपादकीय नीति राजेन्द्र माथुर तय करते थे और चूंकि मेरी राय भी उनसे मिलती थी, इसलिए एक तरह की नीति चलती थी। वैसे संपादकीय नीति निर्धारण में सूर्यकांत बाली, विष्णु खरे या राजकिशोर आदि भी सहयोगी होते थे। मैं जो उचित समझता था, उसे मैं अपने नाम से लिखता था और इसके लिए मुझे कहीं कोई शर्म या मलाल नहीं है। आपको सूचित कर दूं कि सत्ता की राजनीति करके पूरे जनता दल के शासन काल में मैं विश्वनाथ प्रताप सिंह से एक बार भी नहीं मिला।

प्र.- इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रसार क्या हिंदी पत्रकारिता के लिए चुनौती नहीं है? इन चुनौतियों का सामना कैसे किया जा सकता है?
उ.- यह चुनौती खुद पत्रकारिता के लिए है। हां, हिंदी पत्रकारिता कोई विशेष पत्रकारिता है, ऐसा मैं नहीं समझता। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया छपे हुए शब्दों के लिए चुनौती है। मैं इसे खतरा नहीं मानता। मैं सूचना के मुक्त बहाव में विश्वास करता हूं, चाहे वह किसी भी स्रोत से प्राप्त हो। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चुनौती का सामना करने के लिए समाचारपत्रों को और विश्वसनीय बनाना पड़ेगा, इसे समाज से और जोड़ना पड़ेगा। समाचारपत्र के विचार पक्ष को और सुदृढ़ करना होगा क्योंकि दृश्य-श्रव्य माध्यम की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि दर्शक के दिमाग से शब्द बड़ी तेजी से गायब होते हैं। यहीं पर प्रिंट माध्यम की भूमिका शुरू होती है। अखबार की बात को महीनों, वर्षों और सदियों तक सुरक्षित रखा जा सकता है पर इसके लिए आपको तय करना होगा कि अखबार से आपपरचून की दुकान चलानी है या विचारों का लेन-देन करना है।

प्र.- क्या आप पत्रकारिता जगत में आई चारित्रिक गिरावट की बात स्वीकार करते हैं? अगर हांतो  इसकी वजह क्या है?
उ.- चारित्रिक गिरावट से आपका क्या मतलब है? क्या आप कहना चाहते हैं कि पत्रकार चरित्रहीन हो गए हैं, सवाल को थोड़ा स्पष्ट कीजिए।
प्र.- मेरा मतलब है कि पत्रकारिता के जरिए कुछ पत्रकार अन्य सुविधाएं और उद्देश्य हासिल करने में लगे हुए हैं।
उ.- इस तरह की चारित्रिक गिरावट निश्चित रूप से आई है, पर यह गिरावट समाज के हर अंग में आई है। अखबार पलटकर देख लीजिए, आपको पता चल जाएगा कि कानून की रक्षा करने वाली पुलिस स्वयं हर प्रकार के संगीन जुर्म में शामिल है। ऐसे बहुत से पत्रकार हैं जो पत्रकार के रूप में नेतागिरी करते हैं और नेता बनने के बाद पत्रकारिता करते हैं। पत्रकार कोई देवदूत नहीं होता। इनमें भी बहुत सारे दलाल घुसे हुए हैं। समाज के बाहर रहकर पत्रकारिता नहीं हो सकती। यह कैसे हो सकता है कि समाज तो भारत का हो और पत्रकारिता फ्रांस की हो? समाज में आई चैतरफा गिरावट पत्रकारिता में भी परिलक्षित हो रही है। पत्रकारों की विश्वसनीयता अवश्य कम हुई है पर मेरे लिए यह कोई ज्यादा चिंताजनक बात नहीं है। मेरे लिए चिंताजनक बात यह है कि लोगों का विश्वास राज्य की सत्ता से ही उठता जा रहा है। न्याय व्यवस्था, प्रशासन और सरकार पर से लोगों का विश्वास उठ रहा
है। मैं इसे पत्रकारिता की विशेष समस्या नहीं मानता।

प्र.- कई संस्थानों में मालिक ही संपादक भी हैं। संपादकीय कामों के बगैर किसी कार्यानुभव के क्या किसी को संपादक होना चाहिए?
उ.- मालिक संपादक हो, इसके खिलाफ मैं नहीं हूं। ऐसे बहुत से अच्छे संपादक हैं जो मालिक भी हैं। एन राम (हिंदू), हरि किशोर (डेक्कन हेराल्ड), कर्पूर चन्द्र कुलिश (राजस्थान पत्रिका), लाला जगत नारायण, विजय कुमार (पंजाब केसरी), नरेन्द्र मोहन (जागरण) आदि अच्छे संपादक रहे हैं और हैं। लेकिन जो लोग संपादक के रूप में सिर्फ अपना नाम देना चाहते हैं या जिनके लिए संपादक का नाम छपने से मंत्रियों के दरवाजे खुल जाते हैं, उस पर मुझे आपत्ति है।

प्र.- मौजूदा समस्याओं मसलन सांप्रदायिकता, जातीयता आदि को बढ़ाने में क्या प्रेस की भी भूमिका रही है? इस संदर्भ में उसे किस तरह की नीति अख्तियार करनी चाहिए?
उ.- बहुत बुरी भूमिका रही है। मैं समझता हूं कि एक दौर, जिसमें सैंकड़ों नौजवानों ने अपने को जलाकर मार डाला, के पीछे सबसे बड़ी भूमिका अखबारों की रही है। कुछ अखबारों ने बाकायदा इस पर कैम्पेनचलाया। मंडल का विरोध उन्हें तब तक संतुष्ट नही कर पाया जब तक नौजवान जलकर मरने नहीं लगे। जलकर मरने वालों का समाचार जब न्यूज़रूम में पहुंचता था तो वहां जैसे उल्लास का एक वातावरण बन जाता था। उसी तरह राम मंदिर मामले में भी देखने को मिला कि पत्रकार कार सेवक बन बैठे। मैं यह नहीं कहता कि पत्रकार धार्मिक भावना से अछूता रहे, पर इतना मैं जरूर सोचता हूं कि पत्रकार को चाहिए कि इस भावना को दबाकर, समेटकर रखे। इसका प्रचार अखबार के माध्यम से न करे।

प्र.- प्रभाष जोशी ने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघवादी जैसे संगठनों को कमजोर करने के लिए पत्रकारों को भाजपा का समर्थन करना चाहिए क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो सारे देश में पंजाब जैसी स्थिति हो जाएगी। उनकी इस टिप्पणी पर आप क्या सोचते हैं?
उ.- मैं चूंकि यह नहीं जानता हूं कि प्रभाष जोशी जी ने किस संदर्भ में यह बात कही है। वैसे इतना मैं जरूर कहूंगा कि विहिप, बजरंग दल, आरएसएस को भाजपा से अलग मानकर अगर वे कोई विश्लेषण करते हैं तो मैं विनम्रतापूर्वक इससे असहमत होना चाहूंगा। मैं भाजपा को विहिप, आरएसएस और बजरंग दल से अलग कोई सत्ता नहीं मानता और न मैं यह मानता हूं कि भाजपा में आडवाणी जी खराब हैं या अटल जी अच्छे हैं। मैं इन सबको एक ही परिवार, संघ परिवार का सदस्य मानता हूं।

(15 नवंवर 1992, राष्ट्रीय सहारा हस्तक्षेप)


पत्रकारिता का महानायक- सुरेंद्र प्रताप सिंह संचयनः पृष्ठ 404-410

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

दलित राष्ट्रपति के बहाने नए समीकरण

लगता है, दलित राष्ट्रपति के प्रश्न पर ही विभिन्न राजनीतिक दलों के आपसी संबंधों पर भी एक बार फिर से विचार हो जाएगा। आवश्यकता तो इसकी शायद सभी दल महसूस कर रहे थे, लेकिन पहल कौन करे की मजबूरी के कारण संभवतः कुछ नहीं कर पा रहे थे। राष्ट्रीय मोर्चे और वाम मोर्चे के लिए तो यह एक तरह से सुनहरा मौका साबित हो सकता है क्योंकि वास्तविकता तो यही है कि पिछले कुछ समय से इनके आपसी संबंध काफी असहज हो चुके थे। अलग-अलग रास्तों पर चलने का फैसला शायद इसलिए नहीं हो पा रहा था क्योंकि इसके लिए इन्हें अब तक कोई समुचित सैद्धांतिक आवरण नहीं मिल पाया था। इस दृष्टि से राष्ट्रपति पद का चुनाव संबंधों की पुनर्व्यवस्था के लिए एक आदर्श अवसर हो सकता है। राष्ट्रीय मोर्चे के विभिन्न घटकों और यहां तक कि जनता दल के परस्पर विरोधी विचार वाले तत्वों के लिए भी यह चुनाव एक ऐसा मौका प्रदान कर सकता है, जहां से आगे यदि उनके रास्ते अलग दिशाओं में चल पड़ें तो इनके लिए यह एक सहज घटना ही होगी।

जनता दल नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह और वामपंथी दलों के बीच इस प्रश्न पर ताजा असहमति के कारण राष्ट्रीय मोर्चा और वामपंथी दलों के बीच पड़ी दरार को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। सचाई यह है कि न तो विश्वनाथ प्रताप सिंह वास्तव में इस बात पर गंभीर हैं कि अगला राष्ट्रपति दलित-आदिवासी ही होना चाहिए, न ही वाम मोर्चे के लिए यह प्रश्न उनकी राजनीतिक प्राथमिकता में सर्वाेपरि है। लेकिन दोनों पक्ष इस प्रश्न को इस सीमा तक खींचने में नहीं हिचकिचाएंगे, जहां से दरार स्थाई बन सकती है, क्योंकि दोनों पक्षों के लिए अपने राजनीतिक हित साधने का यह एक अच्छा मौका है। मुद्दों की तलाश में भटक रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह को अपनी आगामी राजनीति के लिए इसी बहाने कुछ ऐसे स्थाई मुद्दे मिल जाएंगे, जिनके सहारे उनकी रुकी पड़ी राजनीति थोड़ी आगे बढ़ सकती है। वाम मोर्चे को भी एक ऐसा अवसर मिल जाएगा जिस बिंदु से वह कांग्रेस के साथ एक नए सिरे से संबंध भी स्थापित कर पाएगा और यह भ्रम भी बना रहेगा कि वामपंथी अपनी स्वाभाविक राजनीति ही कर रहे हैं। वामपंथियों की राजनीतिक दिशा में कहीं कोई भटकाव नहीं आया है। यह राजनीतिक इंतजाम दोनों पक्षों को माफिक पड़ता है।

सबसे पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह के राजनीतिक कष्ट को समझने का प्रयास करें। जनता दल के गठन में चाहे जितने भी महारथियों का योगदान क्यों न रहा हो, लेकिन उसे एक सैद्धांतिक आधार प्रदान करने, उसे राष्ट्रीय मोर्चे का एक घटक बनाने तथा उस मोर्चे को वाम मोर्चे के साथ जोड़कर एक राजनीतिक शक्ति के रूप में खड़ा करने में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान विश्वनाथ प्रताप सिंह का ही था। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने शुद्ध राजनीतिक अवसरवाद को एक राजनीतिक दर्शन का मुलम्मा चढ़ाकर देश के सामने पेश करने का एक असंभव कार्य किया था। सर्वथा विपरीतधर्मी राजनीतिक तत्वों को जोड़कर जनता दल का गठन करना, केंद्रीय शक्ति के विरोध में उभरी विभिन्न शक्तियों को संगठित करके राष्ट्रीय मोर्चे का स्वरूप देना और उसे एक ओर वाम मोर्चे से तो दूसरी ओर भाजपा से समर्थन दिलाकर सरकार चलाने के असंभव कार्य को थोड़े समय के लिए ही सही, लेकिन संभव कर दिखाना वास्तव में एक भारी नट-खेल था जिसे ज्यादा दिनों तक चलाया भी नहीं जा सकता था। स्वाभविक है कि वह चला भी नहीं। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के पतन के साथ वह ताना-बाना जो बिखरना प्रारंभ हुआ, वह प्रक्रिया अब भी जारी है। एक स्तर पर जहां वह विश्वनाथ प्रताप सिंह और वाम मोर्चे के संबंधों में दरार के रूप में सामने आ रही है, तो दूसरे स्तर पर वह जनता दल के अंदरूनी तनाव के रूप में। अनेक स्तर पर हो रहे इस बिखराव का कारण एक ही है कि इन शक्तियों को जोड़ने वाला तंत्रा गैर कांग्रेसवाद अब प्रभावी नहीं रह गया है। कांग्रेस से नेहरू परिवार का वर्चस्व समाप्त होने के बाद अब आगे यह तत्व अनेक विपरीतधर्मी विपक्षियों को जोड़ने का काम कर पाएगा, यह संभव भी नहीं दिखता।

इस तथ्य को तो विश्वनाथ प्रताप सिंह, जनता दल के अन्य नेता तथा वामपंथी सभी स्वीकार करते हैं लेकिन यह सहमति सिर्फ इसी बिंदु तक सीमित है। आगे की राजनीति का स्वरूप क्या होगा और इस ढांचे में विभिन्न राजनीतिक दलों की अपनी स्थिति क्या होगी, इस बिंदु पर सहमति तो है ही नहीं वरन् घोर मतभेद भी हैं। यह तथ्य इन सबको अच्छी तरह पता है कि उनकी अब तक की एकता में भी समानता का कोई विशेष कारक नहीं था। आर्थिक मुद्दों पर इस गठबंधन के विभिन्न घटकों के मतभेद तो जगजाहिर ही थे, जनता दल के अंदर भी कभी इस मुद्दे पर कोई आम सहमति नहीं रही। यही हालत सामाजिक न्याय के प्रश्न की रही जिसे मजबूरन जनता दल ने अपना मुख्य नारा तो बना लिया लेकिन दल के अंदर कभी इस प्रश्न पर एकता नहीं रही। इस प्रश्न पर राष्ट्रीय मोर्चा भी बंटा रहा। वाम मोर्चे ने कभी भी इस विषय को मुद्दे के रूप में मान्यता ही नहीं दी लेकिन अवसरवादिता की वैचारिक बेईमानी के कारण खुलकर कभी भी इस विषय पर अपने विचार भी प्रकट नहीं किए। इस गठबंधन के एजेंडा में विदेश नीति को कभी प्रमुखता दी ही नहीं गई वरना इस विषय पर जितने दल हैं उतनी नीतियां तो होती हीं। यह भी संभव है कि जितने नेता हैं उतनी ही नीतियां भी होतीं। कुल मिलाकर इन्हें बांधने वाला एक ही तथ्य था, जिसकी समाप्ति को ये स्वीकार कर चुके हैं और अब इन्हें ऐसे नए तत्वों की तलाश है जिनसे एक महागठबंधन भले ही न हो पाए लेकिन कम-से-कम आगे की राजनीति चलती रहे।

राष्ट्रपति पद का चुनाव इन तत्वों के लिए शाश्वत तलाश का एक अच्छा अवसर साबित हो रहा है। वाम मोर्चे को गैर कांग्रेसवाद का विकल्प गैर भाजपावाद में दीख रहा है। इस नीति के सहारे वामपंथी, राष्ट्रीय मोर्चा आदि के साथ अपने संबंध समाप्त करके कांग्रेस के साथ नए सिरे से संबंध स्थापित करना चाहते हैं। यह अवसर इन्हें एक सैद्धांतिक आवरण तो देगा ही, इन्हें शासक दल के साथ जुड़ने का एक आसान मौका भी देगा। वामपंथी हमेशा से इसके आदी भी रहे हैं। वामपंथियों का यह रास्ता जनता दल के भी कई नेताओं को अनुकूल लग रहा है। ये वे लोग हैं जो सिर्फ इस कारण इस गठबंधन में शामिल थे क्योंकि कांग्रेस ने तब इन्हें अपने साथ रखा नहीं था। अब यदि गैर भाजपावाद इन्हें किसी व्यापक गठबंधन में सम्मानपूर्वक शामिल होने का मौका दे रहा है तो ये मुद्दों के अनावश्यक पचड़े में क्यों पड़ें।

दूसरी ओर जनता दल के वे तत्व हैं चाहे-अनचाहे मुद्दों के साथ रहना जिनकी मजबूरी है। विश्वनाथ प्रताप सिंह, शरद-लालू यादव तथा राम विलास पासवान आदि जनता दल की राजनीति को सायास या अनायास उस दिशा में मोड़ चुके हैं जहां से वापस मुड़ने का अर्थ होगा उनका निश्चित राजनीतिक सफाया और आगे का रास्ता और भी कठिन है। वर्तमान जनता दल उत्तर प्रदेश-बिहार के पिछड़ों के एक वर्ग की पार्टी है, जिसे मुसलमानों का समर्थन प्राप्त है। इसके वर्तमान सामाजिक-धार्मिक आधार के कारण इसे उन वर्गों र्का समर्थन नहीं मिल सकता, जो फिलहाल भाजपा और कांग्रेस के साथ हैं। अब यदि इन्हें अपने आधार को और संकुचित होने से बचाना है तो स्वाभाविक ही इन्हें नए आधार के लिए दलित-आदिवासी वर्ग की ओर देखना होगा। दलित राष्ट्रपति का सवाल इस दिशा में एक प्रयास हो सकता है जिसे जनता दल का यह वर्ग आजमाना चाहता है क्योंकि इन्हें पता है कि आज जो इनका आधार है उसमें धीरे-धीरे कमी ही आनी है। हालांकि इसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि दलित-आदिवासी राष्ट्रपति का प्रश्न पिछड़े वर्ग को भी उतना ही आंदोलित करे जितना दलितों-आदिवासियों को। फिर भी यह एक सोच-समझकर उठाया गया जोखिम है।

वाम मोर्चे के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं है कि वह भी इस तरह का कोई ऐसा जोखिम उठाए। वामपंथी ढाई राज्यों में सिमटे हुए हैं और उनकी महत्त्वाकांक्षा उस सीमित दायरे से बाहर निकलने की है भी नहीं। दूसरी ओर, यदि सचमुच सामाजिक न्याय का प्रश्न उनके लिए भी गंभीर राजनीतिक प्रश्न बन जाता है तो उनके अपने आधार पर प्रहार की आशंका ज्यादा रहेगी। वामपंथी इसे भले ही न मानें लेकिन वास्तविकता यही है कि जिन दो राज्यों में उनका वर्चस्व है वहां समर्थन भले ही इन्हें समाज के कमजोर तबकों से मिलता हो लेकिन नेतृत्व हमेशा सवर्ण और शहरी मध्य वर्ग के हाथ में रहा है। अतः इस सवाल को छेड़कर आज जनता दल जिन अंतर्विरोधों का सामना कर रहा है, वामपंथी भी उनसे अंततः बच नहीं पाएंगे। अतः वामपंथियों ने सही हिसाब लगाया है कि इस गठबंधन से जो कुछ उन्हें प्राप्त करना था वह प्राप्त कर चुके हैं। अब आगे यदि इस संबंध को बनाए रखा जाता है तो इन्हें भी बेचैनी के उस दौर से गुजरना पड़ेगा जिस दौर से इस गठबंधन के मूल उत्प्रेरक यानी जनता दल को गुजरना पड़ा है। जबकि इनके सामने सांप्रदायिकता के प्रश्न पर भाजपा को अलग-थलग करने के सैद्धांतिक सवाल को आगे कर के कांग्रेस के साथ मधुर संबंध बनाने का आसान रास्ता मौजूद है।

जबकि जनता दल का रास्ता इतना आसान नहीं है। यहां न तो अभी सैद्धांतिक आधार तय हो पाया है और न ही नेतृत्व का प्रश्न। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने दलित राष्ट्रपति के प्रश्न को उठाकर दल के इस अंतर्द्वंद्व को ही तीव्र किया है। संभव है, दल इस सवाल पर एक बार और बंटे, लेकिन इस बंटवारे को स्वाभाविक ही मानना चाहिए। देखना है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह-राम विलास पासवान द्वारा उठाए गए इस मुद्दे को जनता दल के भीतर कितना समर्थन प्राप्त होता है। दल के सैद्धांतिक आधार और भविष्य के नेतृत्व की दिशा उसी समर्थन से तय होगी। दलित राष्ट्रपति का प्रश्न तो वास्तव में इनके लिए भी सांकेतिक ही है। इसलिए बहुत संभव है कि यह प्रश्न इस विवाद के दौरान ही कहीं खो जाए। इस बात को जनता दल के अंदर विश्वनाथ प्रताप समर्थक भी समझते हैं और विश्वनाथ प्रताप विरोधी भी। राष्ट्रीय मोर्चे का हर घटक इस तथ्य से वाकिफ है कि यह विवाद उनके भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेगा। वाममोर्चा तो इसी प्रश्न के सहारे अपना अलग कदम तय भी कर चुका है। कांग्रेस के अंदर दलित राष्ट्रपति की बात उठाने वाले तो अब शांत भी हो चुके हैं। यानि कुल मिलाकर इस प्रश्न से जितनी राजनीति साधी जा सकती थी या तो साधी जा चुकी है या उसी रास्ते बढ़ रही है। सिर्फ दलित राष्ट्रपति का प्रश्न वहीं छूट गया लगता है जहां से यह प्रारंभ हुआ था। दलित और दलित राजनीति की यही वास्तविकता है।

4 जून 1992, अमर उजाला

कमाल कर दिखाया केसरी ने

सीताराम केसरी निश्चय ही बधाई के हकदार हैं कि जिस काम को पिछली सरकारें करीब 40 साल से टालती आ रही थीं, उसे कर दिखाने का उन्होंने साहस किया। राजनैतिक पंडित कह रहे हैं कि यह काम आगामी चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया है। वैसे ही, जैसे यह कहा गया था कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने देवीलाल को राजनैतिक मात देने के लिए मंडलास्त्र छोड़ा था। हो सकता है, दोनों बातें अपनी जगह सही हों पर केवल इसी कारण इस विषय का महत्त्व कम नहीं हो जाता और लोकतांत्रिाक व्यवस्था में लोकप्रिय काम चुनाव के गणित को ध्यान में रखकर ही किए जाते हैं।

सच यह है कि देश जिस आर्थिक दिशा की ओर बढ़ रहा है उस व्यवस्था में सरकार के हाथों से काम देने की शक्ति दिन-ब-दिन छिनती जाएगी। यह भी सच है कि इस तरह के आरक्षण से पीढि़यों के सामाजिक अन्याय की समाप्ति नहीं हो जाएगी। पर सच यह भी है कि इन तर्कों के आधार पर आरक्षण का विरोध मूलतः वही लोग करते हैं जिन्हें सामाजिक न्याय के सिद्धांत में बिल्कुल विश्वास नहीं है। आरक्षण से संपूर्ण सामाजिक न्याय की प्राप्ति नहीं हो सकती, पर इसके बिना आप उस दिशा में बढ़ भी नहीं सकते।

सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग को आरक्षण की सुविधा देनी है और इस वर्ग की पहचान का एकमात्रा आधार जाति हो सकती है। इस वास्तविकता को सुप्रीम कोर्ट से लेकर कांग्रेस, भाजपा तथा वामपंथियों तक ने समझ लिया है। उसी तरह अब उन लोगों को भी उस वास्तविकता को समझ लेना चाहिए कि आरक्षण की सुविधा शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़ों को बराबरी तक लाने के ही लिए दी जानी चाहिए न कि एक नया विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग खड़ा करने के लिए। सामाजिक न्याय के संघर्ष और एक नए सुविधाभोगी वर्ग की यथास्थितिवादी चाहत में अन्तर तो करना ही पड़ेगा। इसलिए यह बात कम-से-कम सिद्धांत रूप में तय हो जानी चाहिए कि एक सीमा के बाद उन सारे लोगों को अपनी बैसाखियां उन लोगों के लिए छोड़नी पड़ेंगी जिन्हें इनकी जरूरत उनसे ज्यादा है। मलाईदार परत के सिद्धांत को इस रूप में देखना चाहिए।

सरकार द्वारा घोषित आरक्षित नीति के साथ जुड़ी मलाईदार परत की सूची से असहमति या आपत्ति हो सकती है पर सिद्धांत रूप में इसे मानने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इस सूची की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें राजनीतिकों के साथ पक्षपात किया गया है। पिछड़ी जाति का कोई व्यक्ति राष्ट्रपति बन जाए तो उसकी संतान को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा, परंतु पिछड़ी जाति के प्रधानमंत्री की संतान आरक्षण की सुविधा प्राप्त करती रहेगी, यह आसानी से गले उतरने वाली बात नहीं है। लेकिन सूची की अच्छी बात यह है कि मलाई हटाने का काम लगातार चलता रहेगा।

मलाईदार परत हटाने का काम सिर्फ नौकरियों के आरक्षण के मामले में ही नहीं, अन्य क्षेत्रों में भी प्रारंभ होना चाहिए, खास तौर पर उद्योग और वाणिज्य के क्षेत्रा में भी इसको तत्काल लागू किया जाना चाहिए।

मलाईदार परत हटाने का काम नौकरियों में आरक्षण नीति लागू होने के साथ किया जा रहा है। इससे विश्वास बन सकता है कि सचमुच यह प्रयास सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है। कांग्रेस में जैसा ब्राह्मणवाद आज चल रहा है वैसा इससे पहले शायद ही कभी था। उस प्रतिकूल माहौल में भी सीताराम केसरी ने इतना बड़ा काम कर लिया है, तो उनसे उम्मीद की जा सकती है कि यादव, कुर्मी, कोइरी तथा लोध जैसी पिछड़ी जातियों में अगड़ी जातियों के मुखर विरोध के बावजूद मलाईदार परत हटाने के अपने वादे से पीछे नहीं हटेंगे।

30 सितंबर 1992, इंडिया टुडे, मतांतर

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

मुरहो को धर्मस्थल और मंडल को अवतार न बनाएं

इस बात में एक हद तक सचाई अवश्य है कि बिहार में जब से लालू प्रसाद की सरकार बनी है, उसके राजनीतिक विरोधियों ने उसे पल-भर भी चैन से बैठने का अवसर नहीं दिया है। पिछले ढाई साल में सरकार का बहुलांश समय और ऊर्जा खुद को बचाए रखने में ही नष्ट हुई है। यह कहा जा सकता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष का यह धर्म है कि वह सत्तापक्ष को हमेशा चौकन्ना रखे। सत्ता पक्ष का कर्तव्य है कि उस अनिश्चय की आग से पर्याप्त ऊर्जा ग्रहण करके कुछ ऐसा सकारात्मक कर्म करता रहे जिसके लिए मतदाताओं ने उनमें आस्था व्यक्त की है।

सिद्धांत के रूप में ये बातें ठीक हैं लेकिन इसके साथ एक शर्त भी जुड़ी हुई है। शर्त यह है कि यह सारा कार्य व्यापार लोकतांत्रिक ढांचे और सिद्धांत के अंदर ही सम्पन्न हो। यदि यह खेल इन नियमों के अंतर्गत खेला जाता है तो सरकार के पास अपने को बचाए रखने का पर्याप्त अवसर रहता है। इसके बाद भी इतना समय बचा रहता है जिसमें वह अपने उस कर्तव्य का पालन कर सकें जिसके लिए जनसमूह के बहुमत ने उसे मूल रूप से चुना है। जन प्रतिनिधि चुनने के साथ ही मतदाता का कर्तव्य एक तरह से स्थगित हो जाता है। इसके बाद वह उससे परिणामों की अपेक्षा करता है न कि बार-बार इस बात की शिकायत कि न्यस्त स्वार्थ उन्हें काम करने का मौका नहीं दे रहा है।

बिहार में थोड़ी भिन्न परिस्थितियों में लालू प्रसाद की सरकार का गठन हुआ। पारंपरिक रूप से बिहार का प्रशासनिक ढांचा बौद्धिक और सामाजिक नेतृत्व तथा सांस्कृतिक स्वरूप कुछ ऐसा रहा है कि लालू प्रसाद और उनके वर्ग की सरकार को स्वीकार करने में उनकी प्रारंभिक कठिनाई समझ में आती है। यही कारण है कि इन्हीं परिस्थितियों में किसी अन्य राज्य में इस तरह की सरकार को जो कठिनाइयां झेलनी पड़ती लालू प्रसाद की सरकार को उनसे कहीं ज्यादा मुश्किलात का सामना करना पड़ा।

शायद इसीलिए बिहार के मतदाता ने भी इस कठिनाई को समझा और एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों को जिस सीमा तक अकर्मण्यता के लिए छूट की अवधि परंपरा से निर्धारित है उससे कहीं बहुत ज्यादा ही समय लालू प्रसाद की सरकार को दिया। जब तक सचमुच उन्हें लगता रहा कि प्रशासन और व्यवस्था के संपूर्ण असहयोग के कारण विकास की गति अवरुद्ध है जनगण का विश्वास अपने प्रतिनिधियों के प्रति डिगता हुआ कतई नहीं दीखा। उन्होंने अपने जन प्रतिनिधियों की इस कठिनाई को भी निश्चय ही सहानुभूतिपूर्ण ढंग से समझा कि ये वास्तव में अस्तित्व रक्षा का संघर्ष कर रहे हैं इसलिए मूल कर्तव्य से डिगना इनके लिए न केवल स्वाभाविक है बल्कि क्षम्य भी है। स्पष्ट है कि यह सारी छूट वह उस सीमा तक ही देने को तैयार था जब तक उसे लग रहा था कि कठिनाई सचमुच वाजिब है न कि अकर्मण्यता को ढकने का साधन।

आज जब बिहार में मूड कुछ बदला हुआ दीख रहा है तो इसका कारण यह नहीं है कि वे लोग भी अब सामाजिक न्याय के नारे से अचानक विमुख हो गए हैं जो अब तक इनके साथ थे। अजित सिंह या रामलखन सिंह यादव जैसे राजनीतिज्ञों को जनता यदि ध्यान से सुनने लगी है तो इसका मुख्य कारण यह है कि उनका विश्वास लालू प्रसाद यादव और उनके ब्रांड के सामाजिक न्याय से थोड़ा डिग रहा है न कि वास्तविक सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के राजनीतिक दर्शन से। लालू प्रसाद जैसे प्रखर जमीनी राजनीतिज्ञ की यह पहली बड़ी असफलता है कि अपने तिलिस्म को बिखरने से बचाने में वे असमर्थ दीखने लगे हैं। अच्छे और सफल राजनीतिज्ञ की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि वह समय की नजाकत को बखूबी पकड़ कर अपने राजनीतिक कर्म को उसी के अनुरूप ढालता है। लालू प्रसाद इस कला में पारंगत रहे हैं। लेकिन लगता है कि इधर उनकी राजनीतिक पकड़ थोड़ी ढीली पड़ रही है। वर्ना उनकी बाजी एक के बाद एक उलटी नहीं पड़ती।

राष्ट्रीय स्तर पर जनता दल में हो रहे सतत् बिखराव के दौर में भी लालू प्रसाद यादव ने राज्य में पार्टी को एक तरह से अक्षुण्ण रखा तो इसका कारण सिर्फ सामाजिक न्याय के प्रति राज्य के बहुमत की प्रतिबद्धता ही नहीं थी। इसके पीछे लालू प्रसाद की अपनी योग्यता और क्षमता का भी बहुत बड़ा हाथ था। इसी तरह का समाज और इसी तरह की प्रतिबद्धता उत्तर प्रदेश में भी थी लेकिन जनता दल को वहां खंड-खंड होते देर नहीं लगी। मुलायम सिंह यादव निश्चय ही लालू प्रसाद के मुकाबले अधिक अनुभवी और जमीनी पकड़ वाले नेता थे लेकिन वे जहां असफल रहे लालू उन्हीं बिंदुओं पर सफल होते गए। यह लालू प्रसाद की राजनीतिक व्यवहार कुशलता का ही परिणाम था।

इसे भी राजनीतिक कुशलता ही कहेंगे कि दिन ब दिन बिहार की स्थिति बदतर होती गई। लेकिन लालू की जड़ें वहां की जमीन में और गहरी पैठती गईं। विकास का कार्य राज्य में पूरी तौर पर ठप है। यह आज की बात नहीं वर्षों से यही स्थिति है। राज्य करीब-करीब आर्थिक दिवालिएपन के कगार पर है। सरकार महीनों अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पाती। फिर इधर उधर की मदों से कतर-ब्योंत करके किसी तरह भुगतान कर दिया जाता है। आर्थिक मोर्चे पर प्रशासन की विफलता का यह आलम है कि इस माहौल में भी राज्य सरकार करीब 2000 करोड़ रुपये खर्च न कर पाने की स्थिति में केंद्र को लौटा रही है। राज्य में बिजली नहीं, पानी नहीं, कानून व्यवस्था की स्थिति नाजुक, सड़कें खस्ताहाल और कुल मिला कर राज्य सत्ता अपने आप में समाप्त होती दीख रही है। लंबे अरसे से यही स्थिति है, फिर भी लालू प्रसाद ने जिस वर्ग में लोकप्रियता प्राप्त की उस वर्ग के हीरो वे हाल तक बने हुए थे। सिर्फ इसलिए कि उनकी एक तरह की पारदर्शी गंवई निश्च्छलता सबके सामने थी।

शायद यही कारण है कि उनके अनेक सारे गलत काम भी इस फिजा में दबे ढके रह जाते थे। सामाजिक न्याय दिलाने के नाम पर जब लालू प्रसद कांग्रेस के एक परंपरागत बदनाम विधायक रामलखन सिंह यादव को जनता दल के टिकट पर संसद का चुनाव लड़ा रहे थे तब भी लोगों को रामलखन की वास्तविकता का पता था। लालू प्रसाद सहित सारे राज्य को यह पता था कि रामलखन बाबू सिर्फ शिक्षा माफिया और जमीन माफिया ही नहीं राजनीति में बाहुबल को प्रतिष्ठा दिलाने वाले राजनीतिज्ञों में प्रमुख हैं। यह भी सबको पता था कि उनके सुपुत्र प्रकाश चन्द ने कलकत्ता की उस बदनाम बस्ती में किस तरह कुल और राज्य का नाम रोशन किया था। यह मानने का भी कोई कारण नहीं है कि लोगों को पप्पू यादव के सामाजिक न्याय की असलियत का पता नहीं होगा। लेकिन जब लालू प्रसाद ऐसे लोगों को अपने सामाजिक न्याय की छत्रछाया में ले लेते थे तो लोग इसे भी स्वीकार कर लेते थे। सिर्फ इसलिए कि उन्हें लालू प्रसाद के पारदर्शी व्यक्तित्व पर विश्वास था। उन्हें लगता था कि पिछड़े परिवार के एक गरीब को विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लोग जमने नहीं दे रहे हैं। इसलिए फिलहाल इनसे किसी महत्वपूर्ण कर्म की अपेक्षा की बजाय इसी बात पर असंतुष्ट होना चाहिए कि ये अपने अस्तित्व की लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ पा रहे हैं।

यह स्थिति आगे भी बनी रहती यदि लालू प्रसाद पर आक्रमण सिर्फ उसी वर्ग की ओर से होता, जिस वर्ग को इन्होंने अपना शत्रु घोषित कर रखा था और जो वास्तव में थे भी। आज स्थिति बदल गई है। चाहे पैसे का प्रलोभन हो या शुद्ध अवसरवाद, लेकिन सचाई यह है कि इस बार लालू प्रसाद से जो अलग हुए हैं वे घोषित शत्रुवर्ग के लोग नहीं हैं। यहां बात सिर्फ रामलखन सिंह यादव या रामशरण यादव की नहीं हो रही। बात यहां रामसुंदर दास और उपेन्द्रनाथ वर्मा की भी हो रही है। यह आक्रमण इस बार उस सामाजिक वर्ग की ओर से हो रहा है जिसके न्याय की लड़ाई लड़ने का लालू प्रसाद दंभ भरते हैं और शरद यादव जिसके लिए रथयात्रा का ढोंग कर रहे हैं। रथ पर सवार होकर अपनी बात कहने की परंपरा अभिजात और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की विशेषता रही है। हाल में इसका अत्यंत अशिष्टकरण भी हुआ है। दबे-कुचले और शोषित पीड़ित के दर्द की अभिव्यक्ति किसी रथ पर सवार होकर नहीं की जा सकती। इसलिए इस तरह के अश्लील कृत्य के माहौल में जब लालू प्रसाद आरोप लगाते हैं कि थैलीशाह सामाजिक न्याय की धारा को भ्रष्ट कर रहे हैं तो आज वही लोग हंसते हैं जिनकी अभी कल तक इनके साथ पूरी सहानुभूति थी क्योंकि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि यह किसी उद्देश्य की विफलता का विलाप नहीं है। यह वस्तुतः एक अवसरवादी प्रलाप और अपनी विफलता को ढकने के लिए पवित्र उद्देश्य का अपहरण है।

राम आंदोलन के बाद उपजी भाजपा राजनीतिक और आज के शरद-लालू की रथयात्रा मार्का राजनीति में कहीं कोई अंतर नहीं है। राम मंदिर बनाने का आंदोलन भाजपा के अस्तित्व में आने से वर्षों पहले से चल रहा था। उत्तर भारत के जन-जन में व्याप्त राम प्रेम और उससे उपजी धर्मभीरुता किसी भाजपा आंदोलन का परिणाम नहीं थी। लेकिन जब से भाजपा ने इस आंदोलन को अपने हाथ में लेकर इसे अपनी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का साधन बनाया तब से स्थानीय स्तर का एक शुद्ध धार्मिक आंदोलन एक राष्ट्रीय स्तर के सांप्रदायिक आंदोलन के रूप में भी परिवर्तित हो गया। देश में आज अनेक लोग ऐसे हैं जिनकी रामभक्ति में कहीं कोई संदेह व्यक्त नहीं किया जा सकता लेकिन वे आवश्यक रूप से भाजपा-विहिप आंदोलन के पक्ष में भी हों यह आवश्यक नहीं है। जनता दल के बंटवारे की ताजा प्रक्रिया ने सामाजिक न्याय के आंदोलन को भी अब कुछ वैसा ही स्वरूप प्रदान कर दिया है।

मुरहो से प्रारंभ शरद यादव के मंडल रथ ने इस विभाजन को पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया। सामाजिक न्याय का संघर्ष करने वाले आवश्यक नहीं कि वे ही हों, जो मुरहो को एक पवित्र धर्मस्थल और मंडल को अवतार बनाने का प्रयास कर रहे हैं। शरद-लालू-वि.प्र. आदि की यह भोंडी चेष्टा सिर्फ उनकी राजनीति के प्रति ही करुणा का उद्रेक कर पाने में समर्थ है। सामाजिक न्याय के वास्तविक संघर्ष के प्रति नहीं। वैसे इस आंदोलन के भ्रष्ट होने के संकेत उसी दिन मिल गए थे जिस दिन लालू प्रसाद ने अपने जन्म दिन को एनटीआर, एमजीआर और जयललिता की घोर व्यक्तिवादी तानाशाह शैली में मनाने का फैसला किया। वैसे ही राक्षसी कट-आउट, धन और ऐश्वर्य का अश्लील प्रदर्शन तथा नेता की अतिमानवी छवि बनाने के भोंडे प्रयास में जिस दिन लालू प्रसाद शामिल हुए उसी दिन लग गया था कि सामाजिक न्याय का प्रश्न अब इनके लिए निष्ठा का प्रश्न कम और अपनी राजनीति चमकाने का ज्यादा है। रही-सही कसर पेंशन वाले उस कानून ने पूरी कर दी जिसे गुपचुप पास कराने के लिए लालू और जगन्नाथ मिश्र ने आपस में समझौता कर लिया।

यही कारण है कि लालू की जिन बातों को लोग सचमुच विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का षडयंत्र मान कर सहानुभूति जताते थे आज विद्रूप का कारण बनी हुई है। रामलखन के भ्रष्टाचार और अन्य सांसदों के तथाकथित पतन की बात आज लालू के लिए जन मानस पर कोई सहानुभूति की लकीर नहीं खींच पा रही है तो उसके पीछे यही कारण मुख्य है। अब राज्य को यह भी पता लगेगा कि विकास की दौड़ में पीछे रहने के असली कारण क्या हैं। लोग शायद इस विकल्प को भी तराजू पर तोलें कि क्या सामाजिक न्याय के नाम पर किया गया उनका बलिदान सिर्फ इसी व्यर्थता के लिए था। मुलायम सिंह यादव की गतिविधियों से सन 90 में सामाजिक न्याय के संघर्ष को एक भारी झटका लगा था। लालू प्रसाद का विश्वासघात कहीं इसे पूरी तरह तोड़ कर न रख दे।

10 सितंबर, 1992, अमर उजाला

मुसलमान सोच में भी पिछड़ रहे हैं

क्या मुस्लिम मध्य वर्ग पिछले दिनों कुछ ज्यादा ही कट्टर और अनुदार हुआ है? एक के बाद एक घटनाएं जिस तरह से घट रही हैं, उनसे यही नतीजा निकाला जा सकता है कि मुसलमानों के मध्य वर्ग या बुद्धिजीवी वर्ग का बहुमत पहले के मुकाबले कुछ ज्यादा दकियानूस और पुरातनपंथी होता जा रहा है या फिर मुस्लिम समाज में असुरक्षा की बढ़ती भावना उसके मध्य वर्ग के बीच इस प्रकार से प्रकट हो रही है।

जामिया मिलिया इस्लामिया और प्रोफेसर मुशीरूल हसन का मामला तो अब काफी चर्चित हो चुका है, लेकिन मुस्लिम शिक्षा जगत के कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण केंद्र, विशेषतः अलीगढ़, बम्बई और पटना में जिस तरह की घटनाएं पिछले दिनों घटी हैं, उनसे यदि कोई इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि आज का शिक्षित मुसलमान जिस रास्ते चल रहा है, उससे समाज थोड़ा और पीछे हटेगा तो ऐसे किसी निष्कर्ष को स्वाभाविक ही मानना चाहिए।

सबसे पहले अलीगढ़ के मामले को लें। यह मामला भी कुछ-कुछ जामिया के मामले की तरह ही है। फर्क सिर्फ इतना ही है कि अलीगढ़ विवाद में धार्मिक मुद्दे प्रमुख नहीं हैं, लेकिन इस विवाद ने जिस तरह से विश्वविद्यालय के छात्रों और अध्यापकों को प्रभावित किया है, इसका अर्थ सिर्फ यही हो सकता है कि आज मुस्लिम समाज का शिक्षित तबका एक भारी मानसिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है जिसकी अभिव्यक्ति इस तरह से हो रही है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने आई.टी.आई दिल्ली के प्राध्यापक एस एम याह्या को विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति के रूप में नियुक्त किया था। प्रोफेसर याह्या ने थोड़े दिनों बाद तय किया कि विश्वविद्यालय में शिक्षण का उचित माहौल नहीं है, इसलिए वे आई.टी.आई. वापस चले जाएंगे। विश्वविद्यालय के छात्रों और अध्यापकों ने उनकी विदाई का समारोह आयोजित किया, जिसमें प्रोफेसर याह्या ने वही बातें दोहराईं कि किस प्रकार अमुवि में शिक्षण का माहौल खराब हो रहा है। नतीता यह हुआ कि छात्रों का एक हिंसक वर्ग प्रतिवाद करने पहुंचा, जो अंततः मारपीट तथा अध्यापकों को लांछित करने से लेकर कुलपति के निवास पर हमले के रूप में बदल गया और विश्वविद्यालय एक अनावश्यक आन्दोलन का शिकार हो गया।

कुल मिलाकर मामला जामिया की तरह का ही बना कि क्या शिक्षण संस्थाओं में भी लोग अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति स्पष्ट रूप से कर पाएंगे या नहीं। जामिया के प्रोफेसर मुशीरूल हसन ने सलमान रश्दी की विवादास्पद पुस्तक ‘शैतानी आयतों’ को प्रतिबंध मुक्त करने की बात नहीं की थी। उन्होंने एकदम जायज बात कही थी कि पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाना या कहें कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता का हनन करना इस तरह की किन्हीं भी समस्याओं का समाधान नहीं है। परिणाम यह निकला कि न केवल जामिया के छात्रों-शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग प्रोफेसर हसन के हिंसक विरोध पर उतारू हुआ बल्कि देश भर के पढ़े-लिखे मुस्लिम समाज के बहुमत ने भी कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया व्यक्त की।

प्रोफेसर याह्या ने तो जो बातें कही थीं, उनका तो दूर-दूर तक धार्मिक आस्था से कोई संबंध नहीं है, लेकिन वहां भी छात्रों-शिक्षकों के एक बड़े वर्ग की प्रतिक्रिया जामिया जैसी ही रही। इससे क्या यह अर्थ नहीं निकलता कि नया मुस्लिम समाज उस हद तक अपने को अनुदार बनाए रखना चाहता है कि उसे बाहर की बात तो छोड़ ही दें, अपने समाज से उठी हुई आलोचना का हल्का-सा तेवर भी अपने ही समाज के विरुद्ध षड्यंत्र लगने लगता है। वरना अलीगढ़ के छात्रा उस तरह से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते जैसा कि पिछले दिनों हुआ, बल्कि प्रोफेसर याह्या के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए इसे आत्ममंथन का कुछ ऐसा स्वरूप देते कि यह विवेचना अलीगढ़ विश्वविद्यालय से प्राप्त छात्रों की उपलब्धियों के लेखा-जोखा के रूप में सामने आती कि क्या कारण है कि आज इस विश्वविद्यालय के छात्र प्रतियोगिताओं में कहीं टिक नहीं पा रहे हैं। जिस विश्वविद्यालय ने मुस्लिम समाज की कई सारी ऐसी पीढि़यां तैयार की, जो योग्यता और क्षमता में देश के किसी भी विश्वविद्यालय के छात्रों से उन्नीस नहीं रहीं, आज मुस्लिम समाज को एक पढ़े-लिखे बेकार की फौज देने के अलावा कोई सार्थक काम क्यों नहीं कर पा रहा?

यदि मुस्लिम समाज का पढ़ा-लिखा तबका सचमुच इस बात से चिन्तित होता कि देश में बेकारों की बढ़ती फौज में सबसे ज्यादा मुसलमान क्यों हैं या गरीबी की रेखा से नीचे भारतीयों में मुसलमानों का प्रतिशत हर साल क्यों बढ़ता जा रहा है तो वे प्रोफेसर मुशीरूल हसन और प्रोफेसर एस.एम. याह्या के विचारों को वितंडा का वह स्वरूप कतई नही देते, जिससे लोगों की इस अवधारणा को और बल मिलता कि मुस्लिम मध्य वर्ग, या कहें कि समाज को नेतृत्व प्रदान करने वाला तबका सचमुच मुसलमानों की गरीबी, अशिक्षा और पिछड़ेपन के बारे में कतई चिन्तित नहीं है बल्कि वे भी उन्हीं हवाई मुद्दों को ज्यादा महत्त्व देते हैं, जिनके कारण मुसलमान आजादी के बाद देश में पिछड़ता ही गया है।

बम्बई का विद्या भवन-अंजुमन विवाद इस प्रवृत्ति का सबसे अच्छा उदाहरण कहा जा सकता है। बम्बई में भारतीय विद्या भवन द्वारा परिचालित जनसम्प्रेषण और प्रबंधन का राजेन्द्र प्रसाद संस्थान अपने क्षेत्रा की एक महत्त्वपूर्ण संस्था है, जिसने हजारों की संख्या में युवाओं को आधुनिक सम्प्रेषण की तकनीक में प्रशिक्षित किया है, जो देश में महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य कर रहे हैं। भारतीय विद्या भवन भारत की प्राचीन संस्कृति के गौरव को पुनजीर्वित करने में विश्वास करता है। उसके पिछले कार्यकलाप को देखते हुए यह बात विश्वास के साथ कही जा सकती है कि हिन्दू विचारधारा की श्रेष्ठता को प्रतिपादित करने वाला यह संस्थान किसी भी कोण से साम्प्रदायिक नहीं है। यही बात बम्बई के अंजुमन-ए-इस्लाम के बारे में भी कही जा सकती है, जिसने बम्बई में मुस्लिम समाज को शिक्षित करने के क्षेत्र में अलीगढ़ या जामिया के टक्कर का काम किया है। इस्लामी सभ्यता और मुस्लिम समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर चलाया जाने वाला यह संस्थान अनुदार और पुरातनपंथी नहीं है, यह बात भी विश्वास के साथ कही जा सकती है।

इन परिस्थितियों में विद्या भवन की इस पहल की प्रशंसा होनी चाहिए थी कि वह राजेन्द्र प्रसाद संस्थान की एक शाखा अंजुमन-ए-इस्लाम के बोरीबंदर स्थित स्कूल में प्रारंभ करना चाहता है, जहां तीस प्रतिशत स्थान मुसलमान छात्रों के लिए सुरक्षित रखे जाएंगे। इस प्रस्ताव के दूसरे चरण में अंजुमन में संस्कृत तथा विद्या भवन में अरबी तथा फारसी पढ़ाने की योजना थी, लेकिन बम्बई के मुस्लिम समाज में हंगामा हो गया और इस प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा। आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रस्ताव का विरोध करने वाले पुरातनपंथी मुल्ला-मौलवी नहीं, बल्कि वे लोग थे जिन्हें मुस्लिम समाज के प्रगतिशील वर्ग का प्रतिनिधि कहा जा सकता है। इस प्रस्ताव का सबसे मुखर विरोध बम्बई से प्रकाशित ‘उर्दू टाइम्स’ महाराष्ट्र के भूतपूर्व शिक्षा सचिव तथा अंजुमन की प्रबन्ध समिति के सदस्य ए.यू. शेख तथा प्रख्यात मुस्लिम समाज सुधारक स्व. हमीद दलवई के भाई तथा महाराष्ट्र जनता दल के अग्रणी नेता हुसैन दलवई ने किया। मुखालफत का मुख्य आधार यह था कि विद्या भवन जैसी भारी-भरकम संस्था के प्रवेश से अंजुमन का अल्पसंख्यक चरित्र समाप्त होने का खतरा है। इस तरह शिक्षित मुस्लिम बेकार युवाओं के सामने एक अवसर आते-आते रह गया।

मुस्लिम मध्य वर्ग जिस तरह से अपने खोल में सिमटकर पीछेदेखू बनने की कोशिश कर रहा है, इसका एक अन्य उदाहरण है- पटना स्थित खुदाबख्श लाइब्रेरी के निदेशक का मामला। इस पुस्तकालय के निदेशक डॉ. आबिद रजा बेदार इन दिनों विवादों के घेरे में हैं। उन पर इस्लाम और मुसलमान विरोधी होने के आरोप लगाकर उन्हें पुस्तकालय से निकाल बाहर करने का एक आन्दोलन पटना में उग्र रूप धारण कर रहा है। वर्तमान विवाद का विषय हालांकि ‘काफिर’ शब्द की व्याख्या करते हुए उनकी ताजी टिप्पणी है, लेकिन दो प्रमुख इस्लामी संस्थाओं द्वारा उन्हें काफिर घोषित करते हुए ‘दोजख की आग’ में डालने का फतवा उनकी एक 23 वर्ष पहले प्रकाशित पुस्तक के कारण जारी किया गया है। डॉ. बेदार ने सन् 1969 में एक पुस्तक ‘सीमा की तलाश’ प्रकाशित कराई थी, जिसमें उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ, जुम्मे की तमाज, हिन्दू उपासना स्थलों को ढहाकर वहां बनाई गई मस्जिदों का मामला तथा इस्लामी कर्तव्य के बारे में अपने विचार प्रकट किए थे। आज उस पुस्तक के प्रकाशन के 23 वर्ष बाद डॉ. बेदार को काफिर घोषित करते हुए उन्हें पुस्तकालय के निदेशक पद से हटाने का आन्दोलन किया जा रहा है, जिसमें धीरे-धीरे अब उग्र धार्मिकता का प्रवेश हो रहा है।

इन चारों घटनाओं में एक बात मार्के की है कि इन विवादों के केंद्र में मुस्लिम समाज का कोई ऐसा व्यक्ति है, जो समझदारी की बात करने के कारण अपने समाज के बहुमत का कोपभाजन हो रहा है। जामिया में प्रोफेसर हसन, अलीगढ़ में प्रोफेसर याह्या, अंजुमन में डॉ. इसहाक जामखानवाला तथा पटना में डॉ. बेदार सिर्फ थोड़ी समझदारी की बात करके अपने समाज के उस वर्ग के आक्रमण का निशाना बन रहे हैं, जो संस्थानों की स्थानीय राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए मुस्लिम समाज के अंदर गहरे पैठे असुरक्षा तथा भय की भावना को भड़काकर इसे पूरे समाज के संकट का रूप दे रहे हैं। इस प्रकार एक समाज को थोड़ा और पीछे धकेल रहे हैं, जो ऐतिहासिक कारणों से वैसे ही पिछड़ता जा रहा है।

असल में भारतीय मुस्लिम समाज की यही विडम्बना रही है कि असुरक्षा की भावना को और हवा देकर हमेशा उर्दू, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक चरित्र तथा मुस्लिम पर्सनल लॉ आदि को ही मुसलमानों की वास्तविक समस्या बनाया जाता रहा है ताकि इस बात की ओर उनका ध्यान न जाए कि मुसलमान आज देश में सबसे ज्यादा गरीब, सबसे ज्यादा अशिक्षित तथा सबसे ज्यादा असुरक्षित क्यों है। कम-से-कम इस समाज के पढ़े-लिखे वर्ग से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वे इस वर्ग की वास्तविक समस्याओं को समझें और उस वर्ग का हथियार न बनें जिसका स्वार्थ इस समाज को बनाए रखकर अपनी राजनीति चमकाने में है। यह प्रक्रिया वास्तव में बहुसंख्य समाज की साम्प्रदायिकता के हाथ ही मजबूत करती है।

8 जुलाई 1992, अमर उजाला

एक ऐतिहासिक पहल

अनूसूचित जातियों व जनजातियों का दो दिवसीय सम्मेलन एक गंभीर राजनीतिक सोच के मंच के रूप में परिणत हो जाएगा, इसकी उम्मीद शायद ही किसी को थी। अधिकांश लोग यह उम्मीद लगाए हुए थे कि दलित राष्ट्रपति के प्रश्न पर सम्मेलन विभाजित हो जाएगा और राजनीतिक दलों के बंधनों के ऊपर उठकर दलितों का यह जो नया मंच उभर रहा है, उसके बिखरने की शुरुआत भी इसी सम्मेलन से प्रारंभ हो जाएगी। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उल्टे इस सम्मेलन में जो सामाजिक-आर्थिक प्रस्ताव पास हुए हैं, उन्हें राजनीतिक सूझबूझ का उत्कृष्ट उदाहरण कह सकते हैं।

दलित राष्ट्रपति की मांग इस फोरम की मुख्य मांग कभी नहीं थी। पिछले साल आन्ध्रप्रदेश के संदूर में दलितों पर हुए अत्याचार के खिलाफ ज्ञापन देने गए 106 दलित आदिवासी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल से राष्ट्रपति का मिलने से इंकार करने के बाद फोरम ने प्रतिक्रिया स्वरूप एक प्रस्ताव पास किया था कि अगला राष्ट्रपति दलित समुदाय से चुना जाना चाहिए। वह फोरम का भी प्रारम्भिक काल था और तब शायद इस फोरम को भी यह अंदाजा नहीं था कि इस मंच में कितनी संभावनाएं भरी पड़ी हैं। इन दो दिनों के सम्मेलन में हुई चर्चा और पारित प्रस्तावों ने यही सिद्ध किया है कि दलित शक्ति को अपनी क्षमता का पूरा अहसास हो गया है। वे सिर्फ दलित राष्ट्रपति के सवाल को मुख्य सवाल बनाकर अपनी इस नवसंचित उर्जा को यों ही नष्ट करने के लिए तैयार नहीं है।

दलित राष्ट्रपति का सवाल वास्तव में कुछ राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के लिए सिर्फ राजनीति का ही प्रश्न है। इसमें दोनों तरह के नेता शामिल हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह और रामविलास पासवान सहित जनता दल का वह वर्ग, जो इसी सवाल पर राजनीतिक वारे-न्यारे कर लेना चाहता है। दूसरी ओर वे राजनीतिज्ञ और बुद्धिजीवी हैं, जिनका ब्रह्मरोष इस बात पर भड़का हुआ है कि आखिर जाति योग्यता का विकल्प कैसे हो सकती है।

पहले वर्ग के लोगों की पूरी शक्ति इसी बात में लगी रही कि चाहे जैसे भी हो, दलित राष्ट्रपति के प्रश्न को सम्मेलन के केंद्र में बनाए रखकर उसे उस सीमा तक ले जाना है, जहां उस प्रस्ताव का बिना शर्त समर्थन नहीं करने वाले लोगों की निष्ठा को संदेह के दायरे में लाया जा सके। संकुचित राजनीतिक दृष्टि वाले दूसरे वर्ग की आकांक्षा इससे कुछ बहुत भिन्न नहीं थी। वे भी इसी प्रश्न का प्राधान्य देखना चाहते थे ताकि यदि वैसा कोई राजनीतिक प्रस्ताव पारित किया जाए तो उन्हें यह कहने का मौका मिल सके कि अब लोकतंत्र से पार्टियों की आवश्यकता समाप्त करने की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है और दलितों ने देश को जातिवादी राजनीति के अंधेरे गर्त में धकेल दिया है।

सम्मेलन में भाग ले रहे दलित नेतृत्व को इस खतरे का आभास था। उन्हें पता था कि यदि दलित राष्ट्रपति के प्रश्न को एजेंडे से पूरी तरह बाहर कर देते हैं तो इन दोनों शक्तियों को खुलकर खेलने का मौका मिल जाएगा। एक तरह तो यह कहा जाता कि नेतृत्व को कांग्रेस ने अंततः खरीद लिया और यदि इस मुद्दे को ही केंद्रीय मुद्दा बना दिया जाता तो उनकी चाँदी हो जाती जो अपने तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए एक महत उद्देश्य को औजार बनाना चाहते है। सम्मेलन को इस बात का अहसास तो था ही कि पिछले साल अचानक शुरू हुआ 106 सांसदों का यह ढीला-ढाला मंच आज करीब 250 सांसदों, विधायकों तथा बुद्धिजीवियों का ही एक प्रभावशाली फोरम इस वजह से भी बना है कि दलित राष्ट्रपति के प्रश्न ने सारे देश का ध्यान इनकी ओर आकृष्ट किया है। चाहे प्रतीक रूप में ही सही, लेकिन दलित राष्ट्रपति के प्रश्न ने ही फोरम को यह अवसर प्रदान किया है कि वह देश का ध्यान दलितों की दारुण दशा और समाज की उनके प्रति उपेक्षा की ओर दिला पाने में सफल रहा है।

इसीलिए सम्मेलन में एक तरफ आर्थिक, समाजिक और राजनीतिक प्रस्ताव पास होते रहे, लेकिन दूसरी ओर दलित राष्ट्रपति का प्रश्न भी अदृश्य रूप से सम्मेलन स्थल पर स्थायी भाव से मंडराता रहा। इस प्रक्रिया में दलित, आदिवासी और वंचित तबकों की अपनी पहचान जिस दृढ़ता से स्थापित हुई, वैसी पहले कभी नहीं हुई थी। इस सम्मेलन में फोरम को एक सुसंगत तथा मुख्य दलितवाणी के रूप में उभारा और कुछ ऐसी बातें पहली बार हुईं जिनका भविष्य की भारतीय राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ना निश्चित है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है- सम्मेलन में पास किया गया दलितों की आर्थिक-सामाजिक अवस्था पर प्रस्ताव। पहली बार एक ऐसा दस्तावेज सामने आया है जिसमें दलितों के प्रति अब तक चली आ रही करुणा और कल्याण का भाव प्रधान नहीं है। इसी दस्तावेज में दलितों की वर्तमान स्थिति का खुलासा लेखा-जोखा है और ऐसी मांगें की गई हैं, जिन्हें मानने पर वास्तव में दलितों की स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन हो सकता है।

प्रस्ताव में दलितों पर आए दिन हो रहे अत्याचारों तथा उस समाज की आर्थिक दैन्य दशा को अलग-अलग व्याधि के रूप में देखने के बजाए इसे समाज के आर्थिक-सामाजिक सड़ांध का लक्षण मात्रा माना है। प्रस्ताव में कहा गया है कि जब तक सम्पूर्ण समाज के आर्थिक-सामाजिक ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं हो जाता, इन लक्षणों को मिटाने की कोशिश करना सिर्फ शाब्दिक सहानुभूति बनकर ही रह जाएगी, रोग को जड़ से मिटाने की कोशिश कतई नहीं बन सकती।

इसलिए प्रस्ताव कहता है कि समाज यदि सचमुच रोग की जड़ को मिटाने के लिए प्रतिबद्ध है तो उसे लफ्फाजी से उबरना होगा। शब्दों से ऊपर उठकर ठोस कर्म की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए कुछ विशिष्ट उपाय सुझाए गए हैं। मसलन, कुछ निम्नतम मजदूरी के लिए राष्ट्रीय कानून बने, न कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग दरों पर मजदूरी निर्धारित की जाए। बंधुआ मजदूरों को सिर्फ मुक्त कर देने मात्रा से कर्तव्य की इतिश्री न हो, उनके पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। खेती से विरत हो रहे दलित वर्ग को लघु सिंचाई के मामले में प्राथमिकता दी जाए।

मंदिरों और मठों की जमीनों से संबंधित एक अत्यन्त क्रान्तिकारी प्रस्ताव निश्चय ही समाज के प्रभावशाली वर्ग का ब्रह्मरोष तीव्र करेगा। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि मंदिरों, मठों तथा धर्मार्थ न्यासों की जमीन दलितों को खेती के लिए पट्टे पर दी जाए। इसके अतिरिक्त भंगी मुक्ति, जंगलों के संरक्षण, जंगलों के उत्पाद पर दलितों-आदिवासियों का अधिकार, कर्ज मुक्ति तथा दलितों-आदिवासियों के स्कूल जाने वाले बच्चों को मुफ्त आहार देने के प्रस्ताव भी पास किए गए। सरकार की नई आर्थिक नीति विषयक प्रस्ताव ने तो नरसिंह राव सरकार को कठघरे में ही खड़ा कर दिया। सम्मेलन में कहा गया कि सरकार ने नई आर्थिक नीति लागू करने से पहले सभी वर्गों से विचार-विमर्श करना उचित नहीं समझा। विभिन्न कॉमर्स चैम्बरों, ट्रेड़ यूनियनों तथा देशी-विदेशी अर्थनीतिविदों से नई अर्थनीति के बारे में चर्चा की गई, पर दलितों- आदिवासियों को किसी भी स्तर पर विचार-विमर्श में शामिल नहीं किया गया।

यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण घटना है, क्योंकि पहली बार दलितों ने अपने आपको एक अलग आर्थिक वर्ग के रूप में मान्यता देने की मांग की है। अब तक दलित समस्या को सिर्फ सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक स्तर पर ही देखा जाता रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि इस लड़ाई के जड़ में प्रमुख तत्व हमेशा आर्थिक रहा है। इसलिए यह मांग करना कि योजना मद व्यय की राशि निर्धारित करते हुए योजनाकार इस बात का ध्यान रखे कि दलितों-आदिवासियों को उनकी आबादी के अनुपात में ही धन आबंटित किया जा रहा है, अपने आप में एक क्रान्तिकारी मांग है। उस मांग से कहीं ज्यादा दूरगामी महत्त्व की, जिसमें कहा गया है कि राज्यसभा और विधान परिषदों में भी लोकसभा तथा विधानसभा की तरह सीटों का आरक्षण किया जाए। समाज के आरक्षण विरोधी तबके ने इस मांग की गंभीरता को शायद नहीं समझा है। इसलिए उन बातों को उछालकर मुदित हो रहे हैं जो बातें इस सम्मेलन के हाशिए पर चर्चित होती रहीं।

सम्मेलन के मुख्य प्रस्तावों पर अभी लोगों का ध्यान नहीं गया है। यदि इस पर गहराई से विचार किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि देश में जिस नई राजनीतिक संस्कृति की हवा का आभास थोड़े दिन से लोगों को मिल रहा था, उसका कुछ ठोस रूप इस सम्मेलन के दौरान पहली बार देखने को मिला है। यह सम्मेलन एक ऐसे समय में आयोजित हुआ है जब देश के अधिकांश राजनीतिक दल महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर एक ही सोच के सांचे में ढले दिखते हैं। ऐसा लग रहा है कि कोई विकल्प है ही नहीं। ऐसी स्थिति में यह फोरम ताजी हवा के एक ऐसे झांेके के रूप में आया है जिसमें भविष्य की राजनीति के संकेत स्पष्ट देखे जा सकते हैं। इसलिए इसे कृपया सिर्फ दलित राष्ट्रपति के प्रश्न या विश्वनाथ प्रताप सिंह की जीत-हार के प्रश्न के रूप से न देखें। इसमें एक आगामी राजनीति का पूर्वाभास छिपा
हुआ है। कृपया ऐतिहासिक पहल को इसी रूप में देखें।
25 जून 1992, अमर उजाला